कुछ खास नहीं कवि पिता की संतान हूँ । ..... निर्दलीय प्रकाशन भोपाल द्वारा बर्ष 2012 में "युवा सृजन धर्मिता अलंकरण" से अलंकृत। जन चेतना साहित्यिक सांस्कृतिक समिति पीलीभीत द्वारा 2017 श्रेष्ठ रचनाकार से सम्मानित कव्य रंगोली त्रैमासिक पत्रिका लखीमपुर खीरी द्वारा साहित्य भूषण सम्मान 2017 से सम्मानित "निश्चल" मन से निश्छल लिखते जाओ । ..... . (रचनाये मौलिक स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित .)
सोमवार, 22 जुलाई 2019
गुरुवार, 4 जुलाई 2019
मुक्तक 756/760
756
यहाँ तक लिखूँ वहाँ तक लिखूँ ।
जमीन से आसमां तक लिखूँ ।
ये अल्फ़ाज़ है मेरे नज़ाक़त भरे ,
हाल-ए-हक़ीक़त कहाँ तक लिखूँ ।
......
757
मैं यादों को भरमाता रहा ।
खुशियों को आजमाता रहा ।
न ठहरा वक़्त कभी साथ मेरे ,
निशां कदमों पे इठलाता रहा ।
.... ...
758
मैं कुदेरता वक़्त सा रहा ।
लफ्ज़ सँग सख्त सा राह ।
छोड़ता चला पीछे यादों को ,
निग़ाह चश्म मस्त सा रहा ।
.... ...
759
प्रश्न नही वो गया कहाँ पे ।
प्रश्न यही वो आया कहाँ से ।
फेर रहा मन मन के मनके,
माला मोती ड़ोर बंधा कहाँ से।
......
760
जितना इसमें और उसमें अंतर है ।
इतना ही तो बस इसमें अंतर है ।
प्रभु प्राण बसाये काया भीतर ,
मन करता जिसमें अंतर है ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@.
डायरी 3
Blog post 8/6/19
रविवार, 9 जून 2019
ज़ीवन
चकित हुआ चलकर ,
मोन तले बैठा सन्नाटा ।
आते कल की आशा में,
जीवन कटता ही पाता ।
ज़ीवन के इस पथ पर ,
ज़ीवन एकाकी आता ।
खोता है कुछ पाकर ,
खोकर फिर पा जाता ।
गूंध चला आशाओं को ,
ले अभिलाषाओं की गाथा ।
आश्रयहीन रहा नही कभी ,
देता जाता आश्रय वो दाता ।
..... विवेक दुबे"निश्चल"@....
मोन तले बैठा सन्नाटा ।
आते कल की आशा में,
जीवन कटता ही पाता ।
ज़ीवन के इस पथ पर ,
ज़ीवन एकाकी आता ।
खोता है कुछ पाकर ,
खोकर फिर पा जाता ।
गूंध चला आशाओं को ,
ले अभिलाषाओं की गाथा ।
आश्रयहीन रहा नही कभी ,
देता जाता आश्रय वो दाता ।
..... विवेक दुबे"निश्चल"@....
शनिवार, 8 जून 2019
मुक्तक 752 से 755
752
वो चराग़ उगलते रहे उजाले ।
आप को कर अंधेरों के हवाले ।
होती रहीं नाफ़रमानीयाँ उम्र की ,
नुक़्स जिंदगी से न गये निकाले ।
......
753
मेरे हर सब्र की, कीमत अदा होगी ।
कभी तो कुदरत ,मुझ पे फिदा होगी ।
करता नही रब, न-इंसाफ़ीयाँ कभी ,
दौलत रब-ए-रजा, ही मेरी सदा होगी ।
....
754
गुरेज़ नही कोई अल्फ़ाज़ से ।
ढूंढता रहा लफ्ज़ आगाज़ से ।
सुनाकर तज़किरा महफ़िल में ,
लिखता रहा हर्फ़ अंदाज से ।
... .
756
एक स्याह समंदर सा ।
ये नजरों का मंजर सा ।
डूबती तिश्नगी साहिल पे ,
चुभता मौजों का खंजर सा ।
....विवेक दुबे"निश्चल"@..
डायरी 3
वो चराग़ उगलते रहे उजाले ।
आप को कर अंधेरों के हवाले ।
होती रहीं नाफ़रमानीयाँ उम्र की ,
नुक़्स जिंदगी से न गये निकाले ।
......
753
मेरे हर सब्र की, कीमत अदा होगी ।
कभी तो कुदरत ,मुझ पे फिदा होगी ।
करता नही रब, न-इंसाफ़ीयाँ कभी ,
दौलत रब-ए-रजा, ही मेरी सदा होगी ।
....
754
गुरेज़ नही कोई अल्फ़ाज़ से ।
ढूंढता रहा लफ्ज़ आगाज़ से ।
सुनाकर तज़किरा महफ़िल में ,
लिखता रहा हर्फ़ अंदाज से ।
... .
756
एक स्याह समंदर सा ।
ये नजरों का मंजर सा ।
डूबती तिश्नगी साहिल पे ,
चुभता मौजों का खंजर सा ।
....विवेक दुबे"निश्चल"@..
डायरी 3
मुक्तक 747/751
747
रूबरू ज़िंदगी ,घूमती रही ।
रूह की तिश्नगी, ढूँढती रही ।
रहा सफ़र दर्या का, दर्या तक,
मौज साहिल को ,चूमती रही
.....
748
अपने आप को यूँ खोता रहा ।
वक़्त हालात को बोता रहा ।
चलता रहा साथ जज़बात के ,
ये ज़िस्म रूह को ढोता रहा ।
.....
749
अपने आप से यूँ भी सौदा रहा।
ज़िन्दगी का यूँ भी मसौदा रहा।
चलता रहा साथ हालात का ,
ये ज़िस्म रूह का घरोंदा रहा ।
....
750
लफ्ज़ लफ्ज़ निहाल हो गया ।
जश्न महफ़िल मलाल हो गया ।
मैं कहता रहा ग़जल अदब से ,
वो जाने क्युं बे-ख़्याल हो गया ।
...
751
अपनी पहचानो को वो मान चला ।
अपनी पहचानो को पहचान चला ।
जीवन के दामन में भरकर जीवन ,
अपने जीवन को जीवन जान चला ।
.....विवेक दुबे"निश्चल"@..
डायरी 3
रूबरू ज़िंदगी ,घूमती रही ।
रूह की तिश्नगी, ढूँढती रही ।
रहा सफ़र दर्या का, दर्या तक,
मौज साहिल को ,चूमती रही
.....
748
अपने आप को यूँ खोता रहा ।
वक़्त हालात को बोता रहा ।
चलता रहा साथ जज़बात के ,
ये ज़िस्म रूह को ढोता रहा ।
.....
749
अपने आप से यूँ भी सौदा रहा।
ज़िन्दगी का यूँ भी मसौदा रहा।
चलता रहा साथ हालात का ,
ये ज़िस्म रूह का घरोंदा रहा ।
....
750
लफ्ज़ लफ्ज़ निहाल हो गया ।
जश्न महफ़िल मलाल हो गया ।
मैं कहता रहा ग़जल अदब से ,
वो जाने क्युं बे-ख़्याल हो गया ।
...
751
अपनी पहचानो को वो मान चला ।
अपनी पहचानो को पहचान चला ।
जीवन के दामन में भरकर जीवन ,
अपने जीवन को जीवन जान चला ।
.....विवेक दुबे"निश्चल"@..
डायरी 3
मुक्तक 738/746 तक
738
चलता रहा कल तक, आज की खातिर ।
बजता रहा साज भी ,आवाज की खातिर ।
उतरती रहीं कुछ नज़्में, ख़्वाब जमीं पर ,
देतीं रहीं हसरतें हवा , नाज की ख़ातिर ।
....
739
वो बदलता ही रहा , वक़्त से हालात सा ।
बिखेरकर क़तरा-ऐ-शबनम,हसीं रात सा ।
वो चाँद चलता ही रहा,अस्र से सेहर तक ,
न मुक़म्मिल सफ़र दरकार-ऐ-ख्यालात सा ।
...
740
हादसे ये हालात के,अश्क पलकों पे उतरने नहीं देते ।
टूटकर हालात-ऐ-हक़ीक़त,ज़मीं पे बिखरने नहीं देते ।
हुआ है ख़ुश्क अब तो, मुसलसल आँख का दर्या भी ,
ये कोर पलकों पे ,अब मौजों को ठहरने नहीं देते ।
......
741
गिनता रहा मैं पत्ते बरगद के पेड़ के ।
कुछ शाख़ पे हरे से कुछ जमीं ढ़ेर के ।
टूटकर बिखरते ही रहे शाख़ से यूँ पत्ते ,
जिस तरह बिखरे अल्फ़ाज़ मेरे शेर के ।
.......
742
मैं कहीं एक , बस्ती ढूंढता सा ।
मैं कहीं अपनी, हस्ती ढूंढता सा ।
एक चमन-ओ-अमन की चाहत में ,
नज़्र निग़ाह की , मस्ती ढूंढता सा ।
.....
743
महज़ इस्तेमाल होता है आदमी ।
फक़त ख़्याल खोता है आदमी।
चलकर सँग जमीन पे अपनो के,
हसरते आसमां पे सोता है आदमी ।
.......
744
सामने से जो गुजरते हैं जिंदा बुत ।
हाँ दर्द होता है उस वक़्त पर बहुत ।
क्या कहूँ अंदाज नज़रें अंदाज को मैं ,
जो निगाहें चुरा बदलते खुद-बा-खुद ।
.... ..
745
जिंदगी आईने सी कर दो ।
परछाइयाँ ही सामने धर दो ।
न सिमेटो कुछ भीतर अपने,
निग़ाह अक़्स मायने भर दो।
... ....
746
जिंदगी जिंदा लकीरों सी ।
उलझती रही जमीरों सी ।
बदलते रहे हालात हरदम ,
मौसीक़ी ज़ज्ब फकीरों सी ।
... ... विवेक दुबे"निश्चल"@...
डायरी 3
चलता रहा कल तक, आज की खातिर ।
बजता रहा साज भी ,आवाज की खातिर ।
उतरती रहीं कुछ नज़्में, ख़्वाब जमीं पर ,
देतीं रहीं हसरतें हवा , नाज की ख़ातिर ।
....
739
वो बदलता ही रहा , वक़्त से हालात सा ।
बिखेरकर क़तरा-ऐ-शबनम,हसीं रात सा ।
वो चाँद चलता ही रहा,अस्र से सेहर तक ,
न मुक़म्मिल सफ़र दरकार-ऐ-ख्यालात सा ।
...
740
हादसे ये हालात के,अश्क पलकों पे उतरने नहीं देते ।
टूटकर हालात-ऐ-हक़ीक़त,ज़मीं पे बिखरने नहीं देते ।
हुआ है ख़ुश्क अब तो, मुसलसल आँख का दर्या भी ,
ये कोर पलकों पे ,अब मौजों को ठहरने नहीं देते ।
......
741
गिनता रहा मैं पत्ते बरगद के पेड़ के ।
कुछ शाख़ पे हरे से कुछ जमीं ढ़ेर के ।
टूटकर बिखरते ही रहे शाख़ से यूँ पत्ते ,
जिस तरह बिखरे अल्फ़ाज़ मेरे शेर के ।
.......
742
मैं कहीं एक , बस्ती ढूंढता सा ।
मैं कहीं अपनी, हस्ती ढूंढता सा ।
एक चमन-ओ-अमन की चाहत में ,
नज़्र निग़ाह की , मस्ती ढूंढता सा ।
.....
743
महज़ इस्तेमाल होता है आदमी ।
फक़त ख़्याल खोता है आदमी।
चलकर सँग जमीन पे अपनो के,
हसरते आसमां पे सोता है आदमी ।
.......
744
सामने से जो गुजरते हैं जिंदा बुत ।
हाँ दर्द होता है उस वक़्त पर बहुत ।
क्या कहूँ अंदाज नज़रें अंदाज को मैं ,
जो निगाहें चुरा बदलते खुद-बा-खुद ।
.... ..
745
जिंदगी आईने सी कर दो ।
परछाइयाँ ही सामने धर दो ।
न सिमेटो कुछ भीतर अपने,
निग़ाह अक़्स मायने भर दो।
... ....
746
जिंदगी जिंदा लकीरों सी ।
उलझती रही जमीरों सी ।
बदलते रहे हालात हरदम ,
मौसीक़ी ज़ज्ब फकीरों सी ।
... ... विवेक दुबे"निश्चल"@...
डायरी 3
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कलम चलती है शब्द जागते हैं।
सम्मान पत्र
मान मिला सम्मान मिला। अपनो में स्थान मिला । खिली कलम कमल सी, शब्दों को स्वाभिमान मिला। मेरी यूँ आदतें आदत बनती गई । शब्द जागते...





















































