सोमवार, 12 फ़रवरी 2018

छंटती है धुँध

 छंटती है धुँध कोहरे हटते हैं।
 खिली धूप से चेहरे निखरते हैं।
   चलते छोड़कर राह पुरानी ,
   नई राह होंसले आंगे बढ़ते हैं।
... विवेक दुबे "निश्चल"...

खाते कसमें हम

 खाते हम कसमें अक़्सर ।
 टुटा करतीं कसमें अक़्सर ।
  खाकर कसमें भूले अगले पल ,
 यह दिल रखने के ज़रिये भर।
   .... विवेक दुबे "निश्चल"©...

निश्चल मन

 पुकार लेखनी शब्द सिंगारती है
 भावों की शब्दों से आरती है ।
  कर वंदन अन्तर्मन अर्चन से,
  "निश्चल" मन अर्थ उभारती है।
 .... विवेक दुबे "निश्चल"©...

बहता कल कल निश्चल

आता अगला पल अगले पल ।
 बीत रहे हैं यूँ ही पल हर पल।
  सरगम सजती साँसों की ।
  जीवन के कुछ मधुर पल ।
   जीते हैं पल प्रति पल ।
    याद नही बीता कल ।
   याद नही आता कल ।
  जीवन एक सरिता सा ,
 बहता कल कल "निश्चल" ।
  .... विवेक दुबे"निश्चल" ... ..

रविवार, 11 फ़रवरी 2018

राधा बड़ भागनी

राधा बड़ भागनी, नटखट है घनश्याम।
 बाजत कान्हा बाँसुरी, स्वर बोलें राधा नाम।

राम चरण की चाकरी,चित्त नही विश्राम।
कृपा करें राम जी, पूरन हों सब काम।


 *मंगलम सु-मंगलम* 

 *अंधकार निवारणं दीप प्रकाशकम ।*
 *वंदे श्रीहरि श्रीनिधि फल प्रदायनम ।।*

अबकी दीवाली कुछ ऐसे दीप सजाऊंगा ।
 यादों की बाती रख यादो के दीप जलाऊंगा । 
 होंगे उजियारे मध्यम मध्यम तिमिर संग ,
 हो प्रकशित मन तिमिर दूर भगाऊंगा ।




 तेल भरूंगा नव सम्भावनाओं का मैं ।
मन उज्वल नवल प्रकाश जगाऊंगा ।
  खोजूंगा फिर गहन अनन्त आकाश मैं ।
 अबकी दीवाली कुछ ऐसे दीप जलाऊंगा ।
  .... 
 कुछ शुभ कामनाएँ मेरी हों ।
कुछ शुभ कामनाएँ तेरी हों ।
 जगमग हों राहें जीवन पथ की,
 फिर रात भले ही अँधेरी हो।
   .....
 दूर कर प्रकाश से अंधकार को ।
 जीत साहस से अत्याचार को । 
 न हार कभी अपने विश्वास को ।
 जीत ले फिर समूचे आकाश को ।
  ....
कुछ ऐसे नए दीप जलाएँ।
आशाओ के उजियारे आएँ ।
दीप भले ही कल बुझ जाएँ।
आशायें जगमग होती जाएँ ।
 रंगोली कुछ यूँ सज जाएँ।
सदभाव के रंग भर जाएँ ।

....  सु-मङ्गलम् दीपावली ....

 दीवाली की रात निराली ।
 उजियारों से निशा हारी ।
          उजियारों की खातिर ,
         दिये सँग जलती बाती ।
     ..... 
 जलता रहा मैं औरों की ख़ातिर ।
 में अपने नीचे अँधेरा समेटे हुए ।
  
बुझाकर चराग दिल के मैंने।
 जलाए ज़ख्म दिल के मैंने।
   
जलता रहा मैं औरों की ख़ातिर ।
 में अपने नीचे अँधेरा समेटे हुए ।
  
मिटकर खुद तिमिर हरे अंधेरों का ।
 सूरज वही है नव प्रभात सबरों का ।
   ....
इस धनतेरस कुछ खास करें।
बुद्धि अन्तर्मन बर्तन साफ़ करें ।

 ज्ञान रूप धन भर कर,
 लक्ष्मी का आह्वान करें ।

 भुला राग, द्वेष ,बैर, सभी ,
 प्रेम, शान्ति का श्रृंगार करें ।

 हृदय चैतन्य दीप जलाकर,
 सम्पूर्ण विश्व दिव्य ज्योत बनें ।
    ...... 
  *मंगलम सुमङ्गल धनाध्यक्ष कुबेरं ।*
  *आगमन स्वागतं धनाध्यक्ष कुबेरं ।।*
            .... 
 कुछ बातें बंद लिफाफों सी।
 कुछ अनसुलझे वादों सी।
  उलट पलट कर देखा पर ,
 तारों सँग अंधियारी रातों सी ।
 ..... 
 अंधेरों ने अंधेरों को यूँ लुभाया है ।
 उजालों को भी अंधेरा भाया है। 
 जल कर दीपक ने रात भर , 
नीचे अपने अँधेरा छुपाया है ।
  ....
 भाव खो गए भाबों में।
 वादे भूले सब यादों में ।
 हर रिश्ता तो     अब ,
 बिकता है बाज़ारों में। 

     चकाचोंध की इस दुनियाँ में ।
 होता है सब कुछ अँधियारों में ।
  सूरज भी अब तो अक़्सर, 
  सोता है तमस के गलियारों में ।
 ...
 जबसे मैं मशहूर हुआ ।
 अपनो से मैं दूर हुआ ।
  पीकर प्याला शोहरत का,
   मैं बहुत मायूस हुआ ।
  ...

 स्वप्न सलोने कुछ जागे कुछ सोए से ,
 यादों के बदल में खोए खोए से ।
 मोती लुढ़के आँखों के पलकों से ,
 कुछ हँसते से कुछ रोए रोए से ।
 जीत लिया सब जिसकी खातिर ,
 उसकी ख़ातिर हार पिरोए से ।
  सँग सबेरे फिर उठ चलना होगा ,
 रात अंधेरी आँखे भर जो रोए रोए से ।
 ....
 हर रिश्ते की एक अजब कहानी है।
 हर रिश्ते की एक प्रेम कहानी है ।
 छुपा हुआ जहां स्वार्थ भाव सभी में,
 निःस्वार्थ बस बहन भाई कहानी है ।
...विवेक दुबे "निश्चल"©...

गुरु

गुरु ज्ञानी सो बूझिये ,
 मन भरे ज्ञान प्रकाश । 
 अंधकार मिट जात है ,
  ज्यों रवि चढ़े आकाश ।
  ...... विवेक दुबे"निश्चल" ©.....

साध्य से साधना

साध्य से साधना ,
                  आराध्य से आराधना ।
  भाव से भावना ,
                          प्रेम से प्रार्थना ।
हृदय से पुकारना ,
                         न उसे बिसारना ।
तब बन जायेगा ,
                      जीवन मन भावना ।
   ......विवेक दुबे"निश्चल'©..

भक्त शिरोमणी आप

भक्त शिरोमणि आप ,
 सुनते सबकी अरदास।
 राम कृपा रहे अधूरी ,
 जो त्यागे राम दास ।
  ....  विवेक दुबे"निश्चल".....

प्रथम बंदन

प्रथम करूँ मैं वंदना,  गौरी पुत्र गणेश ।
पीछे सुमिरन मैं करूँ, ब्रम्हा विष्णु महेश।।
ब्रम्हा विष्णु महेश की, रहती कृपा विशेष ।
सुमरे नित दिन जो, ऋद्धि सिद्धि गणेश ।।
   ..... विवेक दुबे "निश्चल"©......

कार्तिक मास

 कार्तिक मास...
        एक प्रयास 

बीते चतुर्मास जागी नई आस ।
 ऋतु बदली शरद चँद्र के साथ।
 जागेंगे हरि नारायण भी अब,
 करें हरि स्मरण श्रद्धा के साथ ।
    ....... विवेक दुबे©....

वंदना

               *वंदना*

  प्रातः वंदन प्रभु आशीष चाहिए ।
  तुमसे बस इतनी सी भीख चाहिए ।
  मिलता रहे प्रभु बल सम्बल हर दम ,
   जीवन से पग पग एक सीख चाहिए ।
         .....  विवेक दुबे© ......

विश्वास

तुम पूजो जिस पत्थर को पर विश्वास भरो ।
 होगा जड़ भी चेतन छूकर आभास करो । 
 मुड़ जातीं है धाराएँ भी सरिता की ,
 इठलातीं धाराओं को बाहुपाश भरो ।
     ..... विवेक दुबे "निश्चल"©....

ध्यान


बन्द नयन से ध्यान लगा ले ।
 सुमिरन कर प्रभु को चीन्ह ।
  सुध लेंगे बस एक बही तेरी ,
 डूब उन्ही में उन्ही को चीन्ह ।
  ....विवेक दुबे"निश्चल"©...

पावनी गंगा

पतित पावनी निर्मल गंगा ।
मोक्ष दायनी उज्वल गंगा ।
उतर स्वर्ग आई धरा पर ,
शिव शीश धारणी माँ गंगा ।

जैसी तब बहती थी गंगा ।
रही नही अब वैसी गंगा ।
हिमगिरि से गंगा सागर तक ,
कल कल बहती माँ गंगा ।

सिकुड़ रही अब माँ गंगा ।
हो रही क्रुद्ध अब माँ गंगा।
और न कर प्रदूषित मुझे ,
बार बार चेताती माँ गंगा ।

छोड़ती वापस गन्दगी धरा पर ।
रौद्र रूप दिखती माँ गंगा ।
हो जाती प्रलयकारी सी ,
कहती रहने दो मुझे माँ गंगा ।
….. विवेक दुबे "निश्चल"©…....

कलम चलती है शब्द जागते हैं।

सम्मान पत्र

  मान मिला सम्मान मिला।  अपनो में स्थान मिला ।  खिली कलम कमल सी,  शब्दों को स्वाभिमान मिला। मेरी यूँ आदतें आदत बनती गई ।  शब्द जागते...