कुछ खास नहीं कवि पिता की संतान हूँ । ..... निर्दलीय प्रकाशन भोपाल द्वारा बर्ष 2012 में "युवा सृजन धर्मिता अलंकरण" से अलंकृत। जन चेतना साहित्यिक सांस्कृतिक समिति पीलीभीत द्वारा 2017 श्रेष्ठ रचनाकार से सम्मानित कव्य रंगोली त्रैमासिक पत्रिका लखीमपुर खीरी द्वारा साहित्य भूषण सम्मान 2017 से सम्मानित "निश्चल" मन से निश्छल लिखते जाओ । ..... . (रचनाये मौलिक स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित .)
शनिवार, 5 दिसंबर 2015
बुधवार, 2 दिसंबर 2015
पढ़ने बाले भी मिल जायेंगे
आप लिखते हो दिल से
पढ़ने बाले भी मिल जायेंगे
आज नही तो कल आयेंगे
सौ नही दो आयेंगे
पर जो आयेंगे
सच्चे दिल से आयेंगे
जो अपने कहलायेंगे
....विवेक.....
रविवार, 29 नवंबर 2015
शनिवार, 28 नवंबर 2015
सावधान इन जय चंदों से
...सावधान .....
इनको ही स्वीकार करो
इनकी ही जय जयकार करो
न इनका प्रतिकार करो
तब नहीं कही कोई संकट
बस हो गये सेक्युलर तब सब
सहष्णुता भी सुरक्षित सिर्फ तब
सावधान इन जयचंदो से
बगुला भक्ति के इनके फंडों से
छदम् दिखावा इनका
छल कपट धंधा जिनका
हमने जैसे ही अपना सोचा
क्यों लगा इनको यह खोटा
सहते ही तो आये हैं अब तक
खूब किया छल कपट अब तक
और नहीं अब बस अब बस
....विवेक..
राधिका मन सी प्यासी
राधिका मन सी मैं प्यासी ।
बन कृष्ण सखा की दासी ।
रच जाऊं मन मे ।
बस जाऊं नैनन मे।
मिल जाऊं धड़कन मे ।
छा जाऊं चितवन मे ।
न भेद रहे फिर कोई ।
इस मन मे उस मन मे ।
...विवेक...
सोमवार, 23 नवंबर 2015
बारिश का नजारा
बारिश का नजारा हो ।
खिड़की का सहारा हो ।
एक चाँद हमारा हो ।
एक सितारा तुम्हारा हो ।
दिल ने दिल को हरा हो ।
धरती अंबर हमारा हो ।।
.....विवेक...
रविवार, 22 नवंबर 2015
हाँ वक़्त बदलते देखा है
हाँ वक़्त बदलते देखा है ।
सूरज को ढ़लते देखा है ।
चन्दा को घटते देखा है ।
तारों को गिरते देखा है ।
हाँ वक़्त बदलते देखा है ।
हिमगिरि पिघलते देखा है ।
सावन को जलते देखा है ।
सागर को जमते देखा है ।
नदियां को थमते देखा है ।
हाँ वक़्त बदलते देखा है ।
खुशियों को छिनते देखा है ।
खुदगर्जी का मंजर देखा है ।
अपनों को बदलते देखा है ।
हाँ वक़्त बदलते देखा है ।
नही कोई दस्तूर जहां ,
ऐसा दिल भी देखा है ।
नजरों का वो मंजर देखा है ।
उतरता पीठ में खंजर देखा है ।
हाँ वक़्त बदलते देखा है ।
.....विवेक....
हम है दूव है हरी भरी ...
हम दूव है हरी भरी
जड़ से जम जाते है
नदिया सा न बह पते है
रौंधे जाते है झुक जाते है
फिर उठ जाते है
सूखे भी जो कहीं कभी
शबनम की बूंदों से ही जी जाते है
नदिया सा न बहा पाते है
हम दूव है हरी भरी .....
....विवेक®....
शब्दों की मार .....
देखो यह शब्दों की मार ,
शब्दों से होते शब्दों पर वार ।
उलट पलट कर, पलट उलट कर ,
होते नित नये तीर तैयार ।
व्यंग धनुष पर, भाषा के तरकश से ,
यह तीर करें , नित नये प्रहार ।
कभी शब्द बाण चलें ऐसे ,
मधुवन से पुष्प झड़े जैसे ।
कभी शब्द बाण बने ऐसे ,
सावन की बदली बरसे जैसे ।
कभी काम बाण बन मन हरते ऐसे,
प्रणय मिलन की बेला आई जैसे ।
कभी शब्द बाण ने किया प्रहार,
मन कांप गया, सागर में चढ़ा ज्वार ।
कभी व्यंग धनुष ने संधान किया,
तीक्ष्ण शब्द को कमान किया ।
छोड़ दिया फिर साध लक्ष्य को,
कर अग्नि वर्षा,मन घायल करने को।
यह शब्दों की माया नगरी ,
कभी बिखरी कभी संवरी ।
शब्दों में ही बसती दुनियां ,
हमरी तुम्हरी, तुम्हरी हमरी ।
....विवेक....
शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2015
मानव की परिभाषा
मानब की परिभाषा में
मैंने एक दिन
खुद को रख कर देखा
हो गया पानी पानी
जेसे ही खुद को दिल से
मानब कहकर देखा
क्या आये थे करने
क्या कर बेठे
अपने बन
अपनों को ही
छल बेठे
यही सोचता मैं
कौन हूँ मैं
कहा से आया
क्यों आया
मानब हो कर
मानब न बन पाया
....विवेक...
आहट एक और गुलामी की
एक गुलामी की फिर आहट
रहीं नही किसी को आज़ादी की चाहत
ईमान जहा बिकते हों
महंगे सामान इंसान जहा सस्ते हों
हर मजहब के भगबान जहा बिकते हों
मुर्दों की सी बस्ती में
आज़ादी की सजती हर दिन अर्थी हो
केसी आशा क्या अभिलाषा
छाई चारों और निराशा
......विवेक.....
देखो गांधी
देखो कितना बदल गये अब हम गांधी ,
जो थे आदर्श तेरे प्रण प्राण गांधी ।
कुचल रहे उन्हें हम सरेआम गांधी ,
था पिरोया एक माला में सबको गांधी ।
आज हो रहे अपनों के अपनों से संग्राम गांधी ,
यूँ तो हो राष्ट्र पिता तुम गांधी ।
आते बस दो दिन तुम याद गांधी ,
जिन नोटों पर तुम स्थान पाये गांधी ।
बही नोट आज हुए बदनाम गांधी ,
शकुनि की चलें फिर चल रहीं गांधी ।
दाव लग रही द्रोपती हर बार गांधी ,
मचा महाभारत सा फिर संग्राम गांधी ।
एक बार तुम फिर आ जाओ गांधी ,
अपने सपनों को साकार बना जाओ गांधी ।
( बापू के जन्म दिवस कुछ सोचे सब मिल जुल कर )
....विवेक....
गुरुवार, 29 अक्टूबर 2015
नहीं जाना मुझे उन ऊंचाइयों पर
नहीं जाना मुझे
उन ऊंचाइयों पर
नहीं छूना मुझे
वो आकाश
रहूँ इसी धरा
धरातल पर
चाहूँ हर पल
अपनों का साथ
यही मेरा आकाश
....विवेक...
शनिवार, 19 सितंबर 2015
आशाओं के दीप
आशाओं के दीप जलाता हूँ
खुद में खुद खो जाता हूँ
कुछ कह जाता हूँ
भावो में वह जाता हूँ
भावो से भिड जाता हूँ
खुद से खुद टकराता हूँ
मरता हूँ फिर जी जाता हूँ
फिर नई रौशनी पता हूँ
फिर एक दीप जलाता हूँ
आशाओं में फिर खो जाता हूँ
आशाओं से आशाओं के
दीप जलाता हूँ
...विवेक....
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कलम चलती है शब्द जागते हैं।
सम्मान पत्र
मान मिला सम्मान मिला। अपनो में स्थान मिला । खिली कलम कमल सी, शब्दों को स्वाभिमान मिला। मेरी यूँ आदतें आदत बनती गई । शब्द जागते...
