शुक्रवार, 25 दिसंबर 2015

अंदाज़ मेरा


एक अंदाज़ है मेरा भी,राख होने का !
आखरी कश तक,सुलग कर ज़िंदा रहने का!!
     ...विवेक...

गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

मंगलवार, 8 दिसंबर 2015

मैं जादूगर शब्दों का ...


हाँ मैं जादूगर शब्दों का ।
हाँ मग़र चुप रहता हूँ मैं ।
हाँ मैं कलाकार कलम का ।
हाँ मग़र लिखता नहीं हूँ मैं ।
हाँ सुनता हूँ बाते दुनियां की ।
हाँ पढ़ता हूँ  कलम दुनियां की ।
हाँ सुन कर बाते दुनियां की ।
हाँ रह जाता हूँ खामोश ।
हाँ पढ़ कर कलम लोगो की ।
हाँ कलम उठती नहीं मेरी ।
   ....विवेक...

रविवार, 6 दिसंबर 2015

शब्दों का तम


हर ले तू शब्दों के तम ।
 उजियारा भर हर दम ।
                 थाम कर कलम ,
                 कर नव सृजन ।
हर पल हर दम ।
उकेर पीड़ाओं को भी ,
        जीवन रंग में डुबो कलम ।
         हर ले तू शब्दों के तम ।
अवसादों और निराशाओं को ।
छू कर उन अभिलाषाओं को।
     आशाओं से खुशियों के भाव बना ।
     अपने हृदय मन उदगार उठा।
शब्दों का फिर आकार सजा ।
         तू लिखता जा तू लिखता जा ।
        हर पल हर क्षण कर बस सृजन ।

हर ले तू शब्दों के तम ।
  कर सृजन तू कर सृजन ।
...... विवेक दुबे "निश्चल"@.....

ब्लॉग पोस्ट 10/10/17

शनिवार, 5 दिसंबर 2015

कलम उठती नही


हाँ मैं जादूगर शब्दों का
 मग़र चुप रहता हूँ मैं
 हाँ मैं कलाकार कलम का
 मग़र लिखता नहीं हूँ मैं
 सुनता हूँ बाते दुनियां की
 पड़ता हूँ लोगों की कलम को
  सुन कर बाते दुनियां की
  खामोश रह जाता हूँ
 पढ़ कर कलम लोगो की
 कलम उठती नहीं मेरी
   ....विवेक®...

खोल किवड़िया मन की


खोजा जाने कहां कहां
मन्दिर मस्ज़िद गुरूद्वारे
खोज खोज सब हारे
बस खोले नही किसी ने
अपने मन के दरवाज़े
खोल किवड़िया मन की
जिसने झांका मन के द्वारे
थम गया तब वहीं वो
न भटका फिर द्वारे द्वारे
जगमग जगमग हो उठे
हृदय मन के अंधियारे
....विवेक®....

तू लड़ ज़िगर से


तू लड़ ज़िगर से
तू चल फ़िकर से
धर कदम उस डगर पे
जहा न हों कोई निशां
किसी और के कदम के
अपने रास्ते खुद बना
अपनी मंजिलों को
तू खुद सजा
धर कदम सम्हल के
छोड़ता जा निशां
हर कदम के
कल कह सके दुनियां
कोई गुजरा है इधर से
   ....विवेक®...

बुधवार, 2 दिसंबर 2015

पढ़ने बाले भी मिल जायेंगे


आप लिखते हो दिल से
 पढ़ने बाले भी मिल जायेंगे
आज नही तो कल आयेंगे
सौ नही दो आयेंगे
 पर जो आयेंगे
 सच्चे दिल से आयेंगे
जो अपने कहलायेंगे
    ....विवेक.....

रविवार, 29 नवंबर 2015

कुछ कह जाता हूँ


हाँ मैं कुछ कहता हूँ
 कुछ लिखता हूँ
 कह जाता हूँ बात
 कभी कभी
 किताबों से आंगे
 5/7/15

शनिवार, 28 नवंबर 2015

सावधान इन जय चंदों से


   ...सावधान .....
 इनको ही स्वीकार करो
 इनकी ही जय जयकार करो
 न इनका प्रतिकार करो
  तब नहीं कही कोई संकट
 बस हो गये सेक्युलर तब सब
 सहष्णुता भी सुरक्षित सिर्फ तब
  सावधान इन जयचंदो से
बगुला भक्ति के इनके फंडों से
छदम् दिखावा इनका
छल कपट धंधा जिनका
 हमने जैसे ही अपना सोचा
क्यों लगा इनको यह खोटा
 सहते ही तो आये हैं अब तक
 खूब किया छल कपट अब तक
  और नहीं अब बस अब बस
    ....विवेक..

राधिका मन सी प्यासी


राधिका मन सी मैं प्यासी ।
बन कृष्ण सखा की दासी ।
रच जाऊं मन मे ।
बस जाऊं नैनन मे।
मिल जाऊं धड़कन मे ।
छा जाऊं चितवन मे ।
न भेद रहे फिर कोई ।
इस मन मे उस मन मे ।
...विवेक...

सोमवार, 23 नवंबर 2015

बारिश का नजारा


बारिश का नजारा हो ।
खिड़की का सहारा हो ।

एक चाँद हमारा हो ।
एक सितारा तुम्हारा हो ।

दिल ने दिल को हरा हो ।
धरती अंबर हमारा हो ।।
.....विवेक...

रविवार, 22 नवंबर 2015

हाँ वक़्त बदलते देखा है



हाँ वक़्त बदलते देखा है ।
सूरज को ढ़लते देखा है ।
 चन्दा को घटते देखा है ।
 तारों को गिरते देखा है ।
 हाँ वक़्त बदलते देखा है ।
 हिमगिरि पिघलते देखा है ।
 सावन को जलते देखा है ।
 सागर को जमते देखा है ।
 नदियां को थमते देखा है ।
 हाँ वक़्त बदलते देखा है ।
 खुशियों को छिनते देखा है ।
 खुदगर्जी का मंजर देखा है ।
 अपनों को बदलते देखा है ।
 हाँ वक़्त बदलते देखा है ।
 नही कोई दस्तूर जहां ,
  ऐसा दिल भी देखा है ।
 नजरों का वो मंजर देखा है ।
 उतरता पीठ में खंजर देखा है ।
 हाँ वक़्त बदलते देखा है ।
    .....विवेक....

कलम चलती है शब्द जागते हैं।

सम्मान पत्र

  मान मिला सम्मान मिला।  अपनो में स्थान मिला ।  खिली कलम कमल सी,  शब्दों को स्वाभिमान मिला। मेरी यूँ आदतें आदत बनती गई ।  शब्द जागते...