बुधवार, 20 अप्रैल 2016

शब्दों की मार


देखो यह शब्दों की मार ,
शब्दों से होते शब्दों पर वार ।
उलट पलट कर, पलट उलट कर ,
होते नित नये तीर तैयार ।
 व्यंग धनुष पर, भाषा के तरकश से ,
 यह तीर करें , नित नये प्रहार ।
 कभी शब्द बाण चलें ऐसे ,
 मधुवन से पुष्प झड़े जैसे ।
 कभी शब्द बाण बने ऐसे ,
 सावन की बदली बरसे जैसे ।
 कभी काम बाण बन मन हरते ऐसे,
 प्रणय मिलन की बेला आई जैसे ।
कभी शब्द बाण ने किया प्रहार,
 मन कांप गया, सागर में चढ़ा ज्वार ।
 कभी व्यंग धनुष ने संधान किया,
 तीक्ष्ण शब्द को कमान किया ।
छोड़ दिया फिर साध लक्ष्य को,
कर अग्नि वर्षा,मन घायल करने को।
 यह शब्दों की माया नगरी ,
 कभी बिखरी कभी संवरी ।
 शब्दों में ही बसती दुनियां ,
हमरी तुम्हरी, तुम्हरी हमरी ।
     ....विवेक....

गुरुवार, 24 मार्च 2016

यहाँ फ़ागुन की वो बयार नही


यहाँ फ़ागुन की वो बयार नही ।
बरसते रंगो से कोई प्यार नही।
देख हुरियारे करते हंसी ठिठोली,
सखियों की टोली नजर आती नही ।
--------
सजनी साथ नही भौजी पास नही ।
हम बसे बिदेश घर की आस नही ।
किस संग कैसे खेले होली अब,
सूना यहाँ सब रंगो का मधुमास नही।
----
यहाँ तो नया जमाना नया चलन ।
रंगो से होती सबको बड़ी जलन ।
मिला हाथ से हाथ कहा हेल्लो ,
आत्मीयता से गले लगाने का नही चलन ।
----
...... विवेक ......

बुधवार, 23 मार्च 2016

होली


अब की होली,तब की होली ,
  जब की होली,याद नहीं अब ।
 कब खेली थी, हमने तुम संग होली ?
भूल गए अब तुम,ओ हमजोली
इस होली तुम, किस की हो...लीं .
   ....विवेक..
ब्लॉग पोस्ट 23,/3/16
,

डोले मन कुछ बोले मन
श्याम संग झूमें राधा मन
भर पिचकारी मारें श्याम जी
तर होत राधा तन मन
.. विवेक ...
.
उस मौके को गवां न देना
रंग देना चाहे न रंग देना
जो आयें सामने होली पर हम
 बस जरा सा तुम मुस्कुरा देना

अपने ही रंग में मोहे रंग देना
 तू मुझे मुस्कुराते नयन देना
 जज़्ब कर लूंगा मुस्कुराहट को
 बस अपने अधरों पर थिरकन देना
 .
  जा होली जैसे ही हमने
 भौजी गाल गुलाल लगाई
 वो कुछ कुछ शरमाई
 यादो से आँख मिलाई
  हमसे आंख चुराई
.
न रहे ख़लिश कोई
अब की ऐसी होली हो
रंग भले न बरसें पानी संग
मन से मन की होली हो
रंग जाएँ फिर प्रेम रंग संग
प्रेम प्रीत संग होली हो
रंग भले न बरसें पानी संग
स्नेह रंग संग होली हो
 .
गोरे गोरे गाल .....
आज हुए लाल गुलाबी.....
ऐसी छाई खुमारी ......
झूम रही दुनिया सारी.....
आप सभी को ...
शुभ कामनाये ढेर सारी ...
हमारी .........
 

मौन निमंत्रण


मौन निमन्त्रण देती बाला को
रूप सलोनी सी हाला को
पूरी की पूरी मधुशाला को
जाम रंग सा पी जाऊँ
हो कर मदहोश आज मैं
कुछ पल और जी जाऊँ
... विवेक ...
,

ज़र्रा ज़र्रा गुलाब हो
 हर सितारा आफताब हो
 छू ले जो एक नजर तेरी
  ज़िन्दगी तुझ पे निसार हो
,
, ... विवेक ...


प्रेम रंग के रंग सजा दे ।
 सजनी मोहे अंग लगा दे ।
 रंग दे मोहे अपने रंग में ,
 खुद को तू बिसरा दे ।
     .... विवेक ..

,

होली संग तर तन मन



 नयन बिलोकत खिलत कमल  ।
 नयनाभिराम वो सुखद पल ।
 अधर धरें मदमाती थिरकन ,
 याद रहें वो पल हर पल ।
,
 मृग नैना वो चंचल चंचल ।
 पुलकित पुष्पित कोमल तन ।
 फूले टेसू अंग अंग रची सुगन्ध ,
 अहसासों के महकत मकरन्द ।
,
यह पल हर पल पल पल ।
सज गया जो ज़ीवन पल ।
 रंग गया मन तन तन मन ,
 इस होली संग तर तन मन ।
.
   ...... विवेक ....
  ,

होरी खेलन आये तोरे द्वार


================+

गोरी होरी खेलन आये तोरे द्वार ,
 खोल मन नैनों के तू द्वार ।
 -------
अंग भर दे गाल गुलाल रंग से ,
नयनों की चितवन से ,
 रंगों की कर तू बौछार ।
 होरी खेलन आए तोरे द्वार ।
-----,
 रंग दे अपने गाल गुलाबी रंग से ,
 तर कर दे नैनों के काजल से ,
 इस सूने सूने से मन में ,
 कुछ रंग प्रीत के तू डार ।
 होरी खेलन आए तोरे द्वार ।
----
 तू मेरे हाथों में भी कुछ रंग दे ,
 मैं भी मल दूँ तेरे गालन पे ,
 चन्दा से रूप सलोने तन पे ,
 इन हाथो पे कर दे उपकार ।
 होरी खेलन आये तोरे द्वार ।
 ----
चितचोर मोहनी चितवन के ,
 मन से मन के मिलन से ,
 होरी के इस मौसम में ,
 टेसू सा केसरिया कर दूं श्रृंगार ।
 होरी खेलन आये तोरे द्वार ।
---
 उतरे न रंग इस तन मन से ,
 कर दे गौरी तू उपकार ,
 मन सा मन से कर के श्रृंगार ।
 होरी खेलन आये तोरे द्वार ।
  .... विवेक ....


होली बिशेष


---- सुबह होली विशेष ----
=============
उस मौके को गवां न देना ।
रंग देना चाहे न रंग देना ।
जो आयें सामने होली पर हम ,
बस जरा सी तुम मुस्कान देना।
---- ---- -----
अपने ही रंग में मोहे रंग देना ।
तूम मुझे मुस्कुराते नयन देना ।
जज़्ब कर लूंगा मुस्कुराहट को,
बस अपने अधरों पर थिरकन देना ।
.... विवेक .....

शनिवार, 19 मार्च 2016

कुछ भाव मन से मन के


न देखना अब कभी तू मुझे उन निगाहों से ।
छलकती थीं आहें कभी जिन निगाहों से ।
चैन छीन लिया बेचैनियाँ देकर तू ने मुझे ,
होने दे बर्वाद अब मुझे अपनी ही आहों से ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@


यह क़तरा क़तरा अश्क़ समन्दर सा हुआ ।
अश्क़ मेरे ग़म में खुद क़तरा क़तरा हुआ ।।
   ....



----- यह रौनकें यादों की ------
 =======             ======
 भोर संग खुशियों सी छा जातीं है।
 साँझ ढले तन्हाईयाँ ले आतीं हैं ।
 सिमट जातीं हैं "विवेक" ख्वाबों में फिर ,
 ख़्यालों को ख्वाबों में सजातीं हैं ।
   ...


उलझ गया हूँ अपने ही चन्द सवालों मे ।
खोजता हूँ ज़वाब तेरे सवाल से जवाबों मे ।
 मिलते हैं हर बार फिर कुछ नए सवाल ,
मेरे सवाल के तेरे उन हर जवाबों मे ।



लगा कर नैन में काजल
न करो और क़ातिल इन्हें
और जुल्म यह
गाल पर काला तिल भी है
एक अदा ही कम नही
इंतज़ाम कयामत का
मुक़म्मल है
..


भटक रहा घायल मन ,
अपनों का प्रतिकार लिए ।
प्रण प्राण जिन्हें समर्पित ,
उनका ही तृस्कार लिए ।
     ....


यह मंजर बर्वादी के
यह तन्हाईओं के आलम
तू न चल साथ मेरे
करने दे मरहम मुझे
जख़्म मेरे मेरे तरीके से

आज तन्हा मैं हूँ कल तू भी होगा ।
 वक़्त तेरे हाथ से भी फिसला होगा ।
कर सको याद तब शायद तुम भी ,
 सांथ मेरे क्या आज गुजर रहा होगा ।
      .....


ज़माने से अक़्स क्या छुपाऊँ अपने ।
 क्यों न ऐब ज़माने को दिखाऊं अपने ।।
 दिये जिस ज़माने ने यह उजाले मुझे ।
 क्यों छुपाऊँ गुनाह उस ज़माने से अपने ।।
  ...




जमीं बिछा आसमां ओढ़ता मैं ।
 खुद को खुद से जोड़ता मैं ।
 बिता वक़्त अंधेरों में अक़्सर ।
 उजालों के राज खोलता मैं ।
 बयां कर नाकामियों के किस्से ।
 कामयाबियों को पीछे छोड़ता मैं ।
 खुद को खुद से जोड़ता मैं ।
  ...


वक़्त के साथ तुम भी वक़्त बन जाओगे ।
 वक़्त संग यादों में सिमट कर रह जाओगे ।

जो संग चल न सको तो साथ कैसा,
 यादों में भी कब तक याद तुम आओगे ।


सवाल करते उससे डरता है यह मन
हर ज़वाब उसका होता है एक प्रश्न।


इस हाजिर जवाबी से ही हार रहे ।
 उनकी निगाहों में बेइख़्तियार रहे ।।


लौट कर आयेंगे कहकर गए है वो
उम्मीद का दामन थाम लिया है हमने।
 .....


गुंजित कर दो धरती अम्बर ।
भारत माता के जयकारों से ।
नही चलेंगी अब चालें उनकी ।
कह दो माता के गद्दारों से ।
     ...


रोका तो न था तुझे कभी ।
तू ही सफ़र मुक़ाम किया।
     ....


हे पयोधी तू शांत निश्चल अचल ।
सरिता तू चंचल चल छल छल ।
इठलाती बल खाती बहती जाती ।
हो आस्तित्व हीन तुझ में मिल जाती ।
   ...


सरिता तुम बहती,निष्छल मन से।
संग ले अपने,अल्लड योवन को।
मिलने सागर के ,तन से ,मन से।
ज्यो व्याकुल सजनी,पिया मिलन को।
अपने तन मन के,समर्पण से।
 मिल सागर से,होने अर्पण को।
          .....विवेक दुबे "निश्चल"@.....


गुरुवार, 10 मार्च 2016

महिला दिवस


महिला दिवस पर दो शब्द मेरे
"================"
धरा है तू वसुंधरा है तू
अम्बिका जगदम्बिका है तू
तेरे बिन तो शिव को भी
न सत्कार स्वीकार हुआ
तेरी माया से ही
सम्पूर्ण ब्रम्हांड साकार हुआ।
===============
होंसला है तू आसरा है तू
सृजन है तू समर्पण है तू
शक्ति का कण कण है तू
बस और बस नमन है तू
.
.... विवेक ......

सोमवार, 7 मार्च 2016

मैं कहता हूँ


दुनिया करती है अंधेरों की बात,
 मैं कहता हूँ ।
कभी उजालों के जिक्र कर के देखो
.
अंधेरो में घात करते हैं हाथ को हाथ,
 मैं कहता हूँ ।
कभी उजालों में नजर मिला के देखो।
.
फ़िक्र है उन्हें कल की बहुत ,
 मैं कहता हूँ ।
जरा आज सजा कर देखो ।
    .... विवेक ....
.
.

रविवार, 6 मार्च 2016

इन शब्दों के सफ़र में


इन शब्दों के सफ़र में ...
 वो यादों की ख़लिश,
वो मुलाकातों की तपिश हो ।
 वो तन्हा तन्हा रात,
 वो यादों का सवेरा हो।
 लिख दूँ हर जज्बात ,
  हर बात में कशिश हो ।
हों वो खुशियों के पल ,
 वो रंजिशों के रंग हों ।
 शब्दों का यह सफ़र ,
  हर पल एक ग़ज़ल हो ।
 यूँ ज़िन्दगी के आस पास ,
 यूँ ज़िन्दगी के साथ साथ हो।
 इन शब्दों के सफ़र में ....
  ....विवेक....

मंगलवार, 1 मार्च 2016

देश बचाना होता है


न चले जब शास्त्र से काम
 तब शस्त्र उठाने होता हैं
 देश बचाना होता है
 धर्म बचाना होता है
 गीता को अपनाना होता है
 चाणक्य को जागना होता है
 बन राम धनुष उठाना होता है
 वीर शिवा सा बन जाना होता है
 परवाह नही तब प्राण की
 हर शत्रु से टकराना होता है
   .... विवेक .....

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2016

शत्रु का संहार करो



नही तनिक भी मेरी परवाह करो
 शत्रु आ छुपे जब मेरे पीछे तब
तुम पहले मुझ पर ही प्रहार करो
 करो करो बस शत्रु का संहार करो
    .... विवेक ....

कलम चलती है शब्द जागते हैं।

सम्मान पत्र

  मान मिला सम्मान मिला।  अपनो में स्थान मिला ।  खिली कलम कमल सी,  शब्दों को स्वाभिमान मिला। मेरी यूँ आदतें आदत बनती गई ।  शब्द जागते...