कुछ खास नहीं कवि पिता की संतान हूँ । ..... निर्दलीय प्रकाशन भोपाल द्वारा बर्ष 2012 में "युवा सृजन धर्मिता अलंकरण" से अलंकृत। जन चेतना साहित्यिक सांस्कृतिक समिति पीलीभीत द्वारा 2017 श्रेष्ठ रचनाकार से सम्मानित कव्य रंगोली त्रैमासिक पत्रिका लखीमपुर खीरी द्वारा साहित्य भूषण सम्मान 2017 से सम्मानित "निश्चल" मन से निश्छल लिखते जाओ । ..... . (रचनाये मौलिक स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित .)
रविवार, 19 फ़रवरी 2017
शनिवार, 19 नवंबर 2016
बचपन
बीत गया तन ।
रीत गया मन
ज्यों ज्यों बीता ,
बचपन बचपन ।
.
तन की तन से अनबन ।
मन की मन से उलझन ।
ज्यों ज्यों बीता ,
बचपन बचपन ।
.
ग़ुम हुआ कुछ यूँ ।
वो नटखट तन मन ।
ज्यों ज्यों बीता ,
बचपन बचपन ।
........ विवेक ......
शनिवार, 29 अक्टूबर 2016
गुरुवार, 30 जून 2016
ज़िन्दगी
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आशाओं संग यह अभिलाषाओं से हारी है ।
नित् नए स्वप्न सजा यह दुल्हन सी साजी है ।
हो रहे पग , पग पग घायल घुंघरू बाँधे बाँधे ,
घुँघरू की थिरकन पर यह घुँघरू सी बाजी है ।
अभिलाषाओं संग यह रक्कासा सी नाची है।
..... v विवेक ©......
बुधवार, 8 जून 2016
सोमवार, 6 जून 2016
इंसानो में भगवान ढूँढता हूँ
1--
इंसानो में भगवान ढूँढता हूँ ।
दुनियाँ में ईमान ढूँढता हूँ ।
लूटाकर में खुशियाँ सब अपनी ,
चेहरों पर मुस्कान ढूँढता हूँ ।
.... विवेक ....
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2--
छूट रहा है कुछ साँझ ढले ।
भूल रहा हूँ कुछ भोर तले ।
जीवन की इस आपाधापी में ,
कैसे इस मन को ठौर मिले ।
.... विवेक .......
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3---
हम वो किताब ढूँढते रहे ।
रिश्तों के हिसाब ढूँढते रहे ।
मुक़द्दर में नहीं थे जो रिश्ते ,
उन रिश्तों के नक़ाब ढूँढते रहे ।
.... विवेक ...
रविवार, 5 जून 2016
सामने है सर्व नाश फिर भी नही आती तनिक भी लाज
कट रहे वन जन हुए सघन ।
थम गया जल ,
बहता था जो कल कल , कल ।
कहता है मानव विकास हुआ ,
पर प्रकृति का तो सर्व नाश हुआ ।
माना मानव ने गगन को छुआ ,
पर धरा को धूल धुएं से भर दिया ।
क्या पाया था क्या देकर जाओगे ,
इस महा विनाश से सोचो कैसे बच पाओगे ।
जब वसुंधरा को श्रृंगार रहित कर ,
विधवा सा कर जाओगे ।
..... विवेक .....
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विश्व पर्यावरण दिवस पर दो शब्द ....
शनिवार, 28 मई 2016
बुधवार, 25 मई 2016
जीवन मृत्यु से हारा है
शांत निशा संग अँधियारा है
दिनकर संग उजियारा है
जीवनपथ पर चलते चलते
जीवन मृत्यु से हारा है
..... विवेक ..
नहीं परवाह
नहीं परवाह मान की सम्मान की ।
फ़िक्र है मुझे बस स्वाभिमान की ।
मैं नहीं मांगता दुनियाँ से कुछ भी ,
उसे तो फ़िक्र है दोनों जहान की ।
...... विवेक .....
बुधवार, 20 अप्रैल 2016
शब्दों की मार
देखो यह शब्दों की मार ,
शब्दों से होते शब्दों पर वार ।
उलट पलट कर, पलट उलट कर ,
होते नित नये तीर तैयार ।
व्यंग धनुष पर, भाषा के तरकश से ,
यह तीर करें , नित नये प्रहार ।
कभी शब्द बाण चलें ऐसे ,
मधुवन से पुष्प झड़े जैसे ।
कभी शब्द बाण बने ऐसे ,
सावन की बदली बरसे जैसे ।
कभी काम बाण बन मन हरते ऐसे,
प्रणय मिलन की बेला आई जैसे ।
कभी शब्द बाण ने किया प्रहार,
मन कांप गया, सागर में चढ़ा ज्वार ।
कभी व्यंग धनुष ने संधान किया,
तीक्ष्ण शब्द को कमान किया ।
छोड़ दिया फिर साध लक्ष्य को,
कर अग्नि वर्षा,मन घायल करने को।
यह शब्दों की माया नगरी ,
कभी बिखरी कभी संवरी ।
शब्दों में ही बसती दुनियां ,
हमरी तुम्हरी, तुम्हरी हमरी ।
....विवेक....
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कलम चलती है शब्द जागते हैं।
सम्मान पत्र
मान मिला सम्मान मिला। अपनो में स्थान मिला । खिली कलम कमल सी, शब्दों को स्वाभिमान मिला। मेरी यूँ आदतें आदत बनती गई । शब्द जागते...









