शुक्रवार, 22 दिसंबर 2017

कुछ ख्याल


   
       आइना तू सवार दे मुझे ।
        मैं कुछ निहार लूँ तुझे ।।
          .....विवेक®...


साजिशों से डरा नही
 आंधियो में झुका नही
 सहा हर तूफ़ान 
  अपना सीना तान 
    ...विवेक...



हौंसलो से हुनर मुक़ाम पता है ।
मुसाफ़िर अकेला थक जाता है ।।
...विवेक...

काश! आइनों के लव न सिले होते
 काश! आईने भी बोल रहे होते
 तब,आईने में झांकने से पहले 
 हम,सौ सौ बार सोच रहे होते 
      ...विवेक....




वक़्त बदलते देखा है


हाँ वक़्त बदलते देखा है ।
सूरज को ढ़लते देखा है ।
 चन्दा को घटते देखा है ।
 तारों को गिरते देखा है ।
 हाँ वक़्त बदलते देखा है ।
 हिमगिरि पिघलते देखा है ।
 सावन को जलते देखा है ।
 सागर को जमते देखा है ।
 नदियां को थमते देखा है ।
 हाँ वक़्त बदलते देखा है ।
 खुशियों को छिनते देखा है ।
 खुदगर्जी का मंजर देखा है ।
 अपनों को बदलते देखा है ।
 हाँ वक़्त बदलते देखा है ।
 नही कोई दस्तूर जहां , 
  ऐसा दिल भी देखा है । 
 नजरों का वो मंजर देखा है ।
 उतरता पीठ में खंजर देखा है ।
 हाँ वक़्त बदलते देखा है ।
    .....विवेक....

न आशा न अभिलाषा




        न कोई आशा
                  न अभिलाषा 
       न कोई निराशा
               न मन भरमाता
      न तू बौराता 
           बस जीवन पथ पर 
      चलता जाता 
                    चलता जाता
     ओ पथिक तू 
                 मंजिल पा जाता 
      मंजिल पा जाता
                     .....विवेक.....


कुछ ख्याल


ज़मीन बिछाता आसमां ओढ़ता मैं
इस तरह खुद को खुद से जोड़ता मैं
हसरतों को हक़ीक़त से तोड़ता मैं
 इस तरह खुद को खुद से जोड़ता मैं 
      ...विवेक...


ज़माने का रिवाज ,
बिगड़ा बिगड़ा है ।
देख सादगी हमारी ।
हर शख़्स हमसे ,
उखड़ा उखड़ा है ।
    ....विवेक....

उसका भी एक मिजाज़ है..
मेरा भी एक मिजाज़ है....
सूरज में भी आग है...
चाँद में भी दाग है... 
......विवेक....


शब्द लुटाता शब्द सजाता मैं ।

        लिखता बस लिखता जाता मैं ।

 खुद से खुद खुश हो जाता मैं ।

          खुद को खुद से झुठलाता मैं ।

 सच में कभी झूंठ सजाता मैं ।

         झूंठ कभी सच से बहलाता मैं ।

          .....विवेक....




चेहरे ही बयां करते हैं ।

चेहरे ही बयां करते है,
               इंसान के हुनर को ।
नजरें ही पढा करतीं हैं ,
               हर एक नज़र को ।
क्यों इल्ज़ाम फिर लगाएँ ,
               इस मासूम से ज़िगर को ।
 दिल झेलता है फिर भी,
                   दर्द के हर कहर को ।
 चेहरे ही बयां करते हैं ,
                   इंसान के हुनर को  ।
शब्दों ही ,ने उलझाया ,
                 शब्दों के असर को ।
 मिलें सब जिस नज़र में ,
                कहाँ ढूंढे उस नज़र को ।
 मासूमियत ने देखो ,
               किया ख़त्म , हर असर को।
चेहरे ही बयां करते हैं ,
              इंसान के हुनर को ।
    ....विवेक दुबे"निश्चल"@...

कुछ शब्द छूटते


कुछ शब्द छूटते 
             कुछ शब्द टूटते 
 फिर भी हम 
                   शब्द कूटते 
 शब्दों में कुछ 
                    रिश्ते ढूंढते 
 भावों से नाते
                        सींचते 
 बस शब्दों से 
                  शब्द खींचते 
 अपनेपन के 
                   बीज़ सींचते 
 अंकुरित हो कोई बीज
                  बन वृक्ष विशाल 
 कर जाये कमाल 
                 हुए हम मालामाल
  वृक्ष पर मीठे
                    फल आयें जब
  पंक्षी डाल डाल 
                    नीड़ बनाये फिर 
 हुए शब्द सार्थक तब
                           ....विवेक...
  

मन उपवन


कहता हैं मन कुछ कहता है 
 बहता है सरिता बन बहता है
 देता है शब्द सुधा देता है
 कर उन्मुक्त भाव से विचरण
 इस मन के निर्जन वन को
 सिंचित करता इस मन को
 शब्द सुधा के इस जल से 
 सिंचित करता मन मन से 
 भावों के इस सिंचन से 
 पुलकित यह मन उपवन 
       नहीं बंधा बंधानों में 
    निकल पहाड़ों से यह
     बस बहता मैदानों में
   बहते जा बस बहते जा 
  शब्द सुधा के कहते जा 
 सिंचित कर कण कण
 खिला खिला हो
  हर मन उपवन
    .....विवेक...

मृग मरीचिका


जीवन की इस
मृग मरीचिका का
आकर्षण।
तेरा मन, मेरा मन,
यह पागलपन ।
कैसी यह
मन की ,मन से उलझन ।
तेरा मन, मेरा मन ,
घटती धड़कन 
बढ़ती धड़कन ।
उठती साँसे ,
गिरती साँसे 
सूनी आँखे ,
नेह नीर भरी आँखे ।
कैसे सुलझे 
यह उलझन ,
तेरा मन, मेरा मन ।
.....विवेक...

पिता


मनचाहा बरदान मांग लो ।
अनचाहा अभय दान माँग लो ।।
उसके होंठो की मुस्कान माँग लो ।
जीवन का संग्राम माँग लो ।।
सारा पौरुष श्रृंगार माँग लो ।
साँसों से प्राण माँग लो ।।
बस हँसते हँसते हाँ ।
कभी न निकले ना ।।
कुछ ऐसा होता है पिता ,
क्या हम हो सकेंगे कभी कहीं ,
अपने इस ईस्वर के आस पास ,,
तब शायद पिता को ,
समझ सकें कुछ हम भी ,,,
...विवेक.....

मन


श्याम संग नाचत मन
 राधिका सा बन ठन
 मानत रूठ जात मन
 मिलत छुपत जात मन
  राधा सा बन जात मन
 कान्हा में खो जात मन
 कान्हा का हो जात मन
      ....विवेक...


बताओ


इसने कहा मेरा खुदा 
उसने कहा मेरा god 
तुमने कहा मेरा ईस्वर 
मैंने पूछा भाई 
यह बताओ 
यह रहते कहाँ है ? 
तीनो ने अंगुलियाँ अपनी अपनी 
आसमान की और उठा दी 
मैंने फिर पूछा 
क्या यह भी हमारी तरह आसमान में 
लड़ते रहते है ? 
अपने अपने वर्चस्व के लिए .... 
सच कहूँ यारो 
तीनो की नजरे जमीन को ताक रही थी ... 
......विवेक.....

शुक्रवार, 15 दिसंबर 2017

माँ



माँ तो बस माँ होती है ।
 हर साँस में दुआ होती है ।
 न कोई छल न कोई कपट ।
 बस संसार में माँ ही निष्कपट ।
 हर लेती हर संकट विकट ।
 लगाकर वो बाजी प्राण की ।
 नहीं कोई चाह मान सम्मान की।
 वो बस मूरत वात्सल्य भाव की।
 चाहत बस ममता दुलार की ।
  नही चाहत उपकार भाव की।
     ....विवेक....

माँ


1--------------
आँख आज भी भर आती है ।
माँ जो तू याद आती है ।
 देख माँ आज भी तुझे ,
 मेरी कितनी फ़िक्र रहती है ।
2    ----------------
 देखी है मैंने भी नाराजी माँ की ।
 हाँ देखा है गुस्सा भी उसका ।
 सब कुछ झूठ कुछ देर के लिए ,
 फ़िक्र हुई औलाद की ,
 और बोल पड़ी माँ ।
 आ चल अब खाना खा ।
3      ------------- 
धरा सी शांत, गगन सी विशाल ।
माँ तेरी ममता की , न हो सकी पड़ताल ।
 जब भी बरसी, शीतल जल बनकर।
 स्नेह से किया सरोबर, नित नये अंकुर फूटे ।
 खिले खुशियों के फूल अपार ।
 देती हो बस देती ही रहती हो ।
 नही कभी इंकार ।
 तूफ़ानों से हिली नहीं ,
   सैलाबों से डिगी नहीं ।
 तेरी आँखों से दुनिया देखी,
 तेरे मन से जाना इसका हाल ।
 सच झूंठ का भेद सिखाया ,
 समझाया क्या अच्छा क्या बेकार ।
 तेरे कदम तले की मिट्टी ,
 मेरे मस्तक का श्रृंगार ।
 यादों में जब जब खोता हूँ ,
 भावों में बहता हूँ ।
 नमन तुझे ही करता हूँ ,
  ऋण नही कह सकता जिसको ,
 यह तो है माँ बस तेरा उपकार ।
 ऐसा मिला मुझे माँ तेरा प्यार ।
------------------
   ---- और अंत में बस इतना ही कह सकता हूँ ----
4---
   माँ बस नाम ही काफी है ।
 कौई परिभाषा नही , 
  माँ तेरे नाम की ।
  तू तो राधा की भी बैसी ही थी ,
 जैसी थी तू श्याम की ।
,
5 ----
माँ पर बार बार लिखा नही जा सकता ।
एक बार लिख जाये जो बो मिटाया नही जा सकता ।
   ........ "निश्चल"  विवेक दुबे ........
          रायसेन (म.प्र.)

माँ


"माँ" .,,,,,,,,,
धरा सी शांत गगन सी बिशाल 
माँ तेरी ममता की न हो सकी पड़ताल 
जब भी बरसी शीतल जल बनकर 
स्नेह से किया सरोबार 
नित नए अंकुर फूटे 
खिलाये खुशियो के फूल अपार 
देती हो बस देती ही रहती हो 
नही कभी इंकार 
तुफानो में हिली नहीं 
सैलाबो से डिगी नहीं 
तेरी आँखों से दुनियां देखी 
तेरे मन से जाना इसका हाल 
सच झूठ का भेद सिखाया 
समझाया क्या अच्छा क्या बेकार 
तेरे कदम तले की मिट्टी 
मेरे मस्तक का श्रृंगार 
यादो में जब जब खोता हूँ 
भाबो में बहता हूँ 
नमन तुझे ही करता हूँ 
ऋण नहीं कह सकता जिसको 
बो तो बस है तेरा उपकार 
माँ ऐसा मिला मुझे तेरा प्यार 
..........."निश्चल"   विवेक दुबे..... 




माँ पर बार बार लिखा नही जा सजता जो एक बार लिख जाये बो मिटाया नही जा सकता


कलम चलती है शब्द जागते हैं।

सम्मान पत्र

  मान मिला सम्मान मिला।  अपनो में स्थान मिला ।  खिली कलम कमल सी,  शब्दों को स्वाभिमान मिला। मेरी यूँ आदतें आदत बनती गई ।  शब्द जागते...