सोमवार, 27 जुलाई 2015

माँ


माँ बस नाम ही काफी है
कोई परिभाषा नहीं
माँ तेरे नाम की
तू तो राधा की भी बैसी ही थी
जैसी थी माँ तू श्याम की
.....विवेक...

गुरुवार, 23 जुलाई 2015

नई सुबह


जय पराजय से परे
सदा आगे बढ़ते चलें
अपराजित अनथक
नयी सुबह केआँचल तले
एक आस जगे उत्साह मिले
जीवन को नव आयाम मिलें
....विवेक....

बुधवार, 22 जुलाई 2015

क्यों रोती है माँ


देख क्या होती है माँ ।
बच्चों की खुशियों पर क्यों रोती है माँ ।।
दुनियाँ को ख़ुशी के नजर आये आँसू वो ।।
पर माँ को पल याद आये वो ।
धरा था जिस वक़्त गर्भ में ,
जना था वाजी लगा जान की ।।
नही की परवाह अपने प्राण की ।
सारे पल आज याद आये वो ।।
दुनियाँ को अपने दर्द कैसे बताये वो ।
बस अपनी आँखों से मोती बरसाये वो ।।
यह बात तब और भी गहरी होती है ।
जब वो बेटीओ की माँ होती है ।।
वो ताने याद आते है ,
जो बेटी जनने पर ।
दुनियाँ से बिन माँगे मिल जाते है ,
मिलते ही जाते है ।।
.....विवेक....

मंगलवार, 21 जुलाई 2015

दबा हुआ हूँ अहसासों से


दबा हुआ हूँ अहसासों से ;
कुछ अपनी ही साँसों से ।

हर पल घिसता हूँ पिसता हूँ ...!!
अपनी साँसों से भी डरता हूँ ....!!
न जीता हूँ ; न मरता हूँ .......!!
कुछ ज़िंदा अरमानों के बोझों से ।

जब चलता हूँ फिरता हूँ ....!!
सौ -सौ बार गिरता हूँ , ....!!
फिर उठकर चल पड़ता हूँ ....!!
लड़ता हूँ कर्ज़ों से कुछ फ़र्ज़ों से ।

चलता हूँ ,बस चलता हूँ ....!!
चलता ही रहता हूँ ............!!
अदा नही हुआ जीवन की रस्मों से ।

....विवेक दुबे"निश्चल"@....


रात तो कट जाती है

रात तो कट जाती है।
 मौत ही नही आती है ।

आती भी दरवाज़े पर ,
दस्तक देकर चली जाती है ।

रस्में जिम्मेदारियों की और निभा ,
कह जाती , वक़्त अभी बाँकी है ।

पूरी नही लिखी तूने अपनी कहानी ,
आँख हड़बड़ाकर इतने में खुल जाती है ।

एक सिलसिला कल आज और कल का ,
ज़िन्दगी क्या है बात समझ आ जाती है ।

..
हर पल नव सृजन का बस ये सोचकर ,
 जिंदगी भी एक लुभाबनी कहानी है ।
 
जुट जाता है पूरे जोश-ओ-खरोश से ,
ज़िन्दगी की हर रस्म तो निभानी है । 
.
!!...विवेक दुबे"निश्चल"@....!

रविवार, 21 जून 2015

नेहदूत पिता


मनचाहा बरदान मांग लो ।
अनचाहा अभय दान माँग लो ।।
उसके होंठो की मुस्कान माँग लो ।
जीवन का संग्राम माँग लो ।।
सारा पौरुष श्रृंगार माँग लो ।
साँसों से प्राण माँग लो ।।
बस हँसते हँसते हाँ ।
कभी न निकले ना ।।
कुछ ऐसा होता है पिता ,
क्या हम हो सकेंगे कभी कहि ,
अपने इस ईस्वर के आस पास ,,
तब शायद पिता को समझ सकें कुछ हम भी ,,,
...विवेक.....

बुधवार, 3 जून 2015

बदलते परिदृश्य


उसकी बातो से टूट सी गई माँ निचुड़ सी गई माँ
उसने कहा जब लूँगी अपने फ़ैसले मैं खुद अब
ताकती रही शून्य में माँ सोचती रही बहुत कुछ माँ
शयद यह की अब तक जो फैसलें लिये तेरे लिए
क्या गलत थे वो ..
फिर अगले ही पल आँखें की जोर से बंद
गिरी कुछ आँख से बूंदें पानी की
और अपने कामों में थके क़दमों से लग गई माँ
आज बेटी के इस फ़ैसले से
कितनी बूढ़ी लग रही है माँ
सुनकर इस फैसलें को स्तब्ध है
पिता वो कल तक गर्व करता था जो
मैरी संतान है यह दुनियाँ से कहता था जो ...
.....विवेक.....

मंगलवार, 2 जून 2015

क्या होती है माँ


देख क्या होती है माँ
 बच्चों की खुशियों पर क्यों रोती है माँ
 दूनियाँ को ख़ुशी के नजर आये बो
पर माँ को पल याद आये बो
 धरा था जिस वक़्त गर्भ में
 जना था वाजी लगा जान की
नही की परवाह अपने प्राण की
 सारे पल आज याद आये बो
दूनियाँ अपने दर्द कैसे बताये बो
 बस अपनी आँखों से मोती बरसाये बो
 यह बात तब और भी गहरी होती है
 जब बो बेटिओं की माँ होती है
 बो ताने याद आते है
 जो बेटी जनने पर
 दूनियाँ से बिन माँगे मिल जाते है मिलते ही जाते है
....विवेक...

सोमवार, 18 मई 2015

ज़िन्दगी


जो छूट जाता है
बो सिखाती है
जिन्दगी ....
किताबो के नहीं....
कुछ किस्मत के...
कुछ कर्मो के...
सबक पड़ती है ...
जिन्दगी....
...विवेक...

मन का द्वंद


बिकल्प से संकल्प तक का
छोटा सा सफ़र,,,
इतना आसन नहीं
कदम कदम मन भटकता है
हर फरेव सच सा लगता है
मन का मन से द्वन्द .....
जेसे पंछी पिंजरे में बंद ....
.....विवेक...

कहना पड़ता है


सब बढ़िया है
कहना पड़ता है
अपना हर गम ,,,
खुद ही सहना पड़ता है,,,
कहने को तो बाटने से
बाँट जाते है गम ,,
दिल बहलाने के लिए
यह भी कहना पड़ता है .....
....विवेक....

रविवार, 17 मई 2015

होली की शुभ कामनाये


रंगने की धमकी ना दे, क्या तेरे रंगों से मै डर जाऊँगा |
रंगेगी मुझको तेरे हाथों से, मै भी तो रंग ले कर आऊँगा
कनक कंचनी काया तेरी, चमक रही है ऐसे जो चंदा सी
तेरी इस कंचनी काया को मै, मेरे रंग में रंग जाऊँगा |

होली की शुभकामनाएँ आप को

बेचूँगा


बेचूँगा अब शब्द
तौल तौल कर
अपने जज्बातों से
सीखा अब हमने भी यह ,
सत्ता के गलियारों से ,,,,
देख़ो कैसे लूट रहे ,
मीठी मीठी बातो से ,,
कर रहे भ्रमित ,
चिकने चुपड़े बादो से ,,
छले जा रहे कही ,
मर रहे अन्नदाता हर कही ,,
रंज लेश मात्र नही ,,,
कुछ अब पहुच रहे ,
घड़ियाली आँसू बहाने को ,,,
बेचूँगा अब शब्द तौल तौल कर ...
.....विवेक...

झुका लो पलके


मैं कौन हूँ जमाना तय क्या करेगा ।
 मेरा हुनर ही तो मेरा आईना होगा ।।
    ...

झुका लो पलके अपनी ,
 पैरो तले जमीं देखो।

 खुश रहो अपने हाल पर,
अपनी ही कमी देखो।

एक दिन जमीं भी,
 सितारों से,सजी होगी।

चांद की नजर भी,
जमीं होगी।

उतरेगा सूरज भी,
फलक से जमीं पर ।

 कदम चूमने तेरे।
उसकी भी तबियत होगी ।

.....विवेक दुबे "निश्चल"@...



कलम चलती है शब्द जागते हैं।

सम्मान पत्र

  मान मिला सम्मान मिला।  अपनो में स्थान मिला ।  खिली कलम कमल सी,  शब्दों को स्वाभिमान मिला। मेरी यूँ आदतें आदत बनती गई ।  शब्द जागते...