शनिवार, 19 नवंबर 2016

रंगोली प्रकाशन



बचपन


 
 बीत गया तन ।
 रीत गया मन
ज्यों ज्यों बीता ,
बचपन बचपन ।
.
 तन की तन से अनबन ।
 मन की मन से उलझन ।
ज्यों ज्यों बीता ,
 बचपन बचपन ।
 .
ग़ुम हुआ कुछ यूँ ।
 वो नटखट तन मन ।
ज्यों ज्यों बीता ,
बचपन बचपन ।
 ........ विवेक ......

गुरुवार, 30 जून 2016

ज़िन्दगी



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आशाओं संग यह अभिलाषाओं से हारी है ।
 नित् नए स्वप्न सजा यह दुल्हन सी साजी है ।
 हो रहे पग , पग पग घायल घुंघरू बाँधे बाँधे ,
 घुँघरू की थिरकन पर यह घुँघरू सी बाजी है ।
 अभिलाषाओं संग यह रक्कासा सी नाची है।
     ..... v विवेक ©......

बुधवार, 8 जून 2016

जहाँ धरती अम्बर मिलते हैं


दूर क्षितिज पर जहाँ धरती अम्बर मिलते हैं ।
 जहाँ सूरज चन्दा ढलते और निकलते हैं ।
  उस मिलन बिंदु पर एक नीली रेखा है,
 ले चलूँ तुझे वहाँ जहाँ न कोई सीमा रेखा है ।
     ..... विवेक © .....

हाथों के अंज़ाम बदलते हैं


वक़्त नही बदलता इंसान बदलते हैं ।
पाषाण वही रहता भगवान बदलते हैं ।
होतीं हैं लकीरें ----- हाथों में सबके ,
फिर भी हाथों के अंजाम बदलते हैं ।
... v विवेक © ....

सोमवार, 6 जून 2016

इंसानो में भगवान ढूँढता हूँ


1--
इंसानो में भगवान ढूँढता हूँ ।
 दुनियाँ में ईमान ढूँढता हूँ ।
 लूटाकर में खुशियाँ सब अपनी ,
 चेहरों पर मुस्कान ढूँढता हूँ ।
    .... विवेक ....
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2--
छूट रहा है कुछ साँझ ढले ।
भूल रहा हूँ कुछ भोर तले ।
जीवन की इस आपाधापी में ,
कैसे इस मन को ठौर मिले ।
.... विवेक .......
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3---
हम वो किताब ढूँढते रहे ।
रिश्तों के हिसाब ढूँढते रहे ।
मुक़द्दर में नहीं थे जो रिश्ते ,
उन रिश्तों के नक़ाब ढूँढते रहे ।
    .... विवेक ...

रविवार, 5 जून 2016

सामने है सर्व नाश फिर भी नही आती तनिक भी लाज


कट रहे वन जन हुए सघन ।
 थम गया जल ,
बहता था जो कल कल , कल  ।
 कहता है मानव विकास हुआ ,
 पर प्रकृति का तो सर्व नाश हुआ ।
 माना मानव ने गगन को छुआ ,
 पर धरा को धूल धुएं से भर दिया ।
 क्या पाया था क्या देकर जाओगे ,
 इस महा विनाश से सोचो कैसे बच पाओगे ।
 जब वसुंधरा को श्रृंगार रहित कर ,
 विधवा सा कर जाओगे ।
    ..... विवेक .....
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विश्व पर्यावरण दिवस पर दो शब्द ....

शनिवार, 28 मई 2016

अँधेरों से अँधेरे छीन लें हम जरा


अंधेरों से अँघेरे छीन ले हम जरा ।
चराग़-ए-रौशनी बाँट दे हम जरा ।
 वक़्त से न जीत पाएंगे जानते है हम ।
 वक़्त से ही वक़्त को सींच लें हम जरा ।
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 न थमें कदम मुश्किलो में कभी ।
 कदम-दर-कदम मंज़िलें नाप लें जरा
 हसरतें न करें मुक़ाम हम कभी ,
 अपने होंसलों को भी भांप लें जरा ।
   ..... विवेक ......

बुधवार, 25 मई 2016

साथ चले जो तू ...


साथ चले जो तू चाँद फ़तह कर लूँ मैं ।
तेरे ही सहारे से अम्बर को जमीं कर दूँ मैं  ।
तेरी ही दुआओं से पर्वत बाँहों में भर लूँ मैं ।
तेरे ही इरादों से रुख हवाओं के पलट दूँ मैं ।
तेरी ही पनाहों में सागर जल अंजुली भर लूँ मैं ।
साथ तेरा जो हो खुद को सिकन्दर कर लूँ मैं ।
     .... विवेक ...

जीवन मृत्यु से हारा है


शांत निशा संग अँधियारा है
 दिनकर संग उजियारा है
 जीवनपथ पर चलते चलते
 जीवन मृत्यु से हारा है
    ..... विवेक ..

नहीं परवाह


नहीं परवाह मान की सम्मान की ।
फ़िक्र है मुझे बस स्वाभिमान की ।
मैं नहीं मांगता दुनियाँ से कुछ भी ,
उसे तो फ़िक्र है दोनों जहान की ।
...... विवेक .....

बुधवार, 20 अप्रैल 2016

शब्दों की मार


देखो यह शब्दों की मार ,
शब्दों से होते शब्दों पर वार ।
उलट पलट कर, पलट उलट कर ,
होते नित नये तीर तैयार ।
 व्यंग धनुष पर, भाषा के तरकश से ,
 यह तीर करें , नित नये प्रहार ।
 कभी शब्द बाण चलें ऐसे ,
 मधुवन से पुष्प झड़े जैसे ।
 कभी शब्द बाण बने ऐसे ,
 सावन की बदली बरसे जैसे ।
 कभी काम बाण बन मन हरते ऐसे,
 प्रणय मिलन की बेला आई जैसे ।
कभी शब्द बाण ने किया प्रहार,
 मन कांप गया, सागर में चढ़ा ज्वार ।
 कभी व्यंग धनुष ने संधान किया,
 तीक्ष्ण शब्द को कमान किया ।
छोड़ दिया फिर साध लक्ष्य को,
कर अग्नि वर्षा,मन घायल करने को।
 यह शब्दों की माया नगरी ,
 कभी बिखरी कभी संवरी ।
 शब्दों में ही बसती दुनियां ,
हमरी तुम्हरी, तुम्हरी हमरी ।
     ....विवेक....

कलम चलती है शब्द जागते हैं।

सम्मान पत्र

  मान मिला सम्मान मिला।  अपनो में स्थान मिला ।  खिली कलम कमल सी,  शब्दों को स्वाभिमान मिला। मेरी यूँ आदतें आदत बनती गई ।  शब्द जागते...