शुक्रवार, 10 अप्रैल 2020

राम नाम का भजन करो

आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसंपदाम्।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम्   ।।

 मैं इस संसार के प्रिय एवं सुन्दर , 
भगवान् राम को,बार-बार नमन करता हूं ।
 जो सभी आपदाओं को दूर करने वाले
 तथा सुख-सम्पति प्रदान करनेवाले हैं।




नित सब नमन करो ।
पल छिन मनन करो ।
 दूर हो संकट शृष्टि का,
 राम नाम का भजन करो ।
....विवेक दुबे"निश्चल"@..



मानव रचित प्रलय के प्रत्यक्ष हम होंगे ।
पाप धरा से शायद अब यूँ ही कम होंगे ।
 ...विवेक दुबे"निश्चल"@....

वीरों के जयकारे

न गलियों में थूंका न मीनारों से पत्थर फैका मैंने ।
न भद्दी भाषा बोली न नियमों को तोड़ा मैंने ।
जगमग जग में गहराये अंधियारों  में ,
 दीपों के उजियारे से, अँधियारे में देखा मैंने ।
......विवेक दुबे"निश्चल"@...


 गुंजित कर दे आज गगन ,
 इन वीरों के जयकारों से ।
 जो जूझ रहे सतत निरन्तर,
 प्रकृति के क्रूर प्रहारों से ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@...

कर्तव्य निष्ठा की पराकाष्ठा ।
नमन इस समर्पण भाव को ।

भारतमाता के सच्चे सपूत ।
जय हो जय हो शत शत नमन ।


3
झालर खनकी शंख गरजते ।
ढोल बजे कही तासे बजते ।
दिन रात लगे हैं जो सेवा में ,
उनका हम सम्मान सहजते ।
...विवेक दुबे"निश्चल"@....


बस अब इतना ही करो ना ।
सीमा में ही अपनी रहो ना ।
 सिमट जाओ दायरे में अपने,
 टूट जाये ये श्रृंखला कोरोना ।
लेकर साहस संकल्प हृदय से ,
सिवा प्रभु के किसी से डरो ना ।
.....विवेक दुबे"निश्चल"@...

छा रहा है कोरोना ।
अब कुछ करो-ना ।
न लगो गले किसी के,
आस पास अब रहो ना ।
...विवेक दुबे"निश्चल"@...

 जान बचाने जो आये ,
उन पे पत्थर बरसाते है ।
 बेक़सूर है हम फिर भी,
  वो बेशर्म फ़रमाते है ।
   ...."निश्चल"@....
फ़र्क नही पड़ता,समस्या चाहे कितनी संगीन हो जाये ।
बे-असर है बो ,आसमां भले ही ज़मीन हो जाये ।
बो मुसलसल कायम है अपनी ही रूढ़ियों पर ,
संक्रमण से पीढित एक से भले तीन हो जायें ।
...."निश्चल"@....
आज इम्तेहान की घड़ी हमारी है ।
भूक लाचार निरीह की बेचारी है ।
बांटे हम सब कुछ थोड़ा थोड़ा ,
एक रोटी में से आधी तुम्हारी है ।
....विवेक दुबे"निश्चल"@....

ताक़त दिये कि

एक चिराग अंधेरो पर कितना भारी है ।
रात चरागों ने ताक़त अपनी दिखा दी है ।

 जलकर कर दिए जगमग दियों ने दिये ,
 ताक़त एकता की अपनी उजियारी  है ।

 न जात आई न धर्म आड़े आया कहीं ,
 भारत देश ने समर की की तैयारी है ।

 रहें दूर हम सब बस कुछ समय लिए ,
 संकल्प ढाल से हारती हर बीमारी है ।

 "निश्चल" करें संघर्ष नाम लेकर प्रभु का ,
 आज की ये दुनियाँ कल भी हमारी है ।

     ..... विवेक दुबे"निश्चल"@....

तम हरने की आशा में

 तम हरने की आशा में ,
 नित एक दीप जलाता मैं ।
 चाहे न हो उजियारा भानू सा ,
 किरणों से आशा पाता मैं ।
....विवेक दुबे"निश्चल"@...


  तम हरने की आशा में ,
  एक दीप जलाऊंगा मैं ।
 चाहे न हो उजियारा भानू सा ,
 किरणों से आशा पाऊंगा मैं ।
....विवेक दुबे"निश्चल"@...

  रोशनी दियों पर भी सवाल उछाले है ।
 देखो कैसे ये वतन को चाहने बाले है ।
 हो होंसला जीतने ज़िंदगी की जंग को ,
 जुगनुओं ने अंधेरो में उजाले निकाले है ।

    ..... विवेक दुबे"निश्चल"@...

मंगलवार, 4 फ़रवरी 2020

हालतों से डरकर क्या होगा

763
हालतों से डरकर क्या होगा ।
घुट घुट के मरकर क्या होगा ।

लड़ जा ले साहस को अपने ,
देखें तो लड़कर क्या होगा ।

हार हुई हरदम हालातों की ,
साहस से बढ़कर क्या होगा ।

चलता चल दूर क्षितिज तक ,
कुंठाओं में घुटकर क्या होगा ।

 सहज सुहानी यादें मन भीतर ,
 चिंता मन में धरकर क्या होगा ।

"निश्चल" आज यही है साथ यही है ,
कल की चिंता करकर क्या होगा ।
....विवेक दुबे"निश्चल"@...
डायरी 7

वचपन

762
वो अंजान सा बचपन ।
वो नादान सा बचपन ।

उम्र के कच्चे मकां में ,
वो मेहमान सा बचपन ।

 इस ज़िंदगी के सफ़र में ,
 एक पहचान सा बचपन ।

 खोजता ख़ुद को ख़यालों में ,
  रहा अहसान सा बचपन ।
 ...विवेक दुबे"निश्चल"@....
डायरी 7

आओ कान्हा

 758
आओ कान्हा,
        दया दिखाओ कान्हा ।

छाओ चित में,
        मोहे न बिसराओ कान्हा ।

करुण पुकार सुनो मेरी,
      तुम कृपा बरसाओ कान्हा ।

हार रहा मन मन के हाथों,
       राह तुम दिखलाओ कान्हा ।

 जीत सकूँ स्वयं स्वयं के आगे ,
    स्वयं को हर ले जाओ कान्हा ।

 नयन बिलोकत पल छिन पल छिन ,
    सखी सी प्रीत निभाओ कान्हा ।

भाव भरे यह मन भीतर गहरे ,
    गोपी सा रास रचाओ कान्हा ।

 गीत गढूं नित नित तेरे ,
    अधरन प्यास बुझाओ कान्हा ।

 विनय यही बस लाज रखो मेरी ,
"निश्चल"को न बिसराओ कान्हा ।

आओ कान्हा, दया दिखाओ कान्हा ।
छाओ चित में,मोहे न बिसराओ कान्हा ।

..... विवेक दुबे"निश्चल"@...
डायरी 7
Blog post 4/2/2)

प्रचण्ड चंड नन्दनी

758
प्रचण्ड चंड नंदनी ।
 असुर शीश खंडनी ।
     महा पाप भंजनी ।
      महा देव वंदनी । 

 सहस्त्र कोटि भानु सम ,
 दिव्य तेज धरणी ।
       पाप के विनाश को ,
      महा माया रजनी ।

श्वेत वस्त्र धार के ,
 अशेष ज्ञान प्रदायनी ,
     महा ज्ञान प्रकाशनी  ।
     नमामि देवी नमोस्तुते ।
..... विवेक दुबे"निश्चल"@....
डायरी 7

गजल

757
- राज़-ऐ-वक़्त ---

2122 , 12 12 ,22

दूर कितना रहा , ज़माने में ।
कर सफ़र मैं तन्हा,वीराने में ।

 छूटता सा चला कहीं मैं ही ,
 यूँ नया सा शहर ,बसाने में ।

ढूँढ़ती है नज़र निशां कोई ,
क्यूँ मुक़ा तक ,चलके आने में ।

खोजता ही रहा कमी गोई ,
नुक़्स मिलता नही ,फ़साने में ।

रोकता चाह राह के वास्ते ,
चाँद भी हिज़्र तले,ढल जाने में ।

जूझती है युं रूह उम्र सारी ,
जिंदगी के रिश्ते निभाने में ।

राज़ है वक़्त में छुपा कोई   आज"निश्चल"मुझे,बनाने में ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@....

डायरी 7

रोकती चाह चाँद के वास्ते ,
चाँदनीं हिज़्र तले,ढल जाने में ।

छोड़ती राह चाँद के वास्ते ,
चाँदनी हिज़्र तले ढल जाने में ।

यूँ ही तुम मुझसे वात करते हो ।

गजल



ग़ज़ल प्रतियोगिता

बहारों ने तुझको पुकारा भी होगा ।
मिलाने निग़ाहें संवारा भी होगा ।
झुकाकर निग़ाहें बड़ी ही अदा से ,
इशारों में दिल को हारा भी होगा ।
चढ़ा इश्क़ परवाज़ राहे ख़ुदा में ।
हुस्न आइने में उतारा भी होगा ।
चला हूँ डगर पे तुझे साथ ले के ,
कहीं तो मुक़द्दर हमारा भी होगा ।
नही है सफर पे मुसाफ़िर अकेला,
मुक़ा मंजिल पे इक हमारा भी होगा ।
रहेंगे जहाँ पे सफर में अकेले ,
वहाँ पे दुआ का सहारा भी होगा ।
बहा है सदा साथ "निश्चल" दर्या के ,
कही तो युं मेरा किनारा भी होगा ।


     ....विवेक दुबे"निश्चल"@....




कलम चलती है शब्द जागते हैं।

सम्मान पत्र

  मान मिला सम्मान मिला।  अपनो में स्थान मिला ।  खिली कलम कमल सी,  शब्दों को स्वाभिमान मिला। मेरी यूँ आदतें आदत बनती गई ।  शब्द जागते...