1
विवेक यह सफर विकल्प से संकल्प तक का ।
लगता सारा ज़ीवन "निश्चल" सफर दो पग का ।
2
डूबा न कभी मै बस तैरता रहा ।
तिनके सा बजूद अखरता रहा ।
......3
जुबां न कह सकी वो लफ्ज़ कह गए ।
अल्फ़ाज़ मेरे अश्क़ से बहकर गए ।
......4
शिद्दत से पुकारा इल्म सा सराहा उसने ।
गढ़कर निगाह से बुत कह पुकारा उसने।
.....5
सबब परेशानियों का ,फ़क़त इतना रहा ।
तू परेशां न रहा , मैं भी परेशां न रहा ।
......6
मोल न रहा मेरा कुछ इस तरह ।
बेमोल कहा उसने कुछ जिस तरह ।
....7
मैं तेरे इस जवाब का क्या हिसाब दूँ ।
जिंदगी तुझे जिंदगी का क्या हिसाब दूँ ।
..
8
उठा दिया अपने घर का ,
रौशनी दिखाने चला था ।
उजियारे वो अपने ,
यूँ मिटाने चला था ।
....9
दिए जले जो रातों को ,
खोजते अहसासों को ।
जलाकर अपनी बाती ,
टटोलते अँधियारों को ।
....10
एक मेरा भी अंदाज़ है , राख होने का ।
सुलग आखरी कश तक,ज़िंदा रहने का ।
..11
हराकर उम्र शौक पाले थे, बड़े शौक से ।
बुझे चिराग़ लड़ न सके,अंधेरों के दौर से।
....
12
मैं तेरे इस सवाल का , क्या ज़वाब दूँ ।
ज़िंदगी तुझे ज़िंदगी का , क्या हिसाब दूँ ।
...13
छुअन की उसको , दरिया की चाह थी ।
बहता गया बस वो , निग़ाह में उसकी ।
...14
देख संग दिली दुनियाँ की, हैरां है बुत ।
सोचता है खड़ा वो, मैं बुत या ये बुत ।
....15
लोटता है वो निग़ाह भर देख मुझे ।
क्यों बुत समझ बैठता है वो मुझे ।
...... 16
उजाला जब भी चला है अंधेरों ने छला है
।
रोशनी की चाह में ,सूरज तो बस जला है ।
....17
मेरी प्रेरणा हो या नही ,नही जानता मैं।
हाँ इतना पता है तुम से सीखा बहुत है ।
...18
हाँ मैं कुछ कहता हूँ कुछ लिखता हूँ ।
बात कभी कभी किताबों से आंगे कहता हूँ ।
.......19
बस इतनी सी जुस्तजू (खोज)है ।
मुझे लफ्ज़ की आरजू (कामना)है ।
20
लफ्ज़ बन सँग किताबों के हम हुए ।
दफ़न किताबों में कुछ यूँ हम हुए ।
21
दूरियाँ नही दरमियाँ के,
अहसास खामोशियों के ।
सजती रही महफ़िल ,
बिन शमा रोशनियों के ।
22
उतरे वीरानों में ,चैन की खातिर हम ।
देखा वीरानों में बैचेनी बिखरी पड़ी है ।
23
मोहब्बत में बिका न खरीदा गया ।
दीवानगी का इतना सलीका रहा ।
24
टूटता रहा ऐतवार से,
लड़ता रहा इख़्तियार से ।
खुलते रहे पर्त्-दर-परतों से,
हारते रहे शर्त-दर-शर्तो से ।
....
25
ज़माने का रिवाज , कुछ बिगड़ा बिगड़ा है ।
देख सादगी हमारी हर शख़्स उखड़ा उखड़ा है ।
....26
जो भागे सत्य से , वो साहित्य कैसा।
आईना दिखाता वही , जो है जैसा।
... 27
35
मेरे अश्क़ सामने गिरे मेरे अपनों के ही ।
मुस्कुराहट गेरों में वफ़ा तलाशती रही ।
.36
वो ज़मीं थी हरी भरी , मैं आसमाँ वीरान था ।
कलरव थे दामन में उसके, मैं ख़ामोश सुनसान था ।
37
शब्दो के सफर में हम सब मुसाफ़िर है ।
तलाश मंजिल की ज़िंदगी गुजर जाती है ।
38
न समझ सका मैं वक़्त के मिजाज को ।
एक कल की खातिर भूलता आज को ।
39
कहला सका न आदमी वो कभी ,
वो भी तो आखिर एक इंसान था ।
40
"निश्चल" चला न चाह में जिसकी ,
मंजिल न थी दूर सामने जहान था ।
...
41
तारा टूटा फ़लक से जमीं नसीब न थी ।
ख़ाक हुआ हवा में मुफ़लिसी केसी थी ।।
..42
सितारे की चाह है ,चाँद से इक़रार है ।
चाँदनी आई साँझ ढले,शबनम बेकरार है ।
....43
खामोशी ओढ़कर इजहार रहा ।
बे-इंतहां उसका कुछ प्यार रहा ।
....44
कोई खामोशी अपनी भी बयां करो ।
कुछ लफ्ज़ अपने ज़िगर जुदा करो ।
...45
खोजते सभी रास्ते यहीं कही हैं ।
चूकती निग़ाह,फासला दो पग नही है ।
... 45
कैसे छोड़ दूँ मै शहर अपना ।
अभी शहर में अजनबी बहुत है ।
....46
ख़ातिर खुशी की ,हँसता रहा बार बार ।
मेरा आईना भी ,मुझसे रहा बे-ऐतवार ।
.....
47
वक़्त ने यूँ आजमाया मुझे ।
वक़्त पे ही अपनाया मुझे ।
....48
बदलता ही रहा वक़्त से वक़्त भी ।
बे-वफा ही रहा वक़्त से वक़्त भी ।
----49
तदवीर से न बदल वक़्त की फितरत को ।
बदल वक़्त क्या कहेगा तू किस्मत को ।
..50
लफ्ज़ लिखता मिटाता रहा मैं ।
यूँ वक़्त अपना बिताता रहा मैं ।
...51
जाने वो क्या वक़्त की, अधूरी चाह रही ।
कलम चलती रही, ख़ामोश निग़ाह रही ।
..52
हौंसलो से हुनर, मुक़ाम पता है ।
मुसाफ़िर अकेला , थक जाता है ।
..53
घोर निराशा जब तिमिर गहराती है ।
सूरज की आभा छाया गढ़ जाती है ।
.... 54
साहिल को ही सागर हांसिल है ।
सहता जो सागर की हलचल है ।
...55
देते रहे साथ मेरा वक़्त वक़्त पर वो ।
साथ चले थे लफ्ज़ किताबो से जो
...
...56
तपते रहे अल्फ़ाज़ तपिश अहसास से ।
आते रहे जाते रहे ,वो अपने अंदाज से ।
.... 57
हर जवाब से सवाल निकालता रहा।
वो इस तरह मुझे खुद में ढालता रहा ।
.....58
हक़ीम था वो कुरेद गया जख्मों को ।
उधेड़ गया वो कुछ याद जख्मों को ।
....59
सिया जब भी जिगर को अपने ।
निशां रहे पैबंद दिखे जिगर पे ।
...60
सवाल उठते रहे निग़ाह में ,
निग़ाह से गुजरते हर शख्स के ।
....
...61
बैचेनियाँ दिल निगाह झलक लाए हैं ।
लफ्ज़ बेजुवां आँख छलक आए हैं ।
..62
माँगकर अश्क़ मेरे हँसी बाँटने आए है ।
वो हमें खुद से खुद यूँ काटने आए हैं ।
...63
ले हाथ रंग गुलाल ,
निग़ाह मलाल लाए हैं।
रहे बेचैन आज हम ,
वो बहुत सवाल लाए हैं ।
...64
धुल जाएगी रंगत शूलों की ,
टीस साथ निभाएगी ।
आती होली साल-दर-साल ,
होली फिर आएगी ।
....65
बेताब कदम मंजिल छूने को ।
जमीं बैचेन आसमां होने को ।
.....
66
तू मेरा हक़ीम हुआ ,
होंसला-ऐ-यक़ीन हुआ ।
थामकर नब्ज़ सफ़र-ऐ-ज़िंदगी ,
तू मेरा मतीन हुआ ।
(मतीन/निर्धारित/ ठोस)
...67
तलाश-ए-ज़िंदगी में गुम हुआ।
कुछ यूँ ज़िंदगी का मैं हुआ ।
...68
अर्श पे अना लिए चलता रहा ।
गैरत-ऐ-अहसास चुभता रहा ।
...69
आइना तू सवार दे मुझे ।
मैं कुछ निहार लूँ तुझे ।।
....70
तहज़ीब ही हुनर-ए-तमीज़ है ।
यूँ तो इंसान बहुत बदतमीज है ।
...71
खबर नही के तू बेखबर सा है ।
कदम कदम तू हम सफर सा है।
....72
समझते हैं समझौता जिसे एक हार है वो ।
टूटता सामने "निश्चल"जिसके प्यार है वो ।
......73
तेरी हर दुआ , रज़ा खुदा हो जाए ।
भटकी कश्ती का, तू नाख़ुदा हो जाए।
...74
दुआ के ताबीज को तरकीब बना लूँ मैं ।
उस तरकीब से तक़दीर सजा लूँ मैं ।
...75
हुनर वो नही , जो लेना जाने ।
हुनर वो है , जो देना जाने ।
---76
तक़दीर ही तकदीरें तय किया करती हैं ।
रास्ते वही मंज़िले बदल दिया करती हैं ।
..77
जज़्ब कर उस अस्र अक़्स को ,
जो कहूँ मैं दुआ तुझको ।
अस्र .. समय
...78
वो यूँ दुआ का करम फ़रमाती है ।
बद्दुआएं अब बेरुखी फ़रमाती है ।
....79
अहसान जिंदगी का इतना मुझ पर ।
करम फरमाया हर अहसान का मुझ पर ।
...80
कैसी अदावत है आज महफ़िल की ।
खिड़कियां खुलती नही अब दिल की ।
... ..
..81
पढ़ता जो नजर सा ,लफ्ज़ रूठ जाते ।
पढ़ता जो लफ्ज़ सा ,इशारे रूठ जाते ।
..82
किताब खुली खुली जो बन्द सा मगर ।
सफ़े सफ़े पर क्यु चिलमन सा असर ।
.... 83
अक़्स पर अक़्स चढ़ाया उसने।
खुद को बा-खूब सजाया उसने ।
...84
एक मुख़्तसर ग़जल कही मैंने ।
एक निग़ाह नजर कही मैंने ।
....
...85
नजर का खेल , बड़ा अजीब है ।
नज़र अंदाज़ वही , जो अज़ीज है ।
.... 86
इल्म वो नही जो ख़ामोश रह गया ।
इल्म वो जो में दुनियाँ बयां हो गया ।
...87
बदले मेरे शहर के हालात हैं ।
संग निग़ाह खँजर हाथ है ।
....88
सैय्यदों के शहर में, हैं परिंदे कहर में ।
उड़ें तो उड़ें कैसे, हैं फंदे हर नजर में ।
...
89
शेर ज़िंदगी ऐ दख़ल होते रहे ।
लफ्ज़ लफ्ज़ ग़जल होते रहे ।
...90
मस्त है ज़िंदगी पस्त है ज़िंदगी ।
अक्षर अक्षर बिखरी है ज़िंदगी ।
....91
रहा गाफ़िल ज़िंदगी के इख़्तियार में ।
ले डूबी मौत इंसा को अपने प्यार में ।
.....92
इस सच को मान न मानो अपनी हार ।
यह जोश ज़िंदगी का ही दौलत अपार ।
...93
टूटता रहा ऐतबार ऐतबार से ।
लड़ता रहा यूँ इख़्तियार से ।
...94
मुस्कुरा ऐतबार इजहार किया उसने ।
लगा ठहाका बे-ऐतबार किया उसने ।
....
.95
ज़िंदगी भी , एक किताब है ।
दो लाइन का, बस हिसाब है ।
...96
कुछ लिखें अपना , कुछ कहें अपना।
सत्य नही ज़ीवन , ज़ीवन एक सपना।
...97
ज़ीवन की बस , इतनी परिभाषा है।
ज़ीवन तो बस , कटता ही जाता है।
....98
पतझड़ नही वसंत हो ज़िंदगी ।
अन्त नही आरम्भ हो ज़िंदगी ।
---99
लाभ हानि के खाते , लिखते सब ।
लोग नही मिलते , बे-मतलब अब ।
---100
होता रहता हरदम , कुछ न कुछ।
वक़्त सीखाता हरदम , कुछ न कुछ।
101
भर गया दामन , दुआओं के फूलों से ।
खुशबू दुआओं की,जा मिली रसूलों से ।
....102
निगाह नजारों की भी न चाहत रही ।
जहां साँसों की भी न आहट रही ।
...103
रोशन रहे शमा सुबह के उजालों तक ।
आ जाएं वो आने के किए वादों तक ।
...104
चाहत रात की , खातिर उजाले की ।
मयकदा रिंद की , मय प्याले की ।
.....105
जिंदगी न समझ सकी हालात को ।
बुझती गई प्यास फिर प्यास को ।
... 106
न मिला निग़ाह जमाने से ख़ातिर अपनी ।
चल नजर बचा जमाने से ख़ातिर अपनी ।
..107
निग़ाह शक से देखता है जमाना अक़्सर ,
भुलाकर वो तेरा मेहनतकश मुक़द्दार ।
..108
तपता रहा उम्र भर , कुंदन सा हो गया ।
भाया न दुनियाँ को , खुद भी खो गया ।
..109
पथिक थक जाएगा ,मंजिल पा जाएगा ।
छोड़े पद चिन्हों का,इतिहास बनाएगा ।
....
110
लकीरें मुक़द्दार की बदलती नही ।
लोग फिर भी तक़दीर गढ़ा करते है ।
111
मेरी यह आदतें आदत बनती गई।
शब्द जागते रहे कलम चलती रही ।
112
हम छपते रहे अखवारों में कभी कभी ।
यूँ बिकते रहे शहर शहर कभी कभी ।
113
मैं कौन हूँ जमाना तय क्या करेगा ।
मेरा हुनर ही तो मेरा आईना होगा ।
114
बाद मेरे याद रहे मेरे अल्फ़ाज़ में ।
बस यही दौलत कमाना चाहता हूँ ।
115
खुलते रहे पर्त्-दर-परतों में ।
हारते रहे शर्त-दर-शर्तो में ।
116
कुछ नुक़्स भी नायाब होते है ।
रुख़सार चाँद पर दाग होते है ।
...
117
ज्यों ज्यों ज़ीवन की साँझ ढली ।
त्यों त्यों तुझसे मिलने चाह बड़ी ।
118
कदम बेताब मंजिल छूने को ।
जमीं बैचेन असमां होने को ।
119
वक़्त छीन रहा बहुत कुछ ।
हँसी ले दे रहा सब कुछ ।
120
तमाशा ही है आज हर जिंदगी ।
करता नही कोई किसी से बंदगी ।
121
लो टूटकर फ़लक से वो चला ।
गुमां था जिसे असमां पे चमकने का ।
122
रूह से रूह जहां मिल जाती है ।
ज़िस्म वहां ख़ुदा हो जाते है ।
123
जिंदगी कटती अपने ही तरीके से ।
हारते हम हर बार अपनो के तरीकों से ।
124
तक़दीरें ही तक़दीर तय किया करती है ।
रास्ते वही मंजिल बदल दिया करती है ।
.....
125
मिले तेरे मुकद्दर से वो सब तुझे ।
मिला न मेरे मुक़द्दर से जो मुझे ।
126
हूँ होश में , मैं मदहोश हूँ मगर ।
जिंदगी तेरे अंदाज़ से,हैरां हूँ मगर ।
127
लाभ हानि के खाते लिखते सब ।
मिलते नही लोग बे-मतलब अब ।
128
ख़्वाब सहेजे कुछ ख़्वाब समेटे ।
कुछ संग उठ खड़े कुछ अध लेटे ।
129
नियति ने कुछ तो तय किया होगा ।
जो घट रहा है वो तेरे लिए सही होगा ।
130
हुनर वो नही जो लेना जाने ।
हुनर वो है जो देना जाने ।
131
भीड़ बहुत थी पास मेरे मुस्कुराने बालो की
मेरी हर शिकस्त पर जश्न मनाने बालो की
132
कोशिश की हार कहाँ ।
प्रयास है प्रतिसाद जहाँ ।
133
ख्वाहिशें न बने "विवेक"सज़ा ।
खुशियों की हो इतनी सी बजह।
134
समंदर में तूफान छुपे होते है ।
साहिल अक्सर खामोश होते है ।
..136
वो यूँ दुआ का करम फरमातीं है।
वद्दुआएँ अब बेरुखी फरमातीं हैं।
136
अहसान ज़िंदगी का इतना सा मुझ पर ।
करम फ़रमाया हर अहसास का मुझ पर ।
137
कैसी अदावत है आज मेहफिल की ।
खिड़कियाँ खुलती नही अब दिल की।
...
155
अभिलाषा अम्बर की धरती को छूने की ।
एक धुंधली साँझ तले स्वप्न संजोने की ।
... 156
घोर निराशा जब तिमिर गहराती है ।
सूरज की आभा छाया गढ़ जाती है।
... 156
आवाज में मेरी कोई कशिश तो नही ।
फिर भी गुनगुनाया,करता हूँ कभी कभी ।
.... 157
साहिल को ही सागर हाँसिल है ।
सहता जो सागर की हलचल है ।
........158
लकीरें मुक्कदर की बदलती नहीं।
फिर भी लोग तक़दीर गड़ा करते हैं ।
..
159
डूबता रहा साँझ के मंजर सा ।
सफ़र जिंदगी रहा समंदर सा ।
160
कुछ टूटे ख्वाब ,ख़यालों से निकले ।
कुछ उलझे ज़वाब ,सवालों से निकले ।
.....
161
वक़्त से इतना ही मरासिम रहा ।
वक़्त मेरे वक़्त का कासिम रहा ।
.... मरासिम-रिश्ता
कासिम- विभाजित करने बाला
.....
162
हर फ़र्ज़ निभाए ,
बड़ी शिद्दत से ज़िंदगी के मैंने।
यह और है रास न आया मैं,
ज़िंदगी-ए-मुक़द्दार को ।
....
163
तराशने की चाह में ,
शाख-दर-शाख छटते रहे ।
इस तरह कुछ हम ,
अपनी ही छाँव से घटते रहे ।
....
164
हालात ने उम्र दराज बना दिया मुझे ।
यूँ तो शौक बचकाना अभी भी है मेरे ।
..
165
महकने दे , कुछ बहकने दे ।
इन रिश्तों को,बस चहकने दे ।
.......
166
वो सौदा मुफ्त का खूब हुआ ।
ये दर्द मेरा ही मेहबूब हुआ ।
... .
167
न था कसूर कोई किसी का ।
फलसफा यही जिंदगी का ।
.....
168
तलाशता निग़ाह से निग़ाह को रहा ।
ढूंढता एक लफ्ज़ इख़्तियार को रहा ।
.......
169
क्यूँ नाख़ुदा किनारों पे बिखरे पड़े है ।
क्यूँ कश्तियाँ समंदर जकड़े खड़े है ।
....
170
नज़र को नज़र का गुमां हो गया ।
निग़ाह-ए-नशा ईमान हो गया ।
........
171
एक झोंका हवा का है वो भरोसा कहाँ ।
दिखता वही जो सामने है वो धोका कहाँ ।
...
172
गुमनाम सा जिया , बेनाम सा जिया ।
खत बंद लिफाफा , पैगाम सा जिया ।
......
..... *विवेक दुबे"निश्चल"*@.....
173
ये शुकूँ , शुकूँ तलाशता रहा ।
यूँ सफ़र , जिंदगी राब्ता रहा ।
(contect)
....
174
मैं मानता रहा, मनाता रहा ।
ज़िस्म जिंदगी , सजाता राह ।
.. .....
175
हुआ नासमझ तब, कुछ समझ आया ।
चलता रहा कारवां ,सफ़र तन्हां पाया ।
.....
176
छूटता रहा सब , व्यर्थ बेकार सा ।
जिंदगी रहा तेरा ,इतना ऐतवार सा ।
....
177
छुपते रहे अश्क़ पलको की कोर में ।
छूटते रहे अपने अपनो की दौड़ में ।
.........
178
गिरा चश्म अश्क़, हैफ़ बेमतलब ।
सिमटी निग़ाह में, सिसकियां कही ।
(हैफ़ / अफसोस)
.....
179
अपने अपनो को , ही छलते हैं ।
छाँव तले ही तो ,कांटे पलते है ।
.....
180
खाता वक़्त ही वक़्त से ठोकर है ।
शायर तो कुछ कहता ही खोकर है ।
....
181
जो समझता होता ,आदमी को आदमी ।
बिगड़ते न रिश्ते , क़ायम रहते लाज़मी
......
182
यूँ मेरी नज़्म पढ़कर , ख़ामोश रहने बाला ।
यक़ीनन पाता है कुछ, निग़ाहों में अपनी ।
...
183
अंदाज़-ए-बयां कुछ और है , दर्द मेरा बयां करने का ।
लफ्ज़-ए-दवा तामीर किया करते है ,ज़ख्म बड़ा भरने का ।
.. ...
184
शान-ओ-शौकत में ,किसी से कम नही जरा सा।
है नही पास कुछ , और मगर गम नही जरा सा ।
....
185
लफ्ज़ आते नही जुबां पर शोहरत पाने को ।
"निश्चल"मचलता है दिल दिल बहलाने को ।
..
186
ख़्याल बुनकर, ख़ामोश हो जाते है ।
रूह के समंदर में, साहिल हो जाते है ।
.....
187
न देना पनाह , ख़्वाबो को कभी ।
है नही पास इनके, हक़ीक़त की जमीं ।
.... ..
188
होता रहा शरीक, सम्त* ख़याल ख़्वाब सा ।
टकरा कर साहिल से, समंदर मिजाज सा ।
.......(रस्ता)
189
इश्क़ ये भी है , एक इश्क़ वो भी है ।
है हांसिल साहिल , नाख़ुदा को ही है ।
.... ....
190
ख़्याल में ही सही, हक़ीक़त को समझ पाये है ।
ग़रज़ की,बारिश में ही,रिश्तों के बादल छाए है ।
.....
191
बिन तस्बीरों के , पहचान कहाँ होती है ।
एक स्याह जिंदगी , ईमान कहाँ होती है ।
....
192
जिसने भी जो बोया बस वो ही काटा है ।
भाग्य कहाँ कब किसने किससे बाँटा है ।
....
193
तक़दीर से ही तदबीर खिला करती है ।
तक़दीर तो रब-ए-रजा मिला करती है ।
....
.... विवेक दुबे"निश्चल"@...
194
जीवन तो एक आनंदोत्सव है ।
समय से मिलता सबको सब है ।
..195
तू क्यों चिंता करता है ।
जब वो तेरी चिंता करता है।
....196
उसी उत्साह से तू फिर जुटना ।
चाहता है तू तुझे जितना ।
...197
ठंडक चाँद की तपिश घोलती है ।
क्यूँ बिन कहे निग़ाह बोलती है ।
....198
हिचकिचाहट की भी आहट है।
"निश्चल" यूँ मुझे इसकी आदत है।
...199
उम्र ज्यों पकती है,तन तपिश घटती है।
हाँ इस पड़ाव पर, ठंड तो लगती है ।
...200
उम्र पकती रही रौनकें घटती रहीं।
तजुर्बा-ऐ-ताव में हयात तपती रही।
हयात (जीवन ज़िंदगी)
...201
टूटते है सपने और बिखरते है ख़्वाब ।
भोर की आहट में जो जागते है आप ।
..."निश्चल"@...
202
"निश्चल"तदवीर से तक़दीर भी हारी है ।
हो होंसला तो तेरी ये दुनियाँ सारी है ।
...203
सफ़ा सफ़ा जिंदगी मैं स्याह कर गया ।
मैं अपने आपको यूँ गुमराह कर गया ।
...204
जिसने मेरा अहसान पाया कभी ।
हाँ वो मेरे काम न आया कभी ।
....205
बीता दिन अपना कल की फ़िकरों में ।
छूटा गया आज हम से ही जिकरों में ।
....206
ऐ विवेक सोचता है तू क्यों कुछ ।
सोच रखा है जब उसने सब कुछ ।
.. 207
रिश्ते तो अब मजबूरी है।
दिल से दिल की दूरी है ।
..208
बिखेरकर अपने आप को ,सिमेटता गया ।
नम निगाहों से जिंदगी तुझे मैं देखता गया ।
....209
नम निगाहों से इश्क की तमिरदारी कर लेते है ।
कुछ यूँ खुद से खुद की हम यारी कर लेते है ।
....210
नादानियां कुछ उम्र की उम्र भर चलती रही ।
चाँदनी सँग चाँद के फिर भी चलती रही ।
.....211
किस्मत वक़्त पर सबको आवाज देती है ।
चलना हमे है साथ किसके अहसास देती है ।
....212
ये उम्र एक मुक़ाम खोजती सी ।
ज़िंदगी का पयाम खोजती सी ।
.....
213
मोहलत न मिली वक़्त से मोहब्बत के वास्ते ।
तय होते रहे यूँ तन्हा तन्हा जिंदगी के रास्ते ।
214
कुछ पूछ कर सवाल,
वज्म महफ़िल के सामने ,
"निश्चल"साहिल से ,
समंदर के न हालात पूछिये ।
....
215
लहरों से ही जिसकी ,
भींगते जो किनारे रहे ।
निग़ाह लिए आस की ,
साथ वो बे-सहारे रहे ।
.....विवेक दुबे"निश्चल"@....
.Blog post 9/2/21
216
जिंदगी तो लौट कर फिर आती है ।
खुशियों को नज़र क्यों लग जाती है ।
217
वक़्त कुछ इस तरह गुजरता रहा ।
वक़्त से वक़्त बे-असर सा रहा ।
..218
मुझे सराहा नहीं कभी संवारा नहीं ।
तुझे ज़िंदगी इश्क़ मेरा गवारा नही ।
....
219
ना कर तज़किरा तू रंज-ओ-मलाल पर ।
छोड़ वक़्त को तू वक़्त के ही हाल पर ।
...220
वो चाहतों की चाहत, ना रही कोई मलालत ।
खोजतीं रहीं निगाह मेरी नज़्म-ए-ज़लालत ।...
221
हुनर वो नही जो लेना जाने ।
हुनर वो है जो देना जाने ।
222
भीड़ बहुत थी पास मेरे मुस्कुराने बालों की ।
मेरी हर शिकस्त पर जश्न मनाने बालों की।
223
कवि देखता दुनियाँ को दुनियाँ की नजर से।
दुनियाँ देखती कवि को बस अपनी नजर से ।
224
यह नसीब भी आदत बदलता रहा ।
बदल बदल कर साथ चलता रहा ।
.... 225
मुक़ाम की तलाश को तलाशता रहा ।
वो हर दम हारते से हालात सा रहा ।
... 226
अपने आप से यूँ भी सौदा रहा।
ज़िन्दगी का यूँ भी मसौदा रहा।
....227
अपने ही आप को ढालता रहा ।
ज़ज्ब जज्बात को पालता रहा ।
..228
सच में झूठ का साथ देता राह ।
कुछ यूँ सच का साथ देता रहा ।
...229
मेरे फ़लसफ़े का भी सफ़ा होता ।
मुंसिफ मुझसे यूँ ना ख़फ़ा होता ।
...230
चलती ही रही कशमकश बड़ी ।
जिंदगी साथ जिंदगी के यूँ खड़ी ।
.... 231
उसे जिंदगी से मोहलत नही मिली ।
मुझे जिंदगी से तोहमत यही मिली ।
....232
उसे जिंदगी से मोहलत यदि मिलती ।
मुझे जिंदगी से तोहमत नही मिलती ।
....233
झूँठ नही तनिक भी, है यही सही ।
जिसे कहा सही, है वही नही सही ।
..234
आँख बंद करने से अंधेरा घटता नहीं ।
आता भोर का सबेरा अंधेरा टिकता नही ।
.... 235
जागता रहा , कुछ हम राज सा रहा ।
छूटता किनारा , दरिया साथ सा बहा ।
....236
बुझना बुझदिली , जलना मुहाल सा रहा ।
तूफ़ान के दिये सा, ही मेरा हाल सा रहा ।
...237
सिखाता वक़्त , हालात से हरदम रहा ।
हारता इंसान , ज़ज्बात से हरदम रहा ।
...238
तोड़ न पाईं होंसले, वो मुश्किलें भी ,
सँग छालों के , पाँव सफर करता रहा ।
...239
कौन है अपना , अब किसे कहूँ नाख़ुदा ,
लूटने का काम , जब रहबर करता रहा ।
...240
दिन उजलों से टले , रातें अंधेरी साथ सी ।
चलते रहे सफ़र पर, बस हसरतें हाथ सी ।
विवेक दुबे"निश्चल"@..
Blog post 9/2/21
डायरी 3
241
"विवेक"यह सफर विकल्प से संकल्प तक का ।
लगता सारा ज़ीवन "निश्चल"सफर दो पग का ।
242
मत कर तू शक़ उसके वुजूद पर ।
कायम है जहां जिसके खुलूस पर ।
खुलूस /सच्चाई
243
नियत नियति निरंतर,
काल तले दिन करता अंतर ।
कर्ता हर्ता सृष्टि का ,
महाकाल शिव शंकर ।
244
सिमट रहे शब्द सब ,
खो रहीं परिभाषाएं ।
रात गुजारी नैनो में ,
भोर तले अलसाई आशाएँ ।
....
245
बस एक सत्य यही है के तू सत्य नही है ।
मिटना सब एक दिन मिटता ये सत्य नही है ।
246
जीवन स्वम् की एक खोज उठते प्रश्न ।
एक जिज्ञासा स्वयं को पाने की आशा ।
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