बुधवार, 19 अप्रैल 2017

ज़िन्दगी

 ज़िंदगी को न समझ सकी ज़िंदगी।
 बस इस तरह सफर रही ज़िंदगी ।

  करती रही बार बार वादे वो ,
  फिर भी बे-वादा रही ज़िंदगी।

 पाकर ख्याल खो गईं हक़ीक़तें ,
 क्यों ख़्वाब पालती रही ज़िंदगी ।

 पढ़ी जो आज तक किताबों में  ,
 बस बेहतर तो थी बही ज़िंदगी।

 जी रही दुनियाँ दुनियाँ के वास्ते ,
 फिर भी दुनियाँ में नही ज़िंदगी ।

 रूठता है क्यों तू अपने आप से ,
 तेरे ही वास्ते तो जी रही ज़िंदगी ।।
    ..... विवेक "निश्चल"@..




शनिवार, 8 अप्रैल 2017

प्रकट राम तब होते है


कन्टक पथ पर चलना होता है ।
सत्य साथ के होना होता है ।
       धर धैर्य हृदय में सह कष्टों को ,
       हृदय प्रकट राम तब होता है ।
  विजय त्रिलोकपति पर पाकर
 राज्य विभीषण को देना होता है
       सुनकर एक पुकार किसी की
       सीता को भी खोना होता है
  वचन भंग न हो जाए पिता के
 वन वासी तब होना होता है
       खाकर जूठे बेर शबरी के
     शत्रु को भी पूज्य कहना होता है
 जीता जब स्वयं ने स्वयं को
 हृदय प्रकट राम तब होता है
   ..... विवेक ....

कहती है कलम नया

क्या कुछ कहती है कलम नया ।
खुशियों के लम्हे या हो ग़म नया ।
 डुबा कर कलम दिल की ,
 जज्वातों की स्याही से ,
 बस कर दो सब वयां ।
 रंग चढ़ें बिरह वेदना के ,
  मधुर मिलन का रंग चढ़ा ।
  जज्बातों की स्याही से ,
  सब कर दो सब वयां ।
  हों आशाएं अभिलाषाएँ ,
  या हो घोर निराशाएँ ,
  सब को देदो रंग जरा ।
 जज्बातों की स्याही से ,
 बस कर दो सब वयां ।
  ..... विवेक दुबे "निश्चल"@ ...


कल


खो जाता है आज ।
जब तक आता कल ।।
       आज मन विकल हर पल ।
      आता अविचलित अटल कल ।।
 जूझता आज समय से ।
 निश्चित होता हर कल ।।
             थमता नही समय कभी ।
             चलता वो पल प्रतिपल ।।
 नियत समय आता कल ।
 यही नियति सत्य अटल ।।
            .... विवेक .....

शुक्रवार, 31 मार्च 2017

कृष्ण मिलन


कृष्ण सा मन चाहिए ।
राधा सा मिलन चाहिए ।
मीरा सा विरह चाहिए।
गोपियों सा आग्रह चाहिए।
कृष्ण मिलन को ,
और क्या चाहिए।..
.......विवेक.......

कन्या भ्रूण


कन्या भ्रूण ने
लगाई गुहार
मुझे न मार
अंश हूँ तेरा
मैं तेरा प्यार
फिर दंश क्यों ?
मत छीन मेरा
जीने का अधिकार
   ...विवेक...

देता है ज़ीवन


देता है जीवन कुछ अपने तरीके से
 फिर भी हर दम एक आस है
 जीवन की इस बहती सरिता में
 रहती घूंट घूंट अधूरी प्यास है
     ....... विवेक .....

चाहत मंज़िल की


हो जाता है बेख्याल बातों बातों में ।
 खोजता है अक्सर कुछ अँधियारो में ।
 चाहत में वो मंज़िल की अपनी ,
 खोज कर राहें, खो जाता है राहों में ।।
  .... विवेक,....

न हो मायूस


न हो मायूस तू दुनियाँ की बातों से
सब्र से बड़ा कोई इम्तेहान नही
वक़्त आएगा तेरा भी एक दिन
वक़्त बीत जाएगा उसका उस दिन
 ....... विवेक .....

क़द्र अपनों की


कद्र करों पहले अपनों की।
फिर फ़िक्र करो न सपनो की।
चलतीं है हर दम संग छाया बन ,
 मिलती हैं जो दुआएँ अपनों की ।
    ..... विवेक .....

रंग सुनहले फागुन के


यह रंग सुनहरे फ़ागुन के
 धुँधले धुँधले बिन साजन के
 टेसू फूले मन भावन से
 झड़ते सूने आँगन में
यह रंग सुनहरे ...
प्रीत के रंग भरे पिचकारी मे
 चुप चाप खड़ी लाचारी मे
 सूने नैना राह तकें राहों मे
 रंग नही अब इन फागों में
  यह रंग सुनहरे ,......
तपता मन चाँदनी रातों में
चँदा चलता ज्यों अंगारों पे
 शीतल बसन्त बयारों में
  साँसे तपतीं साँसों से
यह रंग सुनहरे .....
 ..... विवेक ,.....

शबनम


शब-ए-इंतज़ार में सितारे टिमटिमाते रहे ।
 चाँद बे-ख़ौफ़ खिलखिलाता रहा ।
 रो पड़ी शबनम आकर  जमीं के आगोश में ।
 सहर भी न थी अपने होश में ।
 जो पूछा क्या हुआ जबाब एक आया ।
 तपता है सूरज पिघलते हैं हम ।
 हर बार इल्ज़ाम क्यों हम पर ही आया ।
 ज़माने ने शबनम को क्यों दबाया।
   ...... विवेक .....

फ़िक्र नही मन्ज़िलों की


फ़िक्र नही मन्ज़िलों की , बस राह हम चलें ।
क़दम जिधर पड़ें, रास्ते वहीं  बन पड़ें ।।
मंज़िलो पर  जब क़दम धरें , मंज़िलें भी रास्ता बन पड़ें ।
मंज़िले कहें तड़फ कर , यह मुक़ाम नही तेरा ।।
चल साथ हम भी तेरे चलें ।
 कुछ और रास्ते नए हम गड़ें ।।
   ..... विवेक ...

चलता चल तू चलता चल


चलता चल बस तू चलता चल ।
मंज़िल ख़ुद आएगी पास तेरे चलकर ।
 न देख कभी राहों में मुड़कर पीछे ।
फूल कहीं हों काँटे हों राहों पर ।
 बिसराता चल हर बीता कल ।
 भोर किरण संग आता है सुनहरा कल ।
    ... विवेक .....

कलम चलती है शब्द जागते हैं।

सम्मान पत्र

  मान मिला सम्मान मिला।  अपनो में स्थान मिला ।  खिली कलम कमल सी,  शब्दों को स्वाभिमान मिला। मेरी यूँ आदतें आदत बनती गई ।  शब्द जागते...