सोमवार, 13 मार्च 2017

बिन छायाँ


बिन छायाँ के विश्राम नही होते ।
 बिन आशीषों के काम नही होते ।
 न हो हाथ पीठ पर अपनों का ,
 तो विजयी समर संग्राम नही होते ।
    ,...... विवेक ......

शुक्रवार, 10 मार्च 2017

राजनीति


परिंदे को परिंदे की पहचान है
 चहुँ और मच रहा घमासान है
 कतर रहे पर एक दूजे के
 बनती इससे ही इनकी शान है
  .
 बजाते सब ढपली अपनी अपनी
 न सुर है न कोई ताल है
  भूल रहे सभ्य सभ्यता सब अपनी
 फिर भी खुद को खुद पर नाज़ है
.
 कहते जीत रहे है बस हम ही
 गंजों को अपने नाखूनों पर नाज़ है
 जैसा मातृ भूमि का था कल
 बैस ही मातृ भूमि का आज है
  ......विवेक....

भाग्य


जो प्राप्त है वो भी अपर्याप्त है ।
छीना सुख चैन चाह मे और की ,
 बस कर्म ही हमारा साथ है ।
 भाग्य तो विधाता के हाथ है ।
    ......... विवेक दुबे" निश्चल"@ ............

शनिवार, 25 फ़रवरी 2017

खुद से द्वन्द


ख़ुद का ख़ुद से द्वन्द था ।
पर थोडा सा प्रतिबंध था ।
चलता था उजियारों संग वो ,
फिर भी अँधियारों का संग था ।
   .... विवेक ...

शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

सत्य सनातन शिव


जो था कल भी ,
 जो है अब भी ।
 जो है आज भी ,
 जो होगा कल भी ।
 जो था तब भी ,
 था न जब कुछ भी ।
 वो है तब भी ,
 सब कुछ है जब भी ।
 वो होगा तब भी ,
 न होगा कुछ जब भी ।
 वो ही सदा शिव है ,
 वो ही सत्य सनातन शिव है ।
     ..... विवेक .....

रविवार, 19 फ़रवरी 2017

कुछ शब्द





इतिहास उसका


कैसे लिखे वह उसका इतिहास ।
 न था उसका कोई कल ,
  न उसका कोई कल होगा  ,
 उसका तो बस है केवल आज ।
   .....विवेक ....


वक़्त



वक़्त बस एक पाठ पढ़ाता है ।
 रास्ता आसां भी नजर आता है ।
 मंज़िल हो सामने निगाहों के ,
  वक़्त पर ही वक़्त आता है ।
    ..... विवेक ....

द्वन्द


ख़ुद का ख़ुद से द्वन्द था ।
पर थोडा सा प्रतिबंध था ।
चलता था उजियारों संग वो ,
फिर भी अँधियारों का संग था ।
   .... विवेक ...

जीवन कटता प्रति क्षण है


सुख दुःख तो बस भृम है ।
यह ज़ीवन तो बस श्रम है ।
जन्म जरा यौवन और मृत्यु ,
ज़ीवन कटता प्रति क्षण है ।
..... विवेक .....

जीवन



हर मुश्किल हल होगी ।
 आज नही तो कल होगी ।
चलता चल जीवन पथ पर ,
 साँझ के आंगे सहर होगी ।
    ....


ज़ीवन के हर प्रश्न का हल
  ज़ीवन से ही मिलता है
  साँझ का सूरज ढ़लता है
   भोर भये फिर निकलता है

 हसरत को न काम दो ।
 नियत को न विराम दो ।
 होंसले को न विश्राम दो ।
 ज़ज़्बे को एक नाम दो ।
    ..
मैं कौन हूँ जमाना तय क्या करेगा ।
 मेरा हुनर ही तो मेरा आईना होगा ।।
    .....विवेक दुबे "निश्चल"@...

होंसला


शनिवार, 19 नवंबर 2016

रंगोली प्रकाशन



बचपन


 
 बीत गया तन ।
 रीत गया मन
ज्यों ज्यों बीता ,
बचपन बचपन ।
.
 तन की तन से अनबन ।
 मन की मन से उलझन ।
ज्यों ज्यों बीता ,
 बचपन बचपन ।
 .
ग़ुम हुआ कुछ यूँ ।
 वो नटखट तन मन ।
ज्यों ज्यों बीता ,
बचपन बचपन ।
 ........ विवेक ......

कलम चलती है शब्द जागते हैं।

सम्मान पत्र

  मान मिला सम्मान मिला।  अपनो में स्थान मिला ।  खिली कलम कमल सी,  शब्दों को स्वाभिमान मिला। मेरी यूँ आदतें आदत बनती गई ।  शब्द जागते...