रविवार, 22 नवंबर 2015

हम है दूव है हरी भरी ...


हम दूव है हरी भरी
जड़ से जम जाते है
नदिया सा न बह पते है
रौंधे जाते है झुक जाते है
फिर उठ जाते है
सूखे भी जो कहीं कभी
शबनम की बूंदों से ही जी जाते है
नदिया सा न बहा पाते है
हम दूव है हरी भरी .....
....विवेक®....

शब्दों की मार .....


देखो यह शब्दों की मार ,
शब्दों से होते शब्दों पर वार ।
उलट पलट कर, पलट उलट कर ,
होते नित नये तीर तैयार ।
 व्यंग धनुष पर, भाषा के तरकश से ,
 यह तीर करें , नित नये प्रहार ।
 कभी शब्द बाण चलें ऐसे ,
 मधुवन से पुष्प झड़े जैसे ।
 कभी शब्द बाण बने ऐसे ,
 सावन की बदली बरसे जैसे ।
 कभी काम बाण बन मन हरते ऐसे,
 प्रणय मिलन की बेला आई जैसे ।
कभी शब्द बाण ने किया प्रहार,
 मन कांप गया, सागर में चढ़ा ज्वार ।
 कभी व्यंग धनुष ने संधान किया,
 तीक्ष्ण शब्द को कमान किया ।
छोड़ दिया फिर साध लक्ष्य को,
कर अग्नि वर्षा,मन घायल करने को।
 यह शब्दों की माया नगरी ,
 कभी बिखरी कभी संवरी ।
 शब्दों में ही बसती दुनियां ,
हमरी तुम्हरी, तुम्हरी हमरी ।
     ....विवेक....

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2015

मानव की परिभाषा



मानब की परिभाषा में
  मैंने एक दिन
 खुद को रख कर देखा
 हो गया पानी पानी
 जेसे ही खुद को दिल से
  मानब कहकर देखा
  क्या आये थे करने
 क्या कर बेठे
 अपने बन
 अपनों को ही
 छल बेठे
 यही सोचता मैं
 कौन हूँ मैं
 कहा से आया
  क्यों आया
 मानब हो कर
 मानब न बन पाया
     ....विवेक...

आहट एक और गुलामी की


एक गुलामी की फिर आहट
रहीं नही किसी को आज़ादी की चाहत
ईमान जहा बिकते हों
महंगे सामान इंसान जहा सस्ते हों
हर मजहब के भगबान जहा बिकते हों
मुर्दों की सी बस्ती में
आज़ादी की सजती हर दिन अर्थी हो
केसी आशा क्या अभिलाषा
छाई चारों और निराशा  
 ......विवेक.....


देखो गांधी


देखो कितना बदल गये अब हम गांधी ,
जो थे आदर्श तेरे प्रण प्राण गांधी ।
 कुचल रहे उन्हें हम सरेआम गांधी ,
था पिरोया एक माला में सबको गांधी ।
आज हो रहे अपनों के अपनों से संग्राम गांधी ,
 यूँ तो हो राष्ट्र पिता तुम गांधी ।
आते बस दो दिन तुम याद गांधी ,
जिन नोटों पर तुम स्थान पाये गांधी ।
 बही नोट आज हुए बदनाम गांधी ,
शकुनि की चलें फिर चल रहीं गांधी ।
दाव लग रही द्रोपती हर बार गांधी ,
 मचा महाभारत सा फिर संग्राम गांधी ।
 एक बार तुम फिर आ जाओ गांधी ,
  अपने सपनों को साकार बना जाओ गांधी ।
   
   ( बापू के जन्म दिवस कुछ सोचे सब मिल जुल कर )
              ....विवेक....

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2015

नहीं जाना मुझे उन ऊंचाइयों पर


नहीं जाना मुझे
              उन ऊंचाइयों पर
 नहीं छूना मुझे
                   वो आकाश
 रहूँ इसी धरा
                    धरातल पर
चाहूँ हर पल
                 अपनों का साथ
 यही मेरा आकाश

          ....विवेक...

शनिवार, 19 सितंबर 2015

आशाओं के दीप


आशाओं के दीप जलाता हूँ
 खुद में खुद खो जाता हूँ
 कुछ कह जाता हूँ
भावो में वह जाता हूँ
 भावो से भिड जाता हूँ
 खुद से खुद टकराता हूँ
 मरता हूँ फिर जी जाता हूँ
 फिर नई रौशनी पता हूँ
 फिर एक दीप जलाता हूँ
 आशाओं में फिर खो जाता हूँ
 आशाओं से आशाओं के
दीप जलाता हूँ
    ...विवेक....


मंगलवार, 25 अगस्त 2015

दर्द सीप का



 सीप ने जब मोती जाना होगा
 दर्द बे इन्तेहाँ सहा होगा
 देख मोती की चमक
 सीप का दर्द कुछ कम हुआ होगा
 क्या मोती ने सीप के दर्द को समझा होगा
 मोती तो अंगुली में नगीना बन जड़ा होगा
       .....विवेक.....

यूँ मात खा रहे हम


यहीं हम मात खा रहे है
 अपनों से ही घात खा रहे है
 ख़ंजर एक हाथ में जिनके
 उन्हें गले लगा रहे है
 करते जो झुक कर प्रणाम
 उन पर हम हाथ उठा रहे है
 हम क्यों अपना इतिहास
 भुलाते जा रहे है
        .....विवेक.....

रविवार, 23 अगस्त 2015

अंश माता पिता


माँ सरस्वती की कृपा से,
मुझ में पिता का बो अंश आया है,
मैने अपने आप में पिता जैसा
रचनाकार भी पाया है ,
मुझ पर "नेहदूत" का ,नेह बरसता
माँ सरस्वती की कृपा
मिलती बारम्बार
यही मेरा "सौभाग्य "

माँ मनोरमा की
मनोरम कृपा भी ,
साथ साथ आई है
जिसके कारण सारी दुनियां
बस भाई ही भाई है ,

है माँ बस इतना करना उपकार
मिले जन्म जन्म तक
यही माँ, यही पिता ,
बारम्बार हर बार, बार बार,
हो माँ तेरा उपकार,
.....विवेक...

पिता ...


मनचाहा बरदान मांग लो ।
अनचाहा अभय दान माँग लो ।।
उसके होंठो की मुस्कान माँग लो ।
जीवन का संग्राम माँग लो ।।
सारा पौरुष श्रृंगार माँग लो ।
साँसों से प्राण माँग लो ।।
बस हँसते हँसते हाँ ।
कभी न निकले ना ।।
कुछ ऐसा होता है पिता ,
क्या हम हो सकेंगे कभी कहि ,
अपने इस ईस्वर के आस पास ,,
तब शायद पिता को समझ सकें कुछ हम भी ,,,
...विवेक.....

मेरे पिता ....


बरगद से बिशाल पिता।
हर मुश्क़िल की ढाल पिता ।।
ख़ुश है हर हाल पिता ।
कहे न दिल का हाल पिता ।।
हर मुश्क़िल का संबल पिता ।
निर्बल का आत्मबल पिता ।।
कभी धूप कभी छांब पिता ।
मुश्किल में न खिज़ा पिता ।।
हर मुश्किल से जीता ।
पिता हर दुःख पीता पिता ।।
हलाहल कंठ थामता पिता ।
शिवः सामान नीलकंठ पिता ।।
बस खुशियाँ बाँटता पिता ।
तुम शुभांकर "नेहदूत" पिता ।।
तुम्हे शुभकामनाये, मैं क्या दूँ पिता ।
तेरे चरणों में रहे, सदा मेरा ध्यान पिता ।।
......विवेक...

नीव का पत्थर ....


बने महल और अटारे
मंदिर मस्जिद और गुरुद्वारे
कही ताज महल खड़ा
कही मीनार सर उठा रही
इनमे लगे हर पत्थर को देख
दुनिया दांतों तले अंगुली दवा रही
देख देख करती वाह वाह
क्या कला है ..क्या कोशल है ..
पर .......
देखा न कभी सोचा किसी ने
वो नीब के पत्थर कैसे होंगे
क्या गुजर रही होगी उन पर
किस हाल में होंगे .....
जो दफन हो गए
सदा सदा के लिए
इन उकेरे गए
नक्काशी दार
पत्थरौ की खातिर
आज जिन्हें देख दुनिया
सजदे में झुक जाती है
नीब के पत्थर उस
पत्थर को भुला कर . ..
........... विवेक....

शनिवार, 22 अगस्त 2015

मैं काव्य हूँ


   मैं काव्य हूँ ---------
 इन शब्दों के बंधन से,मुझे मत बंधो।
 भावो के अर्पण से, मुझे मत भींचो।
 अर्थो के तर्पण से, मुझेमत सींचो।
 काव्य हूँ में ,,,,,,
 मुक्त हवा सा निर्झर बहता हूँ ।
 कहता हूँ बस कहता हूँ ।
 अपनी यादों में जीता हूँ ।
 अमृत सुधा ठुकराता हूँ ।
 विष हलाहल भी पीता हूँ।
 काँटों के पथ पर भी,
 हँसते हँसते चलता हूँ ।
 फूलो से भी चोटिल होता हूँ ।
 काव्य हूँ में बस चलता हूँ ।
 चलता ही रहता हूँ ।
 काव्य हूँ मै ,,,,,,,
                 कहता हूँ बस कहता हूँ ।
                 सत्य उजागर करता हूँ ।
                  शब्द सार्थक करता हूँ ।
                  भाव जाग्रत करता हूँ ।
                  अर्थ निचोड़ा करता हूँ ।
                   काव्य हूँ मैं बस,
                   काव्य कहा करता हूँ ।
                    हाँ काव्य हूँ मैं ,,,..
                     ......विवेक.......

कलम चलती है शब्द जागते हैं।

सम्मान पत्र

  मान मिला सम्मान मिला।  अपनो में स्थान मिला ।  खिली कलम कमल सी,  शब्दों को स्वाभिमान मिला। मेरी यूँ आदतें आदत बनती गई ।  शब्द जागते...