मंगलवार, 16 जून 2020

जवाब क्या दूँ

*इन बेताबियों का जवाब क्या दूँ  ।*
 *इन बेकरारियों का हिसाब क्या दूँ ।*

 *पाल बैठा हूँ दुश्मनी ख्यालों से भी ,*
 *ऐ जिंदगी तुझे हँसी खुआव क्या दूँ ।*

 *आ ही गये बेपर्दा महफ़िल में वो ,*
 *अब उन्हें हुस्न-ऐ-नक़ाब क्या दूँ ।*

 *साजिशें है आज बड़ी मुकम्मिल ,*
 *अब शराफ़तों को ठहराब क्या दूँ ।*

 *कह गया जो बातें बड़े सलीके से ,*
 *उन बातों का लब्बोलुआब क्या दूँ।*

 *जो पढ़ गया"निश्चल"को एक निग़ाह में ,*
 *उसे मैं अपनी ग़ज़ल किताब क्या दूँ ।*

 ..... *विवेक दुबे"निश्चल"@*....

जवाब क्या दूँ

*इन बेताबियों का क्या जवाब दूँ  ।*
 *इन बेकरारियों का क्या हिसाब दूँ ।*

 *पाल बैठा हूँ दुश्मनी ख्यालों से भी ,*
 *ऐ जिंदगी तुझे हँसी क्या खुआव दूँ ।*

 *आ ही गये बेपर्दा महफ़िल में वो ,*
 *अब उन्हें क्या हुस्न-ऐ-नक़ाब दूँ ।*

 *साजिशें है आज बड़ी मुकम्मिल ,*
 *अब शराफ़तों को क्या ठहराब  दूँ ।*

 *कह गया जो बातें बड़े सलीके से ,*
 *उन बातों का क्या लब्बोलुआब दूँ।*

 *जो पढ़ गया"निश्चल"को एक निग़ाह में ,*
 *उसे मैं अपनी ग़ज़ल क्या किताब दूँ ।*

 ..... *विवेक दुबे"निश्चल"@*....
Blog post 16/6/20

रिश्ते

  रिश्तों के इस जंगल में ,
 अभिलाषाओं के अंधड़ चलते ।

 आश्रयहीन आशाओं से ,
 स्वयं को स्वयं से छलते ।

 भोर तले छूटे स्वप्न अधूरे से ,
 साँझ तले निराशाओं में पलते ।

 कुंठित है मर्यादाएँ रिश्तों की ,
नातों के आधार सभी हिलते ।

 कम्पित है साँसे साँसों में ,
 आकर जाते यौवन के ढलते ।

 जीवन उपवन है काँटो का ,
 फूल कम ही इसमें है खिलते ।

 क्या सार यही है जीवन का ,
 सब कुछ छूट गया मिलके ।

 पाकर भी न पाया जैसे कुछ,
 "निश्चल"खाली हाथ रहे मलते ।

..... विवेक दुबे"निश्चल"@...

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2020

ज़ीवन की संभावनाएं ,

जितना तू बे-ज़िक्र रहेगा ।
 उतना तू बे-फ़िक्र रहेगा ।

चल छोड़ दे फिक्रें कल की ।
न छीन खुशियाँ इस पल की ।

न कर रश्क़ अपने रंज-ओ-मलाल से ।
कर तर खुदी को ख़ुशी के गुलाल से ।

दर्या हूँ वह जाऊँगा समंदर की चाह में ।
मिलेगा बजूद मेरा कही किसी आह में ।
.....
सहारे गर्दिश-ऐ-फ़रियाद में ,
रिश्तों की बुनियाद हुआ करते हैं ।
....

ज़ीवन की संभावनाएं ,
 पल प्रतिपल शेष हैं ।
ज़ीवन के रहते मिटता नही ,
 कुछ भी विशेष है ।

....विवेक दुबे"निश्चल"@..

वक़्त कब कहाँ मेरा रहा ।
इतना ही जहां मेरा रहा ।
..."निश्चल"..

जब इसी राह से गुजरना है ।
तब हालात से क्या डरना है ।
आयेगी मंजिल तभी हाथ में ,
जब हालात हाथ में करना है ।
....विवेक दुबे"निश्चल"@...

माँ

माँ कैसी है तू ,इतना तो पूछा जा सकता है ।
इस दुनियाँ में, इतना वक़्त तो पा सकता है ।
स्वर्थ भरी दुनियाँ में,साथ रहे न जब कोई ,
माँ के आँचल में,जब चाहे तब आ सकता है ।
......विवेक दुबे"निश्चल"@...
माँ
...1
मोल नही कुछ मात का, मातु मनुष का मूल ।
मातु आशीष जो मिले , चुभत न कोई शूल ।
....2
न्यारा माँ का नाम है, माँ जग का उजियार ।
माँ के आँचल छाँव से, शीतल मनस संसार ।
....3
साथ दुआ हो मातु की, कभी न होत हताश ।
सर मातु आशीष धरे ,कदम बिछे आकाश ।
....4
स्मृतियाँ ही शेष हैं,   उसके ये अवशेष ।
उसके बारे में लिखे ,पास नही शब्द शेष ।
..5
 सुध खो दे मेरे लिये, दुख की न रहे घूप ।
 ये विधना भी जग में , माँ का ही है रूप।

     ... विवेक दुबे"निश्चल"@..

लक्ष्य उसी ने बस पाया है ।

765
लक्ष्य उसी ने बस पाया है ।
जो आगे आगे चल पाया है ।
 देखो हर भोर मुहाने पर ,
दिनकर ही पहले आया है ।

 निशि के आँचल में छुपने से पहले ,
 संध्या को भी ललचाया है ।
 जो चँदा आता कुछ चलकर ,
 सूरज का हम साया कहलाया है ।

लक्ष्य उसी ने बस पाया है ।
 आगे आगे जो चल पाया है ।

 पवन चली तरल बन के ,
 खुशबू का झोंका आया है ।
 मदमस्त मकरंद सुगंध भरा,
 वो फ़ूल बाद नजर आया है ।

 अंबर बून्द चली मिलने धरती को ,
 रजः कण ने श्रृंगार उठाया है ।
 है पोषित कण कण जिससे ,
 गर्भ धरा ने तो फिर पाया है ।

 लक्ष्य उसी ने बस पाया है ।
 आगे आगे जो चल पाया है ।

 ना सोच जरा तनिक विश्राम नही ,
 दिनकर तो हर दिन ही आया  है ।
  ठहर नही चलता चल राहों पर ,
  तूने खुद को क्यों बिसराया है ।

लक्ष्य उसी ने बस पाया है ।
जो आगे आगे चल पाया है ।
 देखो हर भोर मुहाने पर ,
दिनकर ही पहले आया है ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@.
डायरी 7
Blog post 10/4/20

सवाल आज ज़िंदगी खास का है

सवाल आज ज़िंदगी खास का है ।
समय बंदगी और अरदास का है ।
पुकार ले हृदय से आज उसको ,
जो भी ईस्वर तेरे विश्वास का है ।
रच डाली वो प्रलय तू ने ही ,
जो अधिकार उसके पास का है ।
माँग कर क्षमा अब भी सुधर जा,
निर्णय स्वयं के अहसास का है ।
हर दम है दयालू वो बड़ा ,
हृदय उसका अंनत आकाश का है ।
कर देगा क्षमा एक पल में तुझे ,
कर शपथ तू प्रकृति के साथ का है ।
न बदलूँगा अब तेरे नियम को,
हर नियम जो प्रभु तेरे हाथ का है ।
कर जोड़कर प्रण प्राण से कर प्रार्थना,
हृदय स्थान प्रभु के "निश्चल"निवास का है।
..... विवेक दुबे"निश्चल"@...

कलम चलती है शब्द जागते हैं।

सम्मान पत्र

  मान मिला सम्मान मिला।  अपनो में स्थान मिला ।  खिली कलम कमल सी,  शब्दों को स्वाभिमान मिला। मेरी यूँ आदतें आदत बनती गई ।  शब्द जागते...