कुछ खास नहीं कवि पिता की संतान हूँ । ..... निर्दलीय प्रकाशन भोपाल द्वारा बर्ष 2012 में "युवा सृजन धर्मिता अलंकरण" से अलंकृत। जन चेतना साहित्यिक सांस्कृतिक समिति पीलीभीत द्वारा 2017 श्रेष्ठ रचनाकार से सम्मानित कव्य रंगोली त्रैमासिक पत्रिका लखीमपुर खीरी द्वारा साहित्य भूषण सम्मान 2017 से सम्मानित "निश्चल" मन से निश्छल लिखते जाओ । ..... . (रचनाये मौलिक स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित .)
बुधवार, 17 जून 2020
मंगलवार, 16 जून 2020
जवाब क्या दूँ
*इन बेताबियों का जवाब क्या दूँ ।*
*इन बेकरारियों का हिसाब क्या दूँ ।*
*पाल बैठा हूँ दुश्मनी ख्यालों से भी ,*
*ऐ जिंदगी तुझे हँसी खुआव क्या दूँ ।*
*आ ही गये बेपर्दा महफ़िल में वो ,*
*अब उन्हें हुस्न-ऐ-नक़ाब क्या दूँ ।*
*साजिशें है आज बड़ी मुकम्मिल ,*
*अब शराफ़तों को ठहराब क्या दूँ ।*
*कह गया जो बातें बड़े सलीके से ,*
*उन बातों का लब्बोलुआब क्या दूँ।*
*जो पढ़ गया"निश्चल"को एक निग़ाह में ,*
*उसे मैं अपनी ग़ज़ल किताब क्या दूँ ।*
..... *विवेक दुबे"निश्चल"@*....
*इन बेकरारियों का हिसाब क्या दूँ ।*
*पाल बैठा हूँ दुश्मनी ख्यालों से भी ,*
*ऐ जिंदगी तुझे हँसी खुआव क्या दूँ ।*
*आ ही गये बेपर्दा महफ़िल में वो ,*
*अब उन्हें हुस्न-ऐ-नक़ाब क्या दूँ ।*
*साजिशें है आज बड़ी मुकम्मिल ,*
*अब शराफ़तों को ठहराब क्या दूँ ।*
*कह गया जो बातें बड़े सलीके से ,*
*उन बातों का लब्बोलुआब क्या दूँ।*
*जो पढ़ गया"निश्चल"को एक निग़ाह में ,*
*उसे मैं अपनी ग़ज़ल किताब क्या दूँ ।*
..... *विवेक दुबे"निश्चल"@*....
जवाब क्या दूँ
*इन बेताबियों का क्या जवाब दूँ ।*
*इन बेकरारियों का क्या हिसाब दूँ ।*
*पाल बैठा हूँ दुश्मनी ख्यालों से भी ,*
*ऐ जिंदगी तुझे हँसी क्या खुआव दूँ ।*
*आ ही गये बेपर्दा महफ़िल में वो ,*
*अब उन्हें क्या हुस्न-ऐ-नक़ाब दूँ ।*
*साजिशें है आज बड़ी मुकम्मिल ,*
*अब शराफ़तों को क्या ठहराब दूँ ।*
*कह गया जो बातें बड़े सलीके से ,*
*उन बातों का क्या लब्बोलुआब दूँ।*
*जो पढ़ गया"निश्चल"को एक निग़ाह में ,*
*उसे मैं अपनी ग़ज़ल क्या किताब दूँ ।*
..... *विवेक दुबे"निश्चल"@*....
Blog post 16/6/20
*इन बेकरारियों का क्या हिसाब दूँ ।*
*पाल बैठा हूँ दुश्मनी ख्यालों से भी ,*
*ऐ जिंदगी तुझे हँसी क्या खुआव दूँ ।*
*आ ही गये बेपर्दा महफ़िल में वो ,*
*अब उन्हें क्या हुस्न-ऐ-नक़ाब दूँ ।*
*साजिशें है आज बड़ी मुकम्मिल ,*
*अब शराफ़तों को क्या ठहराब दूँ ।*
*कह गया जो बातें बड़े सलीके से ,*
*उन बातों का क्या लब्बोलुआब दूँ।*
*जो पढ़ गया"निश्चल"को एक निग़ाह में ,*
*उसे मैं अपनी ग़ज़ल क्या किताब दूँ ।*
..... *विवेक दुबे"निश्चल"@*....
Blog post 16/6/20
रिश्ते
रिश्तों के इस जंगल में ,
अभिलाषाओं के अंधड़ चलते ।
आश्रयहीन आशाओं से ,
स्वयं को स्वयं से छलते ।
भोर तले छूटे स्वप्न अधूरे से ,
साँझ तले निराशाओं में पलते ।
कुंठित है मर्यादाएँ रिश्तों की ,
नातों के आधार सभी हिलते ।
कम्पित है साँसे साँसों में ,
आकर जाते यौवन के ढलते ।
जीवन उपवन है काँटो का ,
फूल कम ही इसमें है खिलते ।
क्या सार यही है जीवन का ,
सब कुछ छूट गया मिलके ।
पाकर भी न पाया जैसे कुछ,
"निश्चल"खाली हाथ रहे मलते ।
..... विवेक दुबे"निश्चल"@...
अभिलाषाओं के अंधड़ चलते ।
आश्रयहीन आशाओं से ,
स्वयं को स्वयं से छलते ।
भोर तले छूटे स्वप्न अधूरे से ,
साँझ तले निराशाओं में पलते ।
कुंठित है मर्यादाएँ रिश्तों की ,
नातों के आधार सभी हिलते ।
कम्पित है साँसे साँसों में ,
आकर जाते यौवन के ढलते ।
जीवन उपवन है काँटो का ,
फूल कम ही इसमें है खिलते ।
क्या सार यही है जीवन का ,
सब कुछ छूट गया मिलके ।
पाकर भी न पाया जैसे कुछ,
"निश्चल"खाली हाथ रहे मलते ।
..... विवेक दुबे"निश्चल"@...
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कलम चलती है शब्द जागते हैं।
सम्मान पत्र
मान मिला सम्मान मिला। अपनो में स्थान मिला । खिली कलम कमल सी, शब्दों को स्वाभिमान मिला। मेरी यूँ आदतें आदत बनती गई । शब्द जागते...




























































