रविवार, 23 अगस्त 2015

अंश माता पिता


माँ सरस्वती की कृपा से,
मुझ में पिता का बो अंश आया है,
मैने अपने आप में पिता जैसा
रचनाकार भी पाया है ,
मुझ पर "नेहदूत" का ,नेह बरसता
माँ सरस्वती की कृपा
मिलती बारम्बार
यही मेरा "सौभाग्य "

माँ मनोरमा की
मनोरम कृपा भी ,
साथ साथ आई है
जिसके कारण सारी दुनियां
बस भाई ही भाई है ,

है माँ बस इतना करना उपकार
मिले जन्म जन्म तक
यही माँ, यही पिता ,
बारम्बार हर बार, बार बार,
हो माँ तेरा उपकार,
.....विवेक...

पिता ...


मनचाहा बरदान मांग लो ।
अनचाहा अभय दान माँग लो ।।
उसके होंठो की मुस्कान माँग लो ।
जीवन का संग्राम माँग लो ।।
सारा पौरुष श्रृंगार माँग लो ।
साँसों से प्राण माँग लो ।।
बस हँसते हँसते हाँ ।
कभी न निकले ना ।।
कुछ ऐसा होता है पिता ,
क्या हम हो सकेंगे कभी कहि ,
अपने इस ईस्वर के आस पास ,,
तब शायद पिता को समझ सकें कुछ हम भी ,,,
...विवेक.....

मेरे पिता ....


बरगद से बिशाल पिता।
हर मुश्क़िल की ढाल पिता ।।
ख़ुश है हर हाल पिता ।
कहे न दिल का हाल पिता ।।
हर मुश्क़िल का संबल पिता ।
निर्बल का आत्मबल पिता ।।
कभी धूप कभी छांब पिता ।
मुश्किल में न खिज़ा पिता ।।
हर मुश्किल से जीता ।
पिता हर दुःख पीता पिता ।।
हलाहल कंठ थामता पिता ।
शिवः सामान नीलकंठ पिता ।।
बस खुशियाँ बाँटता पिता ।
तुम शुभांकर "नेहदूत" पिता ।।
तुम्हे शुभकामनाये, मैं क्या दूँ पिता ।
तेरे चरणों में रहे, सदा मेरा ध्यान पिता ।।
......विवेक...

नीव का पत्थर ....


बने महल और अटारे
मंदिर मस्जिद और गुरुद्वारे
कही ताज महल खड़ा
कही मीनार सर उठा रही
इनमे लगे हर पत्थर को देख
दुनिया दांतों तले अंगुली दवा रही
देख देख करती वाह वाह
क्या कला है ..क्या कोशल है ..
पर .......
देखा न कभी सोचा किसी ने
वो नीब के पत्थर कैसे होंगे
क्या गुजर रही होगी उन पर
किस हाल में होंगे .....
जो दफन हो गए
सदा सदा के लिए
इन उकेरे गए
नक्काशी दार
पत्थरौ की खातिर
आज जिन्हें देख दुनिया
सजदे में झुक जाती है
नीब के पत्थर उस
पत्थर को भुला कर . ..
........... विवेक....

शनिवार, 22 अगस्त 2015

मैं काव्य हूँ


   मैं काव्य हूँ ---------
 इन शब्दों के बंधन से,मुझे मत बंधो।
 भावो के अर्पण से, मुझे मत भींचो।
 अर्थो के तर्पण से, मुझेमत सींचो।
 काव्य हूँ में ,,,,,,
 मुक्त हवा सा निर्झर बहता हूँ ।
 कहता हूँ बस कहता हूँ ।
 अपनी यादों में जीता हूँ ।
 अमृत सुधा ठुकराता हूँ ।
 विष हलाहल भी पीता हूँ।
 काँटों के पथ पर भी,
 हँसते हँसते चलता हूँ ।
 फूलो से भी चोटिल होता हूँ ।
 काव्य हूँ में बस चलता हूँ ।
 चलता ही रहता हूँ ।
 काव्य हूँ मै ,,,,,,,
                 कहता हूँ बस कहता हूँ ।
                 सत्य उजागर करता हूँ ।
                  शब्द सार्थक करता हूँ ।
                  भाव जाग्रत करता हूँ ।
                  अर्थ निचोड़ा करता हूँ ।
                   काव्य हूँ मैं बस,
                   काव्य कहा करता हूँ ।
                    हाँ काव्य हूँ मैं ,,,..
                     ......विवेक.......

गुरुवार, 13 अगस्त 2015

मातृ भूमि तुझे प्रणाम


हे मातृभूमि तुझे प्रणाम ।
वीर शहीदों से ही हो मेरे काम ।।
मैं भी आ जाऊँ माँ तेरे काम ।
तेरी सीमाओं का रक्त से अपने अभिषेक करूँ ।।
तेरी माटी को अपने शीश धरूँ ।
प्रण प्राणों से हो रक्षा तेरी ऐसा एक काम करूँ ।।
तुझको तकती हर बुरी नजर के सीने में बारूद भरूँ ।
हे मातृ भूमि तुझे प्रणाम करूँ ।।
वीर शहीदों जेसे मैं भी कुछ काम करूँ ।
 तेरे कदमो में अपने प्रण प्राण धरूँ ।।
       .....जय हिन्द ......
         .....विवेक....

अब आजादी 70 के पास


आजादी अब बृद्ध हो रही
70 के पास पहुच रही
पर देखो इसकी नादानी
 बच्चों सी आज भी रो रही
ओ आजादी चुप हो जा
 न आँसू बहा
शायद तेरी मेरी हम सबकी
 नियति यही
वारिस आज तक
 कोई मिला नही
 जो वारिस बन आया
 उसने अपना ही कानून चलाया
न तेरा कुछ हो पाया
 न मेरा कुछ हो पाया
       .....विवेक...

हे माँ भारती


आतंक के साये में तू सिसक रही माँ।
सुलग रही छाती तेरी धधक रही माँ ।
तेरे वारिसो की रोटियां सिक रही माँ।
आजाद भगत सुभाष फिर जनना होगा माँ।
तब ही कोटि कोटि जन का भला होगा माँ।
 आजादी का अर्थ हरा भरा होगा माँ।
     .....विवेक...

शुक्रवार, 7 अगस्त 2015

पथिक एकाकी

चलता तू जिस पथ पर ।
पुष्प लगता तू उस पथ पर।

 कांटे चुनता तू उस पथ के ।
 चुनता पत्थर उस पथ पर ।

 कदम कदम सजाता तू ,
  सहज सहज पग रखता पथ पर ।


 मन्दिर कई बनाता तू ,
 वन बाग सजाता तू पथ पर ।

 कोई पथिक जो आए कभी ,
 कुछ पल बिताए इस पथ पर ।

 पा जाये कुछ विश्राम यही ,
 सफ़र आसान बने इस पथ पर ।

   है फिर भी एकाकी तू ,
  चलता अपनी धुन में तू इस पथ पर ।

 खोया खोया अपने एकाकीपन में ।
 कुछ अपनी कुछ पथ की उलझन में ।

 हाँ  एकाकी तू , बस एकाकी तू ।
  तू अपने इस जीवन पथ पर ।

      ......विवेक दुबे "विवेक"©....
 Blog 17/7/17

सोमवार, 27 जुलाई 2015

माँ


माँ बस नाम ही काफी है
कोई परिभाषा नहीं
माँ तेरे नाम की
तू तो राधा की भी बैसी ही थी
जैसी थी माँ तू श्याम की
.....विवेक...

गुरुवार, 23 जुलाई 2015

नई सुबह


जय पराजय से परे
सदा आगे बढ़ते चलें
अपराजित अनथक
नयी सुबह केआँचल तले
एक आस जगे उत्साह मिले
जीवन को नव आयाम मिलें
....विवेक....

बुधवार, 22 जुलाई 2015

क्यों रोती है माँ


देख क्या होती है माँ ।
बच्चों की खुशियों पर क्यों रोती है माँ ।।
दुनियाँ को ख़ुशी के नजर आये आँसू वो ।।
पर माँ को पल याद आये वो ।
धरा था जिस वक़्त गर्भ में ,
जना था वाजी लगा जान की ।।
नही की परवाह अपने प्राण की ।
सारे पल आज याद आये वो ।।
दुनियाँ को अपने दर्द कैसे बताये वो ।
बस अपनी आँखों से मोती बरसाये वो ।।
यह बात तब और भी गहरी होती है ।
जब वो बेटीओ की माँ होती है ।।
वो ताने याद आते है ,
जो बेटी जनने पर ।
दुनियाँ से बिन माँगे मिल जाते है ,
मिलते ही जाते है ।।
.....विवेक....

मंगलवार, 21 जुलाई 2015

दबा हुआ हूँ अहसासों से


दबा हुआ हूँ अहसासों से ;
कुछ अपनी ही साँसों से ।

हर पल घिसता हूँ पिसता हूँ ...!!
अपनी साँसों से भी डरता हूँ ....!!
न जीता हूँ ; न मरता हूँ .......!!
कुछ ज़िंदा अरमानों के बोझों से ।

जब चलता हूँ फिरता हूँ ....!!
सौ -सौ बार गिरता हूँ , ....!!
फिर उठकर चल पड़ता हूँ ....!!
लड़ता हूँ कर्ज़ों से कुछ फ़र्ज़ों से ।

चलता हूँ ,बस चलता हूँ ....!!
चलता ही रहता हूँ ............!!
अदा नही हुआ जीवन की रस्मों से ।

....विवेक दुबे"निश्चल"@....


रात तो कट जाती है

रात तो कट जाती है।
 मौत ही नही आती है ।

आती भी दरवाज़े पर ,
दस्तक देकर चली जाती है ।

रस्में जिम्मेदारियों की और निभा ,
कह जाती , वक़्त अभी बाँकी है ।

पूरी नही लिखी तूने अपनी कहानी ,
आँख हड़बड़ाकर इतने में खुल जाती है ।

एक सिलसिला कल आज और कल का ,
ज़िन्दगी क्या है बात समझ आ जाती है ।

..
हर पल नव सृजन का बस ये सोचकर ,
 जिंदगी भी एक लुभाबनी कहानी है ।
 
जुट जाता है पूरे जोश-ओ-खरोश से ,
ज़िन्दगी की हर रस्म तो निभानी है । 
.
!!...विवेक दुबे"निश्चल"@....!

कलम चलती है शब्द जागते हैं।

सम्मान पत्र

  मान मिला सम्मान मिला।  अपनो में स्थान मिला ।  खिली कलम कमल सी,  शब्दों को स्वाभिमान मिला। मेरी यूँ आदतें आदत बनती गई ।  शब्द जागते...