कुछ खास नहीं कवि पिता की संतान हूँ । ..... निर्दलीय प्रकाशन भोपाल द्वारा बर्ष 2012 में "युवा सृजन धर्मिता अलंकरण" से अलंकृत। जन चेतना साहित्यिक सांस्कृतिक समिति पीलीभीत द्वारा 2017 श्रेष्ठ रचनाकार से सम्मानित कव्य रंगोली त्रैमासिक पत्रिका लखीमपुर खीरी द्वारा साहित्य भूषण सम्मान 2017 से सम्मानित "निश्चल" मन से निश्छल लिखते जाओ । ..... . (रचनाये मौलिक स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित .)
रविवार, 9 फ़रवरी 2020
मंगलवार, 4 फ़रवरी 2020
हालतों से डरकर क्या होगा
763
हालतों से डरकर क्या होगा ।
घुट घुट के मरकर क्या होगा ।
लड़ जा ले साहस को अपने ,
देखें तो लड़कर क्या होगा ।
हार हुई हरदम हालातों की ,
साहस से बढ़कर क्या होगा ।
चलता चल दूर क्षितिज तक ,
कुंठाओं में घुटकर क्या होगा ।
सहज सुहानी यादें मन भीतर ,
चिंता मन में धरकर क्या होगा ।
"निश्चल" आज यही है साथ यही है ,
कल की चिंता करकर क्या होगा ।
....विवेक दुबे"निश्चल"@...
डायरी 7
हालतों से डरकर क्या होगा ।
घुट घुट के मरकर क्या होगा ।
लड़ जा ले साहस को अपने ,
देखें तो लड़कर क्या होगा ।
हार हुई हरदम हालातों की ,
साहस से बढ़कर क्या होगा ।
चलता चल दूर क्षितिज तक ,
कुंठाओं में घुटकर क्या होगा ।
सहज सुहानी यादें मन भीतर ,
चिंता मन में धरकर क्या होगा ।
"निश्चल" आज यही है साथ यही है ,
कल की चिंता करकर क्या होगा ।
....विवेक दुबे"निश्चल"@...
डायरी 7
वचपन
762
वो अंजान सा बचपन ।
वो नादान सा बचपन ।
उम्र के कच्चे मकां में ,
वो मेहमान सा बचपन ।
इस ज़िंदगी के सफ़र में ,
एक पहचान सा बचपन ।
खोजता ख़ुद को ख़यालों में ,
रहा अहसान सा बचपन ।
...विवेक दुबे"निश्चल"@....
डायरी 7
वो अंजान सा बचपन ।
वो नादान सा बचपन ।
उम्र के कच्चे मकां में ,
वो मेहमान सा बचपन ।
इस ज़िंदगी के सफ़र में ,
एक पहचान सा बचपन ।
खोजता ख़ुद को ख़यालों में ,
रहा अहसान सा बचपन ।
...विवेक दुबे"निश्चल"@....
डायरी 7
आओ कान्हा
758
आओ कान्हा,
दया दिखाओ कान्हा ।
छाओ चित में,
मोहे न बिसराओ कान्हा ।
करुण पुकार सुनो मेरी,
तुम कृपा बरसाओ कान्हा ।
हार रहा मन मन के हाथों,
राह तुम दिखलाओ कान्हा ।
जीत सकूँ स्वयं स्वयं के आगे ,
स्वयं को हर ले जाओ कान्हा ।
नयन बिलोकत पल छिन पल छिन ,
सखी सी प्रीत निभाओ कान्हा ।
भाव भरे यह मन भीतर गहरे ,
गोपी सा रास रचाओ कान्हा ।
गीत गढूं नित नित तेरे ,
अधरन प्यास बुझाओ कान्हा ।
विनय यही बस लाज रखो मेरी ,
"निश्चल"को न बिसराओ कान्हा ।
आओ कान्हा, दया दिखाओ कान्हा ।
छाओ चित में,मोहे न बिसराओ कान्हा ।
..... विवेक दुबे"निश्चल"@...
डायरी 7
Blog post 4/2/2)
आओ कान्हा,
दया दिखाओ कान्हा ।
छाओ चित में,
मोहे न बिसराओ कान्हा ।
करुण पुकार सुनो मेरी,
तुम कृपा बरसाओ कान्हा ।
हार रहा मन मन के हाथों,
राह तुम दिखलाओ कान्हा ।
जीत सकूँ स्वयं स्वयं के आगे ,
स्वयं को हर ले जाओ कान्हा ।
नयन बिलोकत पल छिन पल छिन ,
सखी सी प्रीत निभाओ कान्हा ।
भाव भरे यह मन भीतर गहरे ,
गोपी सा रास रचाओ कान्हा ।
गीत गढूं नित नित तेरे ,
अधरन प्यास बुझाओ कान्हा ।
विनय यही बस लाज रखो मेरी ,
"निश्चल"को न बिसराओ कान्हा ।
आओ कान्हा, दया दिखाओ कान्हा ।
छाओ चित में,मोहे न बिसराओ कान्हा ।
..... विवेक दुबे"निश्चल"@...
डायरी 7
Blog post 4/2/2)
प्रचण्ड चंड नन्दनी
758
प्रचण्ड चंड नंदनी ।
असुर शीश खंडनी ।
महा पाप भंजनी ।
महा देव वंदनी ।
सहस्त्र कोटि भानु सम ,
दिव्य तेज धरणी ।
पाप के विनाश को ,
महा माया रजनी ।
श्वेत वस्त्र धार के ,
अशेष ज्ञान प्रदायनी ,
महा ज्ञान प्रकाशनी ।
नमामि देवी नमोस्तुते ।
..... विवेक दुबे"निश्चल"@....
डायरी 7
प्रचण्ड चंड नंदनी ।
असुर शीश खंडनी ।
महा पाप भंजनी ।
महा देव वंदनी ।
सहस्त्र कोटि भानु सम ,
दिव्य तेज धरणी ।
पाप के विनाश को ,
महा माया रजनी ।
श्वेत वस्त्र धार के ,
अशेष ज्ञान प्रदायनी ,
महा ज्ञान प्रकाशनी ।
नमामि देवी नमोस्तुते ।
..... विवेक दुबे"निश्चल"@....
डायरी 7
गजल
757
- राज़-ऐ-वक़्त ---
2122 , 12 12 ,22
दूर कितना रहा , ज़माने में ।
कर सफ़र मैं तन्हा,वीराने में ।
छूटता सा चला कहीं मैं ही ,
यूँ नया सा शहर ,बसाने में ।
ढूँढ़ती है नज़र निशां कोई ,
क्यूँ मुक़ा तक ,चलके आने में ।
खोजता ही रहा कमी गोई ,
नुक़्स मिलता नही ,फ़साने में ।
रोकता चाह राह के वास्ते ,
चाँद भी हिज़्र तले,ढल जाने में ।
जूझती है युं रूह उम्र सारी ,
जिंदगी के रिश्ते निभाने में ।
राज़ है वक़्त में छुपा कोई आज"निश्चल"मुझे,बनाने में ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@....
डायरी 7
रोकती चाह चाँद के वास्ते ,
चाँदनीं हिज़्र तले,ढल जाने में ।
छोड़ती राह चाँद के वास्ते ,
चाँदनी हिज़्र तले ढल जाने में ।
यूँ ही तुम मुझसे वात करते हो ।
- राज़-ऐ-वक़्त ---
2122 , 12 12 ,22
दूर कितना रहा , ज़माने में ।
कर सफ़र मैं तन्हा,वीराने में ।
छूटता सा चला कहीं मैं ही ,
यूँ नया सा शहर ,बसाने में ।
ढूँढ़ती है नज़र निशां कोई ,
क्यूँ मुक़ा तक ,चलके आने में ।
खोजता ही रहा कमी गोई ,
नुक़्स मिलता नही ,फ़साने में ।
रोकता चाह राह के वास्ते ,
चाँद भी हिज़्र तले,ढल जाने में ।
जूझती है युं रूह उम्र सारी ,
जिंदगी के रिश्ते निभाने में ।
राज़ है वक़्त में छुपा कोई आज"निश्चल"मुझे,बनाने में ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@....
डायरी 7
रोकती चाह चाँद के वास्ते ,
चाँदनीं हिज़्र तले,ढल जाने में ।
छोड़ती राह चाँद के वास्ते ,
चाँदनी हिज़्र तले ढल जाने में ।
यूँ ही तुम मुझसे वात करते हो ।
गजल
ग़ज़ल प्रतियोगिता
बहारों ने तुझको पुकारा भी होगा ।
मिलाने निग़ाहें संवारा भी होगा ।
झुकाकर निग़ाहें बड़ी ही अदा से ,
इशारों में दिल को हारा भी होगा ।
इशारों में दिल को हारा भी होगा ।
चढ़ा इश्क़ परवाज़ राहे ख़ुदा में ।
हुस्न आइने में उतारा भी होगा ।
हुस्न आइने में उतारा भी होगा ।
चला हूँ डगर पे तुझे साथ ले के ,
कहीं तो मुक़द्दर हमारा भी होगा ।
कहीं तो मुक़द्दर हमारा भी होगा ।
नही है सफर पे मुसाफ़िर अकेला,
मुक़ा मंजिल पे इक हमारा भी होगा ।
मुक़ा मंजिल पे इक हमारा भी होगा ।
रहेंगे जहाँ पे सफर में अकेले ,
वहाँ पे दुआ का सहारा भी होगा ।
वहाँ पे दुआ का सहारा भी होगा ।
बहा है सदा साथ "निश्चल" दर्या के ,
कही तो युं मेरा किनारा भी होगा ।
कही तो युं मेरा किनारा भी होगा ।
....विवेक दुबे"निश्चल"@....
गुरुवार, 16 जनवरी 2020
कुछ मुक्तक
890
हसरतों के सँग भागता रहा ।
जिंदगी से यूँ ही राबता रहा ।
एक सफ़र सहर के वास्ते ,
साँझ उजाले में जागता रहा ।
....
891
बीते कल को स्वीकार किया मैंने ।
हाँ यूँ जीवन से प्यार किया मैंने ।
आते उजले कल की अभिलाषा में ,
"निश्चल" पल को दुलार किया मैंने ।
..
892
दूर खड़ा मन देखे ,
मन की हलचल को ।
आते आकर जाते ,
आते जाते हर पल को ।
मोह नही अब कोई ,
अपनी पहचानों का ,
जान गया अब वो ,
मन से मन के छल को ।
...विवेक दुबे"निश्चल"@...
893
यात्रा स्वयं में स्वयं की ।
खोज यही जीवन की ।
चला यहीं "निश्चल"मन
परिधि इतनी ही मन की ।
...विवेक दुबे"निश्चल"@..
डायरी 3
हसरतों के सँग भागता रहा ।
जिंदगी से यूँ ही राबता रहा ।
एक सफ़र सहर के वास्ते ,
साँझ उजाले में जागता रहा ।
....
891
बीते कल को स्वीकार किया मैंने ।
हाँ यूँ जीवन से प्यार किया मैंने ।
आते उजले कल की अभिलाषा में ,
"निश्चल" पल को दुलार किया मैंने ।
..
892
दूर खड़ा मन देखे ,
मन की हलचल को ।
आते आकर जाते ,
आते जाते हर पल को ।
मोह नही अब कोई ,
अपनी पहचानों का ,
जान गया अब वो ,
मन से मन के छल को ।
...विवेक दुबे"निश्चल"@...
893
यात्रा स्वयं में स्वयं की ।
खोज यही जीवन की ।
चला यहीं "निश्चल"मन
परिधि इतनी ही मन की ।
...विवेक दुबे"निश्चल"@..
डायरी 3
894
बस एक यही यथार्थ है ।
पिता नही कभी स्वार्थ है ।
चलता है सतत निरंतर ,
ज़ीवन रण का वो पार्थ है ।
....विवेक दुबे"निश्चल"@..
895
मन दर्पण में श्याम निहारे है ।
यूँ राधा अपना रूप सँवारे है ।
पुलकित मन आलोकित नैना ,
चित धड़कन श्याम पुकारे है ।
....विवेक दुबे"निश्चल"@..
896
दुआओं का यूँ असर होता है ।
खुशनुमा ज़िंदगी बसर होता है ।
गुजरती है कश्ती जो तूफ़ान से ,
तो समंदर भी रहबर होता है ।
..विवेक दुबे"निश्चल"@..
897
शरद चली विदा लेकर ।
आई बसंत अदा लेकर ।
धानी चूनर ओढ़ी धरा ने,
कलेवर फ़िर नया लेकर ।
....विवेक दुबे"निश्चल"@...
898
हे वर्ष तुझे विदा करूँ कैसे ।
ज़ख्म मिले गहरे भरूँ कैसे ।
धू धू करती काया लज़्ज़ा की ,
नारी रक्षा की शपथ पढूं कैसे ।
....विवेक दुबे"निश्चल"@....
डायरी3
Blog post 15/1/20
899
जो सतत चलता गया है ।
वही तो बदलता गया है ।
ढलकर कोर क्षितिज में ,
भानू भोर सा निकलता गया है ।
900
आशाओं के बोझ तले ,
चुपचाप चली अभिलाषा ।
ज़ीवन के ज़ीवन पथ पर ,
जीव सदा एकाकी आता जाता ।
901
एक धूल भरा दिनकर सा ।
अस्तित्व हीन सा कंकर सा ।
खोज रहा ख़ुद को ख़ुद में ,
अन्तस् मन स्वयं पिरोकर सा ।
902
है नही कुछ स्पष्ट सा ।
बस इतना सा कष्ट सा ।
सामने है पट समय का ,
पीछे पटल सब दृष्ट सा ।
.... विवेक दुबे "निश्चल"@...
डायरी 3
मुक्तक 874/889
874
एक नक्श पुराना सा।
एक अक्स पुराना सा ।
काफिला-ऐ-नए दौर में,
में एक शख्स पुराना सा ।
....विवेक दुबे"निश्चल"@..
874/A
कुछ नक्श पुराने से ।
कुछ अक्स पुराने से ।
काफिला-ऐ-नए दौर में,
कुछ शख्स पुराने से ।
....विवेक दुबे"निश्चल"@...
875
तू मत सोच के सब सच्चा है ।
हर रिश्ता दुनिया में अच्छा है ।
टूट रहे सच्चे सपने कच्चे से ,
एक तेरा सच भी तो कच्चा है ।
....विवेक दुबे"निश्चल"@...
875/A
तू मत सोच के सब सच्चा है ।
हर रिश्ता दुनिया में अच्छा है ।
टूट रहे है कुछ सपने सच्चे से ,
एक तेरा सच भी तो कच्चा है ।
....विवेक दुबे"निश्चल"@...
876
कर्म सदा तू तेरा करता जा।
मन मनका फेरा करता जा ।
मन अँधियारो की परिधि में,
उजियारो का घेरा करता जा ।
....विवेक दुबे"निश्चल"@..
876/A
कर्म सदा तू अपना करता जा।
मन मनका जपना करता जा ।
मन के अँधियारो की परिधि में,
उजियारो की रचना करता जा ।
...विवेक दुबे"निश्चल"@...
एक नक्श पुराना सा।
एक अक्स पुराना सा ।
काफिला-ऐ-नए दौर में,
में एक शख्स पुराना सा ।
....विवेक दुबे"निश्चल"@..
874/A
कुछ नक्श पुराने से ।
कुछ अक्स पुराने से ।
काफिला-ऐ-नए दौर में,
कुछ शख्स पुराने से ।
....विवेक दुबे"निश्चल"@...
875
तू मत सोच के सब सच्चा है ।
हर रिश्ता दुनिया में अच्छा है ।
टूट रहे सच्चे सपने कच्चे से ,
एक तेरा सच भी तो कच्चा है ।
....विवेक दुबे"निश्चल"@...
875/A
तू मत सोच के सब सच्चा है ।
हर रिश्ता दुनिया में अच्छा है ।
टूट रहे है कुछ सपने सच्चे से ,
एक तेरा सच भी तो कच्चा है ।
....विवेक दुबे"निश्चल"@...
876
कर्म सदा तू तेरा करता जा।
मन मनका फेरा करता जा ।
मन अँधियारो की परिधि में,
उजियारो का घेरा करता जा ।
....विवेक दुबे"निश्चल"@..
876/A
कर्म सदा तू अपना करता जा।
मन मनका जपना करता जा ।
मन के अँधियारो की परिधि में,
उजियारो की रचना करता जा ।
...विवेक दुबे"निश्चल"@...
877
ये तप्त शिलाएं वर्तमान की ,
ठंडी होतीं अतीत हिमकण से ।
दिन चलता उजास सँग तपते तपते ,
साँझ जीत रही फिर दिनकर से ।
. .....
878
क्यूँ अब तक मैं कुछ न कुछ सीख रहा ।
क्यूँ अब तक कुछ न कुछ न ठीक रहा ।
कुछ धुँधले से साये मन के उजियारों में ,
क्यूँ दिन उजियारों में कुछ न दीख रहा ।
......
879
क्यूँ अब तक मैं कुछ न कुछ सीख रहा ।
क्यूँ अब तक कुछ न कुछ न ठीक रहा ।
कुछ धुँधले से साये दिन के उजियारों में ,
मन के उजियारों में हाँ कुछ दीख रहा ।
....विवेक दुबे"निश्चल"@...
डायरी 3
880
लहरों का यूँ नसीब न रहा ।
साहिल कभी रक़ीब न रहा ।
उठते रहे तूफ़ां समंदर के दिल में,
समंदर का कोई हबीब न रहा ।
........
881
एक शाम समंदर सी ।
खुशियों का मंजर सी ।
डूब रही है धीरे-धीरे ,
देकर चाहत सुंदर सी ।
.......
882
अक़्स अश्क़ में धुल गए ।
छाँव पलकों में जल गए ।
मंजिल पा जाने से पहले ,
छाले पाँव में मचल गए ।
….
883
इस हिसाब-ऐ-दुनियाँ में ,
न कुछ जोड़ न कुछ घटा ।
रहने दे मुगालता निग़ाह का ,
पर्दा निग़ाह का तू न हटा ।
.......
884
जब कोई सहारा न हो ,
तू तब आप सहारा बन जा ।
वक़्त झुकेगा तेरे आंगे ,
तू तूफानों का प्यारा बन जा ।
.......
885
आशाओं ही के बोझ तले ,
चुपचाप चली अभिलाषा ।
"निश्चल" ज़ीवन के पथ पर ,
जीव सदा एकाकी चलता जाता ।
....
886
सिहर चला सन्नाटे से ।
वक़्त कटे न काटे से ।
टकरातीं लहरें सागर की ,
ज़ीवन तट ज्वर के भाटे से ।
.......विवेक दुबे"निश्चल"@...
887
कुछ चाहतें जिंदगी की ।
कुछ हसरतें जिंदगी की ।
बदलती रही तासीर अपनी,
कुछ शोहरतें जिंदगी की ।
....विवेक दुबे"निश्चल"@...
डायरी 3
888
कुछ मोहरे बिछे बिसात पे ।
चलते चालें घात से घात पे ।
अपने एक राजा की ख़ातिर ,
गिरते प्यादे शेंह और मात पे ।
....
889
अंजाम से अपने वो अंजान हैं ।
हाथ में नही तनिक भी ईमान है ।
चलते हैं साथ ले नस्लें इंसान की ,
इतना ही इंसानियत का गुमान है ।
...विवेक दुबे"निश्चल"@...
डायरी 3
बुधवार, 15 जनवरी 2020
गुरुवार, 9 जनवरी 2020
सोमवार, 6 जनवरी 2020
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संदेश (Atom)
कलम चलती है शब्द जागते हैं।
सम्मान पत्र
मान मिला सम्मान मिला। अपनो में स्थान मिला । खिली कलम कमल सी, शब्दों को स्वाभिमान मिला। मेरी यूँ आदतें आदत बनती गई । शब्द जागते...












































