कुछ खास नहीं कवि पिता की संतान हूँ । ..... निर्दलीय प्रकाशन भोपाल द्वारा बर्ष 2012 में "युवा सृजन धर्मिता अलंकरण" से अलंकृत। जन चेतना साहित्यिक सांस्कृतिक समिति पीलीभीत द्वारा 2017 श्रेष्ठ रचनाकार से सम्मानित कव्य रंगोली त्रैमासिक पत्रिका लखीमपुर खीरी द्वारा साहित्य भूषण सम्मान 2017 से सम्मानित "निश्चल" मन से निश्छल लिखते जाओ । ..... . (रचनाये मौलिक स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित .)
शुक्रवार, 25 दिसंबर 2015
गुरुवार, 24 दिसंबर 2015
रविवार, 13 दिसंबर 2015
मंगलवार, 8 दिसंबर 2015
मैं जादूगर शब्दों का ...
हाँ मैं जादूगर शब्दों का ।
हाँ मग़र चुप रहता हूँ मैं ।
हाँ मैं कलाकार कलम का ।
हाँ मग़र लिखता नहीं हूँ मैं ।
हाँ सुनता हूँ बाते दुनियां की ।
हाँ पढ़ता हूँ कलम दुनियां की ।
हाँ सुन कर बाते दुनियां की ।
हाँ रह जाता हूँ खामोश ।
हाँ पढ़ कर कलम लोगो की ।
हाँ कलम उठती नहीं मेरी ।
....विवेक...
रविवार, 6 दिसंबर 2015
शब्दों का तम
हर ले तू शब्दों के तम ।
उजियारा भर हर दम ।
थाम कर कलम ,
कर नव सृजन ।
हर पल हर दम ।
उकेर पीड़ाओं को भी ,
जीवन रंग में डुबो कलम ।
हर ले तू शब्दों के तम ।
अवसादों और निराशाओं को ।
छू कर उन अभिलाषाओं को।
आशाओं से खुशियों के भाव बना ।
अपने हृदय मन उदगार उठा।
शब्दों का फिर आकार सजा ।
तू लिखता जा तू लिखता जा ।
हर पल हर क्षण कर बस सृजन ।
हर ले तू शब्दों के तम ।
कर सृजन तू कर सृजन ।
...... विवेक दुबे "निश्चल"@.....
ब्लॉग पोस्ट 10/10/17
शनिवार, 5 दिसंबर 2015
कलम उठती नही
हाँ मैं जादूगर शब्दों का
मग़र चुप रहता हूँ मैं
हाँ मैं कलाकार कलम का
मग़र लिखता नहीं हूँ मैं
सुनता हूँ बाते दुनियां की
पड़ता हूँ लोगों की कलम को
सुन कर बाते दुनियां की
खामोश रह जाता हूँ
पढ़ कर कलम लोगो की
कलम उठती नहीं मेरी
....विवेक®...
खोल किवड़िया मन की
खोजा जाने कहां कहां
मन्दिर मस्ज़िद गुरूद्वारे
खोज खोज सब हारे
बस खोले नही किसी ने
अपने मन के दरवाज़े
खोल किवड़िया मन की
जिसने झांका मन के द्वारे
थम गया तब वहीं वो
न भटका फिर द्वारे द्वारे
जगमग जगमग हो उठे
हृदय मन के अंधियारे
....विवेक®....
बुधवार, 2 दिसंबर 2015
पढ़ने बाले भी मिल जायेंगे
आप लिखते हो दिल से
पढ़ने बाले भी मिल जायेंगे
आज नही तो कल आयेंगे
सौ नही दो आयेंगे
पर जो आयेंगे
सच्चे दिल से आयेंगे
जो अपने कहलायेंगे
....विवेक.....
रविवार, 29 नवंबर 2015
शनिवार, 28 नवंबर 2015
सावधान इन जय चंदों से
...सावधान .....
इनको ही स्वीकार करो
इनकी ही जय जयकार करो
न इनका प्रतिकार करो
तब नहीं कही कोई संकट
बस हो गये सेक्युलर तब सब
सहष्णुता भी सुरक्षित सिर्फ तब
सावधान इन जयचंदो से
बगुला भक्ति के इनके फंडों से
छदम् दिखावा इनका
छल कपट धंधा जिनका
हमने जैसे ही अपना सोचा
क्यों लगा इनको यह खोटा
सहते ही तो आये हैं अब तक
खूब किया छल कपट अब तक
और नहीं अब बस अब बस
....विवेक..
राधिका मन सी प्यासी
राधिका मन सी मैं प्यासी ।
बन कृष्ण सखा की दासी ।
रच जाऊं मन मे ।
बस जाऊं नैनन मे।
मिल जाऊं धड़कन मे ।
छा जाऊं चितवन मे ।
न भेद रहे फिर कोई ।
इस मन मे उस मन मे ।
...विवेक...
सोमवार, 23 नवंबर 2015
बारिश का नजारा
बारिश का नजारा हो ।
खिड़की का सहारा हो ।
एक चाँद हमारा हो ।
एक सितारा तुम्हारा हो ।
दिल ने दिल को हरा हो ।
धरती अंबर हमारा हो ।।
.....विवेक...
रविवार, 22 नवंबर 2015
हाँ वक़्त बदलते देखा है
हाँ वक़्त बदलते देखा है ।
सूरज को ढ़लते देखा है ।
चन्दा को घटते देखा है ।
तारों को गिरते देखा है ।
हाँ वक़्त बदलते देखा है ।
हिमगिरि पिघलते देखा है ।
सावन को जलते देखा है ।
सागर को जमते देखा है ।
नदियां को थमते देखा है ।
हाँ वक़्त बदलते देखा है ।
खुशियों को छिनते देखा है ।
खुदगर्जी का मंजर देखा है ।
अपनों को बदलते देखा है ।
हाँ वक़्त बदलते देखा है ।
नही कोई दस्तूर जहां ,
ऐसा दिल भी देखा है ।
नजरों का वो मंजर देखा है ।
उतरता पीठ में खंजर देखा है ।
हाँ वक़्त बदलते देखा है ।
.....विवेक....
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कलम चलती है शब्द जागते हैं।
सम्मान पत्र
मान मिला सम्मान मिला। अपनो में स्थान मिला । खिली कलम कमल सी, शब्दों को स्वाभिमान मिला। मेरी यूँ आदतें आदत बनती गई । शब्द जागते...

