रविवार, 11 फ़रवरी 2018

भक्ति के प्रकार

  भक्ति के नौ प्रकार,
  कहें शास्त्र स-उपकार।
    श्रवण,कीर्तन,स्मरण,
               पाद सेवन,वंदन,
                    दस्य,सख्य,आत्मनिवेदन।
 सब *नवधा भक्ति* प्रकार ।

 1 श्रवण कर श्रद्धा सहित,
    अतृप्त निरन्तर मन भाव।

      2
         कीर्तन कर मन मग्न भाव से,
          कर हरि लीला का गुण गान ।

  3
    स्मरण कर हर पल प्रभु का,
    कर उसकी शक्ति महात्म्य विचार।

            4
               आश्रय ले प्रभु चरणों मे,
               पाद सेवन सर्वस्य मान।

 5
      अर्चन कर मन वचन कर्म से,
      पवित्र भाव से प्रभु चरण पखार।

          6
             वंदन सदा कर तू परमेश्वर का,
             कण कण प्रभु छवि निहार ।

7
    दास्य रहो सदा परमेश्वर के ,
   कृतार्थ भाव से मानो उपकार।

  8
     साख्य भाव से साझा समझ के,
    पाप पुण्य समर्पित निवेदित हो पुकार।

 9
   आत्मनिवेदित मन से प्रभु चरणों मे,
    मिल परम् सत्ता से कर एकाकार।

           पा जाएगा तब तू हरि दर्शन,
          जन्म हुआ सार्थक साकार ।
    .....  विवेक दुबे"निश्चल"©......

कृपा करें राम जी

राधा बड़ भागनी, नटखट है घनश्याम।
 बाजत कान्हा बाँसुरी, स्वर बोलें राधा नाम।

राम चरण की चाकरी,चित्त नही विश्राम।
कृपा करें राम जी, पूरन हों सब काम।
  ..... विवेक दुबे 'निश्चल"©.....

हम मोहरे बिसात के

ईस्वर ही पार लगाऐ ,
हैं सब उसके ही खेल रचाऐ ।
हम मोहरे बिसात के ,
वो जैसा चाहे चलते जाऐ।
   ....विवेक दुबे"निश्चल"...

कुछ सवलों के ज़वाब नही होते

कुछ सवालों के जवाब नही होते ।
 हर जवाब के सवाल नही होते ।
 होते हैं कुछ किस्से ज़िन्दगी में ,
 हर किस्से बेमिशाल नही होते ।
    ..... विवेक दुबे "निश्चल"©....

आज भी नारी बेचारी है

ग़ुम हुए राम     आज रावण भारी है ।
 कृष्ण खो गए        बंशी की  तान में ,
 दुशासन के सामने द्रोपती बेचारी है ।
 प्रगति के युग में आज भी नारी बेचारी है ।
    ..... विवेक दुबे"निश्चल"© ...

आशाओं के दीप

आशाओं के दीप जलाता हूँ ।
 खुद में खुद खो जाता हूँ ।
 कुछ कह जाता हूँ ।
भावो में बह जाता हूँ ।
 भावो से भिड जाता हूँ ।
 खुद से खुद टकराता हूँ ।
 मरता हूँ फिर जी जाता हूँ ।
 फिर नई रौशनी पता हूँ ।
 फिर एक दीप जलाता हूँ ।
 आशाओं में फिर खो जाता हूँ ।
 आशाओं से आशाओं के ,
दीप जलाता हूँ ।
     .... विवेक  दुबे"निश्चल"©....
  

रीत राग में उलझा मन

रीत राग में उलझा मन ।
 भोग विलास में लिपटा तन ।
 प्रेम प्यार से उलझ मन ।
 रूप श्रंगार में लिपटा तन ।
 मन से मन की उलझन ।
 तन से तन की अनबन ।
 कैसे साधें तन मन को ,
 हो जाएँ हरि दर्शन ।
   .... विवेक दुबे"निश्चल"©...

श्याम सँग नाचत मन

श्याम संग नाचत मन ।
 राधिका सा बन ठन ।
 मानत रूठ जात मन ।
 मिलत छुपत जात मन ।
  राधा सा बन जात मन ।
 कान्हा में खो जात मन ।
 कान्हा का हो जात मन ।
      .... ....विवेक दुबे "निश्चल''...

तू आया था तब

तू आया तब था ।
नष्ट हुआ सा जब सब था ।
तू तो तब सब सुधार गया था ।
न भय न भृष्टाचार रहा था ।
तू ने पाप व्यभिचार मार दिया था ।
 गीता से सब को तब तार गया था ।
समय बदला युग बदला ।
आये फिर दानब लेने बदला ।
आज फिर मचा कोहराम ।
बही कंस बकासुर पूतना कौरव ।
करते अत्याचार सरे आम ।
धरती कांपी अम्बर डोला ।
हुआ त्रस्त हर इंसान ।
 बहुत हुआ पाप अनाचार ।
अब तो आ जाओ तुम ।
 धनश्याम ....
 ...विवेक दुबे "निश्चल"...

माँगा नही कुछ मैंने

 ख़ुदा से माँगा नहीं कुछ मैंने ।
बस अपनी बंदगी पेश की है ।
सज़दे में गुनाह कबूल कर ,
रहम के लिए फैलाए हाथ हैं ।
        ....विवेक दुबे"निश्चल"..

कृष्ण मिलन

कृष्ण सा मन चाहिए ।
राधा सा मिलन चाहिए ।
मीरा सा विरह चाहिए ।
गोपियों सा आग्रह चाहिए ।
कृष्ण मिलन को बस ,
और क्या चाहिए ।
 ...विवेक दुबे "निश्चल"©

ज़िन्दगी को जिया ऐसे

 ज़िन्दगी को जिया मैंने ऐसे ।
  हसरतों को कब्र किया जैसे ।।
शुकुं मिला बहुत मगर चैन न पाई ।
ज़िन्दगी देती रही मौत की दुहाई ।।
     ....विवेक दुबे"निश्चल"©...

मैं जादूगर शब्दों का

हाँ मैं जादूगर शब्दों का ,
मग़र चुप रहता हूँ ।
हाँ मैं कलाकार कलम का ,
मग़र लिखता नहीं हूँ ।
सुनता हूँ बाते दुनियां की ,
कलम लोगों की पढ़ता हूँ ।
सुन कर बातें दुनियां की ,
खामोश रह जाता हूँ ।
पढ़ कर कलम लोगो की ,
 मेरी कलम उठती नहीं है ।
....विवेक दुबे "निश्चल"©..
Dec 5, 2015 · 

जुगनू

मुसाफ़िर हमसे कहा राह पाते है ।
 हम जुगनूं रातों को टिमटिमाते है  ।
   ....विवेक दुबे "निश्चल"©..

कलम चलती है शब्द जागते हैं।

सम्मान पत्र

  मान मिला सम्मान मिला।  अपनो में स्थान मिला ।  खिली कलम कमल सी,  शब्दों को स्वाभिमान मिला। मेरी यूँ आदतें आदत बनती गई ।  शब्द जागते...