कुछ खास नहीं कवि पिता की संतान हूँ । ..... निर्दलीय प्रकाशन भोपाल द्वारा बर्ष 2012 में "युवा सृजन धर्मिता अलंकरण" से अलंकृत। जन चेतना साहित्यिक सांस्कृतिक समिति पीलीभीत द्वारा 2017 श्रेष्ठ रचनाकार से सम्मानित कव्य रंगोली त्रैमासिक पत्रिका लखीमपुर खीरी द्वारा साहित्य भूषण सम्मान 2017 से सम्मानित "निश्चल" मन से निश्छल लिखते जाओ । ..... . (रचनाये मौलिक स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित .)
रविवार, 12 अप्रैल 2020
शुक्रवार, 10 अप्रैल 2020
ज़ीवन की संभावनाएं ,
जितना तू बे-ज़िक्र रहेगा ।
उतना तू बे-फ़िक्र रहेगा ।
चल छोड़ दे फिक्रें कल की ।
न छीन खुशियाँ इस पल की ।
न कर रश्क़ अपने रंज-ओ-मलाल से ।
कर तर खुदी को ख़ुशी के गुलाल से ।
दर्या हूँ वह जाऊँगा समंदर की चाह में ।
मिलेगा बजूद मेरा कही किसी आह में ।
.....
सहारे गर्दिश-ऐ-फ़रियाद में ,
रिश्तों की बुनियाद हुआ करते हैं ।
....
ज़ीवन की संभावनाएं ,
पल प्रतिपल शेष हैं ।
ज़ीवन के रहते मिटता नही ,
कुछ भी विशेष है ।
....विवेक दुबे"निश्चल"@..
वक़्त कब कहाँ मेरा रहा ।
इतना ही जहां मेरा रहा ।
..."निश्चल"..
जब इसी राह से गुजरना है ।
तब हालात से क्या डरना है ।
आयेगी मंजिल तभी हाथ में ,
जब हालात हाथ में करना है ।
....विवेक दुबे"निश्चल"@...
उतना तू बे-फ़िक्र रहेगा ।
चल छोड़ दे फिक्रें कल की ।
न छीन खुशियाँ इस पल की ।
न कर रश्क़ अपने रंज-ओ-मलाल से ।
कर तर खुदी को ख़ुशी के गुलाल से ।
दर्या हूँ वह जाऊँगा समंदर की चाह में ।
मिलेगा बजूद मेरा कही किसी आह में ।
.....
सहारे गर्दिश-ऐ-फ़रियाद में ,
रिश्तों की बुनियाद हुआ करते हैं ।
....
ज़ीवन की संभावनाएं ,
पल प्रतिपल शेष हैं ।
ज़ीवन के रहते मिटता नही ,
कुछ भी विशेष है ।
....विवेक दुबे"निश्चल"@..
वक़्त कब कहाँ मेरा रहा ।
इतना ही जहां मेरा रहा ।
..."निश्चल"..
जब इसी राह से गुजरना है ।
तब हालात से क्या डरना है ।
आयेगी मंजिल तभी हाथ में ,
जब हालात हाथ में करना है ।
....विवेक दुबे"निश्चल"@...
माँ
माँ कैसी है तू ,इतना तो पूछा जा सकता है ।
इस दुनियाँ में, इतना वक़्त तो पा सकता है ।
स्वर्थ भरी दुनियाँ में,साथ रहे न जब कोई ,
माँ के आँचल में,जब चाहे तब आ सकता है ।
......विवेक दुबे"निश्चल"@...
इस दुनियाँ में, इतना वक़्त तो पा सकता है ।
स्वर्थ भरी दुनियाँ में,साथ रहे न जब कोई ,
माँ के आँचल में,जब चाहे तब आ सकता है ।
......विवेक दुबे"निश्चल"@...
माँ
...1
मोल नही कुछ मात का, मातु मनुष का मूल ।
मातु आशीष जो मिले , चुभत न कोई शूल ।
....2
न्यारा माँ का नाम है, माँ जग का उजियार ।
माँ के आँचल छाँव से, शीतल मनस संसार ।
....3
साथ दुआ हो मातु की, कभी न होत हताश ।
सर मातु आशीष धरे ,कदम बिछे आकाश ।
....4
स्मृतियाँ ही शेष हैं, उसके ये अवशेष ।
उसके बारे में लिखे ,पास नही शब्द शेष ।
..5
सुध खो दे मेरे लिये, दुख की न रहे घूप ।
ये विधना भी जग में , माँ का ही है रूप।
... विवेक दुबे"निश्चल"@..
लक्ष्य उसी ने बस पाया है ।
765
लक्ष्य उसी ने बस पाया है ।
जो आगे आगे चल पाया है ।
देखो हर भोर मुहाने पर ,
दिनकर ही पहले आया है ।
निशि के आँचल में छुपने से पहले ,
संध्या को भी ललचाया है ।
जो चँदा आता कुछ चलकर ,
सूरज का हम साया कहलाया है ।
लक्ष्य उसी ने बस पाया है ।
आगे आगे जो चल पाया है ।
पवन चली तरल बन के ,
खुशबू का झोंका आया है ।
मदमस्त मकरंद सुगंध भरा,
वो फ़ूल बाद नजर आया है ।
अंबर बून्द चली मिलने धरती को ,
रजः कण ने श्रृंगार उठाया है ।
है पोषित कण कण जिससे ,
गर्भ धरा ने तो फिर पाया है ।
लक्ष्य उसी ने बस पाया है ।
आगे आगे जो चल पाया है ।
ना सोच जरा तनिक विश्राम नही ,
दिनकर तो हर दिन ही आया है ।
ठहर नही चलता चल राहों पर ,
तूने खुद को क्यों बिसराया है ।
लक्ष्य उसी ने बस पाया है ।
जो आगे आगे चल पाया है ।
देखो हर भोर मुहाने पर ,
दिनकर ही पहले आया है ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@.
डायरी 7
Blog post 10/4/20
लक्ष्य उसी ने बस पाया है ।
जो आगे आगे चल पाया है ।
देखो हर भोर मुहाने पर ,
दिनकर ही पहले आया है ।
निशि के आँचल में छुपने से पहले ,
संध्या को भी ललचाया है ।
जो चँदा आता कुछ चलकर ,
सूरज का हम साया कहलाया है ।
लक्ष्य उसी ने बस पाया है ।
आगे आगे जो चल पाया है ।
पवन चली तरल बन के ,
खुशबू का झोंका आया है ।
मदमस्त मकरंद सुगंध भरा,
वो फ़ूल बाद नजर आया है ।
अंबर बून्द चली मिलने धरती को ,
रजः कण ने श्रृंगार उठाया है ।
है पोषित कण कण जिससे ,
गर्भ धरा ने तो फिर पाया है ।
लक्ष्य उसी ने बस पाया है ।
आगे आगे जो चल पाया है ।
ना सोच जरा तनिक विश्राम नही ,
दिनकर तो हर दिन ही आया है ।
ठहर नही चलता चल राहों पर ,
तूने खुद को क्यों बिसराया है ।
लक्ष्य उसी ने बस पाया है ।
जो आगे आगे चल पाया है ।
देखो हर भोर मुहाने पर ,
दिनकर ही पहले आया है ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@.
डायरी 7
Blog post 10/4/20
सवाल आज ज़िंदगी खास का है
सवाल आज ज़िंदगी खास का है ।
समय बंदगी और अरदास का है ।
पुकार ले हृदय से आज उसको ,
जो भी ईस्वर तेरे विश्वास का है ।
रच डाली वो प्रलय तू ने ही ,
जो अधिकार उसके पास का है ।
माँग कर क्षमा अब भी सुधर जा,
निर्णय स्वयं के अहसास का है ।
हर दम है दयालू वो बड़ा ,
हृदय उसका अंनत आकाश का है ।
कर देगा क्षमा एक पल में तुझे ,
कर शपथ तू प्रकृति के साथ का है ।
न बदलूँगा अब तेरे नियम को,
हर नियम जो प्रभु तेरे हाथ का है ।
कर जोड़कर प्रण प्राण से कर प्रार्थना,
हृदय स्थान प्रभु के "निश्चल"निवास का है।
..... विवेक दुबे"निश्चल"@...
समय बंदगी और अरदास का है ।
पुकार ले हृदय से आज उसको ,
जो भी ईस्वर तेरे विश्वास का है ।
रच डाली वो प्रलय तू ने ही ,
जो अधिकार उसके पास का है ।
माँग कर क्षमा अब भी सुधर जा,
निर्णय स्वयं के अहसास का है ।
हर दम है दयालू वो बड़ा ,
हृदय उसका अंनत आकाश का है ।
कर देगा क्षमा एक पल में तुझे ,
कर शपथ तू प्रकृति के साथ का है ।
न बदलूँगा अब तेरे नियम को,
हर नियम जो प्रभु तेरे हाथ का है ।
कर जोड़कर प्रण प्राण से कर प्रार्थना,
हृदय स्थान प्रभु के "निश्चल"निवास का है।
..... विवेक दुबे"निश्चल"@...
राम नाम का भजन करो
आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसंपदाम्।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम् ।।
मैं इस संसार के प्रिय एवं सुन्दर ,
भगवान् राम को,बार-बार नमन करता हूं ।
जो सभी आपदाओं को दूर करने वाले
तथा सुख-सम्पति प्रदान करनेवाले हैं।
नित सब नमन करो ।
पल छिन मनन करो ।
दूर हो संकट शृष्टि का,
राम नाम का भजन करो ।
....विवेक दुबे"निश्चल"@..
मानव रचित प्रलय के प्रत्यक्ष हम होंगे ।
पाप धरा से शायद अब यूँ ही कम होंगे ।
...विवेक दुबे"निश्चल"@....
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम् ।।
मैं इस संसार के प्रिय एवं सुन्दर ,
भगवान् राम को,बार-बार नमन करता हूं ।
जो सभी आपदाओं को दूर करने वाले
तथा सुख-सम्पति प्रदान करनेवाले हैं।
नित सब नमन करो ।
पल छिन मनन करो ।
दूर हो संकट शृष्टि का,
राम नाम का भजन करो ।
....विवेक दुबे"निश्चल"@..
मानव रचित प्रलय के प्रत्यक्ष हम होंगे ।
पाप धरा से शायद अब यूँ ही कम होंगे ।
...विवेक दुबे"निश्चल"@....
वीरों के जयकारे
न गलियों में थूंका न मीनारों से पत्थर फैका मैंने ।
न भद्दी भाषा बोली न नियमों को तोड़ा मैंने ।
जगमग जग में गहराये अंधियारों में ,
दीपों के उजियारे से, अँधियारे में देखा मैंने ।
......विवेक दुबे"निश्चल"@...
गुंजित कर दे आज गगन ,
इन वीरों के जयकारों से ।
जो जूझ रहे सतत निरन्तर,
प्रकृति के क्रूर प्रहारों से ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@...
कर्तव्य निष्ठा की पराकाष्ठा ।
नमन इस समर्पण भाव को ।
भारतमाता के सच्चे सपूत ।
जय हो जय हो शत शत नमन ।
न भद्दी भाषा बोली न नियमों को तोड़ा मैंने ।
जगमग जग में गहराये अंधियारों में ,
दीपों के उजियारे से, अँधियारे में देखा मैंने ।
......विवेक दुबे"निश्चल"@...
गुंजित कर दे आज गगन ,
इन वीरों के जयकारों से ।
जो जूझ रहे सतत निरन्तर,
प्रकृति के क्रूर प्रहारों से ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@...
कर्तव्य निष्ठा की पराकाष्ठा ।
नमन इस समर्पण भाव को ।
भारतमाता के सच्चे सपूत ।
जय हो जय हो शत शत नमन ।
3
झालर खनकी शंख गरजते ।
ढोल बजे कही तासे बजते ।
दिन रात लगे हैं जो सेवा में ,
उनका हम सम्मान सहजते ।
...विवेक दुबे"निश्चल"@....
बस अब इतना ही करो ना ।
सीमा में ही अपनी रहो ना ।
सिमट जाओ दायरे में अपने,
टूट जाये ये श्रृंखला कोरोना ।
लेकर साहस संकल्प हृदय से ,
सिवा प्रभु के किसी से डरो ना ।
.....विवेक दुबे"निश्चल"@...
छा रहा है कोरोना ।
अब कुछ करो-ना ।
न लगो गले किसी के,
आस पास अब रहो ना ।
...विवेक दुबे"निश्चल"@...
जान बचाने जो आये ,
उन पे पत्थर बरसाते है ।
बेक़सूर है हम फिर भी,
वो बेशर्म फ़रमाते है ।
...."निश्चल"@....
फ़र्क नही पड़ता,समस्या चाहे कितनी संगीन हो जाये ।
बे-असर है बो ,आसमां भले ही ज़मीन हो जाये ।
बो मुसलसल कायम है अपनी ही रूढ़ियों पर ,
संक्रमण से पीढित एक से भले तीन हो जायें ।
...."निश्चल"@....
आज इम्तेहान की घड़ी हमारी है ।
भूक लाचार निरीह की बेचारी है ।
बांटे हम सब कुछ थोड़ा थोड़ा ,
एक रोटी में से आधी तुम्हारी है ।
....विवेक दुबे"निश्चल"@....
ताक़त दिये कि
एक चिराग अंधेरो पर कितना भारी है ।
रात चरागों ने ताक़त अपनी दिखा दी है ।
जलकर कर दिए जगमग दियों ने दिये ,
ताक़त एकता की अपनी उजियारी है ।
न जात आई न धर्म आड़े आया कहीं ,
भारत देश ने समर की की तैयारी है ।
रहें दूर हम सब बस कुछ समय लिए ,
संकल्प ढाल से हारती हर बीमारी है ।
"निश्चल" करें संघर्ष नाम लेकर प्रभु का ,
आज की ये दुनियाँ कल भी हमारी है ।
..... विवेक दुबे"निश्चल"@....
रात चरागों ने ताक़त अपनी दिखा दी है ।
जलकर कर दिए जगमग दियों ने दिये ,
ताक़त एकता की अपनी उजियारी है ।
न जात आई न धर्म आड़े आया कहीं ,
भारत देश ने समर की की तैयारी है ।
रहें दूर हम सब बस कुछ समय लिए ,
संकल्प ढाल से हारती हर बीमारी है ।
"निश्चल" करें संघर्ष नाम लेकर प्रभु का ,
आज की ये दुनियाँ कल भी हमारी है ।
..... विवेक दुबे"निश्चल"@....
तम हरने की आशा में
तम हरने की आशा में ,
नित एक दीप जलाता मैं ।
चाहे न हो उजियारा भानू सा ,
किरणों से आशा पाता मैं ।
....विवेक दुबे"निश्चल"@...
तम हरने की आशा में ,
एक दीप जलाऊंगा मैं ।
चाहे न हो उजियारा भानू सा ,
किरणों से आशा पाऊंगा मैं ।
....विवेक दुबे"निश्चल"@...
रोशनी दियों पर भी सवाल उछाले है ।
देखो कैसे ये वतन को चाहने बाले है ।
हो होंसला जीतने ज़िंदगी की जंग को ,
जुगनुओं ने अंधेरो में उजाले निकाले है ।
..... विवेक दुबे"निश्चल"@...
नित एक दीप जलाता मैं ।
चाहे न हो उजियारा भानू सा ,
किरणों से आशा पाता मैं ।
....विवेक दुबे"निश्चल"@...
तम हरने की आशा में ,
एक दीप जलाऊंगा मैं ।
चाहे न हो उजियारा भानू सा ,
किरणों से आशा पाऊंगा मैं ।
....विवेक दुबे"निश्चल"@...
रोशनी दियों पर भी सवाल उछाले है ।
देखो कैसे ये वतन को चाहने बाले है ।
हो होंसला जीतने ज़िंदगी की जंग को ,
जुगनुओं ने अंधेरो में उजाले निकाले है ।
..... विवेक दुबे"निश्चल"@...
शनिवार, 7 मार्च 2020
शुक्रवार, 6 मार्च 2020
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कलम चलती है शब्द जागते हैं।
सम्मान पत्र
मान मिला सम्मान मिला। अपनो में स्थान मिला । खिली कलम कमल सी, शब्दों को स्वाभिमान मिला। मेरी यूँ आदतें आदत बनती गई । शब्द जागते...





















































