कुछ खास नहीं कवि पिता की संतान हूँ । ..... निर्दलीय प्रकाशन भोपाल द्वारा बर्ष 2012 में "युवा सृजन धर्मिता अलंकरण" से अलंकृत। जन चेतना साहित्यिक सांस्कृतिक समिति पीलीभीत द्वारा 2017 श्रेष्ठ रचनाकार से सम्मानित कव्य रंगोली त्रैमासिक पत्रिका लखीमपुर खीरी द्वारा साहित्य भूषण सम्मान 2017 से सम्मानित "निश्चल" मन से निश्छल लिखते जाओ । ..... . (रचनाये मौलिक स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित .)
शनिवार, 18 मई 2019
रूह-ए-तिश्निगी
रूबरू ज़िंदगी ,घूमती रही ।
रूह की तिश्नगी, ढूँढती रही ।
रहा सफ़र दर्या का, दर्या तक,
मौज साहिल को ,चूमती रही ।
....
कुछ यूँ सूरत-ऐ-हाल से रहे ।
कुछ उम्र के ही ख़्याल से रहे।
ख़ामोश से किनारे दर्या के ,
औऱ नज़्र के मलाल से रहे।
.....
रूह जहाँ मिल जातीं है ।
ज़िस्म खुदा हो जाते है ।
न रहे चाहते हसरत कोई,
अल्फ़ाज़ दुआ हो जाते हैं ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@...
Blog post 18/5/19
शुक्रवार, 3 मई 2019
ग़जल 726 एहसास दिलों से
726
(एक मुसल्सल ग़जल)
रास्ते मंजिल-ए-जिंदगी, जो दूर नही होते ।
ये सफ़र जिंदगी , इतने मजबूर नही होते ।
खोजते नही , रास्ते अपनी मंजिल को ,
जंग-ए-जिंदगी के,ये दस्तूर नही होते ।
साथ मिल जाता गर, कदम खुशियों का ,
ये अश्क़ पहलू-ए-ग़म ,मशहूर नही होते ।
जो बंट जाते रिश्ते भी, जमीं की तरह ,
रिश्ते अदावत के, ये मंजूर नही होते ।
"निश्चल" न करता , यूँ कलम से बगावत ,
ये अहसास दिलों से, जो काफूर नही होते ।
... विवेक दुबे"निश्चल"@..
डायरी 6(137)
(एक मुसल्सल ग़जल)
रास्ते मंजिल-ए-जिंदगी, जो दूर नही होते ।
ये सफ़र जिंदगी , इतने मजबूर नही होते ।
खोजते नही , रास्ते अपनी मंजिल को ,
जंग-ए-जिंदगी के,ये दस्तूर नही होते ।
साथ मिल जाता गर, कदम खुशियों का ,
ये अश्क़ पहलू-ए-ग़म ,मशहूर नही होते ।
जो बंट जाते रिश्ते भी, जमीं की तरह ,
रिश्ते अदावत के, ये मंजूर नही होते ।
"निश्चल" न करता , यूँ कलम से बगावत ,
ये अहसास दिलों से, जो काफूर नही होते ।
... विवेक दुबे"निश्चल"@..
डायरी 6(137)
बुधवार, 1 मई 2019
मूक्तक 728/737
728
गिरा चश्म अश्क़, हेफ बेमतलब ।
सिमटी निग़ाह में, सिसकियाँ कही ।
.... ..हैफ़ / अफसोस
.....
729
कहता रहा कुछ सहता रहा ।
वक़्त के तूफ़ां में बहता रहा ।
ठहरा न अश्क़ एक पल को,
आब चश्म सा जो रहता रहा ।
.... ....
730
घटता है जो वो घट जाने दो ।
ज़ीवन ज़ीवन से कट जाने दो ।
हो जायेगा दृष्ट स्पष्ट सभी ,
घुँध जरा सी तुम हट जाने दो ।
.......
731
कैसे समझूँ"निश्चल" बात जरा सी ।
बहती सागर तक सरिता प्यासी ।
छोड़ चली निशि अपने तम को ,
भोर मिले अरुणिमा की साथी ।
....
732
है सब कुछ खेल नसीबों में ।
उलझे फिर भी तरकीबों में ।
सिमट रहे है अब रिश्ते नाते ,
राजा सब मन की जागीरों में।
......
733
राह जिंदगी में इतने ख़म रहे ।
हवा जिधर उधर न हम रहे ।
खिला कर ख़्याल-ऐ-खुशियाँ,
साथ साथ चलते ही गम रहे ।
.... ...
734
क्या खूब तमाशा , बा-खूब तमाशा है।
पल पल बढ़कर जीवन,घटता जाता है।
ख़बर नही पल को , अगले ही पल की ,
हरी-भरी फिर भी , कल की आशा है।
........
735
बदलते रहे दर-ओ-दीवार भी ।
टूटते रहे कुछ इख़्तियार भी ।
एक चाहत-ए-गुल की ख़ातिर ,
करते ही रहे कुछ इक़रार भी ।
.... ....
736
बदले जा रहे है, दर-ओ-दीवार अब तो ।
टूटते आ रहे है, कुछ इख़्तियार अब तो ।
एक चाहत-ऐ-चमन-ओ-अमन की ख़ातिर ,
करते ही जा रहे है, गुल इक़रार अब तो ।
.... ....
737
वक़्त ही वक़्त को ,हालात से ठेलता है ।
आज ये कौन,आँख मिचौली खेलता है ।
बहा आब क़तरा ,दरिया से समंदर तक ,
ठोकरे यह ज़िस्म, तन्हा तन्हा झेलता है ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@.....
डायरी 3
गिरा चश्म अश्क़, हेफ बेमतलब ।
सिमटी निग़ाह में, सिसकियाँ कही ।
.... ..हैफ़ / अफसोस
.....
729
कहता रहा कुछ सहता रहा ।
वक़्त के तूफ़ां में बहता रहा ।
ठहरा न अश्क़ एक पल को,
आब चश्म सा जो रहता रहा ।
.... ....
730
घटता है जो वो घट जाने दो ।
ज़ीवन ज़ीवन से कट जाने दो ।
हो जायेगा दृष्ट स्पष्ट सभी ,
घुँध जरा सी तुम हट जाने दो ।
.......
731
कैसे समझूँ"निश्चल" बात जरा सी ।
बहती सागर तक सरिता प्यासी ।
छोड़ चली निशि अपने तम को ,
भोर मिले अरुणिमा की साथी ।
....
732
है सब कुछ खेल नसीबों में ।
उलझे फिर भी तरकीबों में ।
सिमट रहे है अब रिश्ते नाते ,
राजा सब मन की जागीरों में।
......
733
राह जिंदगी में इतने ख़म रहे ।
हवा जिधर उधर न हम रहे ।
खिला कर ख़्याल-ऐ-खुशियाँ,
साथ साथ चलते ही गम रहे ।
.... ...
734
क्या खूब तमाशा , बा-खूब तमाशा है।
पल पल बढ़कर जीवन,घटता जाता है।
ख़बर नही पल को , अगले ही पल की ,
हरी-भरी फिर भी , कल की आशा है।
........
735
बदलते रहे दर-ओ-दीवार भी ।
टूटते रहे कुछ इख़्तियार भी ।
एक चाहत-ए-गुल की ख़ातिर ,
करते ही रहे कुछ इक़रार भी ।
.... ....
736
बदले जा रहे है, दर-ओ-दीवार अब तो ।
टूटते आ रहे है, कुछ इख़्तियार अब तो ।
एक चाहत-ऐ-चमन-ओ-अमन की ख़ातिर ,
करते ही जा रहे है, गुल इक़रार अब तो ।
.... ....
737
वक़्त ही वक़्त को ,हालात से ठेलता है ।
आज ये कौन,आँख मिचौली खेलता है ।
बहा आब क़तरा ,दरिया से समंदर तक ,
ठोकरे यह ज़िस्म, तन्हा तन्हा झेलता है ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@.....
डायरी 3
मुक्तक 722 /727
722
वो हादसे हालात के ।
न-मुक़म्मिल ख्यालात के ।
शबनम को तरसी चाँदनी ,
ज़िस्म अधूरे रात के ।
.....
723
ज़ज्बात मचल जाने दो ।
शबनम पिघल जाने दो ।
एक ख़्वाब की ख़ातिर,
रात को सम्हल जाने दो ।
......
724
मचलते है ज़ज्बात, मचल जाने दो ।
पिघलती है शबनम, पिघल जाने दो ।
फिर एक हसीन ख़्वाब की ख़ातिर ,
ढ़लती सी रात को , सम्हल जाने दो ।
......
725
ये जिंदगी हसीन है ।
तजुर्बा ही जहीन है ।
हक़ीक़त-ऐ-आसमां पे ,
ख़्वाब की जमीन है ।
......
726
ये जिंदगी हसीन है ।
तजुर्बा ही जहीन है ।
ख़्वाब के आसमां पे ,
हक़ीक़त-ऐ-जमीन है ।
....
727
मैं दर्द बयां कैसे कर दूँ ।
दिल दर्द ज़ुदा कैसे कर दूँ ।
है ये संग मेरे अपने ही ,
मैं उन्हें बुत कैसे कर दूँ ।
....विवेक दुबे"निश्चल"@..
डायरी 3
वो हादसे हालात के ।
न-मुक़म्मिल ख्यालात के ।
शबनम को तरसी चाँदनी ,
ज़िस्म अधूरे रात के ।
.....
723
ज़ज्बात मचल जाने दो ।
शबनम पिघल जाने दो ।
एक ख़्वाब की ख़ातिर,
रात को सम्हल जाने दो ।
......
724
मचलते है ज़ज्बात, मचल जाने दो ।
पिघलती है शबनम, पिघल जाने दो ।
फिर एक हसीन ख़्वाब की ख़ातिर ,
ढ़लती सी रात को , सम्हल जाने दो ।
......
725
ये जिंदगी हसीन है ।
तजुर्बा ही जहीन है ।
हक़ीक़त-ऐ-आसमां पे ,
ख़्वाब की जमीन है ।
......
726
ये जिंदगी हसीन है ।
तजुर्बा ही जहीन है ।
ख़्वाब के आसमां पे ,
हक़ीक़त-ऐ-जमीन है ।
....
727
मैं दर्द बयां कैसे कर दूँ ।
दिल दर्द ज़ुदा कैसे कर दूँ ।
है ये संग मेरे अपने ही ,
मैं उन्हें बुत कैसे कर दूँ ।
....विवेक दुबे"निश्चल"@..
डायरी 3
मुक्तक 716/721
716
हारूँ इतनी तो मेरी सदा नही ।
ठहरा कुछ पल पर थका नही ।
चलता हूँ पथ पे सतत निरन्तर ,
पर मंजिल से कोई ख़ता नही ।
...
717
रहा बिफल कहाँ ।
मिला सुफल कहाँ ।
कर्म बने आभूषण ,
मैं सतत चला जहाँ ।
......
718
एक सपना भोर सा ,
नही कोई और सा ।
अंनत अंतर् मन में ,
विस्तृत सृष्टि छोर सा ।
.....
719
किसे क्या मिला ।
मुझे क्या मिला ।
वक़्त की छांव में ,
वक़्त से क्या गिला ।
... ..
720
पाषाण हृदय, रजः सम तन ।
रिक्त सम्बेदना,अहंकार मन ।
अहमं तले चलता चिंतन ,
भटके कस्तूरी मृग वन वन ।
......
721
पता नही क्या लिखता सा ।
निग़ाह तले न टिकता सा ।
दूर रही ख़ामोश निगाहें ,
द्रवित अन्तर्मन मिटता सा ।
... विवेक दुबे"निश्चल"@...
डायरी 3
हारूँ इतनी तो मेरी सदा नही ।
ठहरा कुछ पल पर थका नही ।
चलता हूँ पथ पे सतत निरन्तर ,
पर मंजिल से कोई ख़ता नही ।
...
717
रहा बिफल कहाँ ।
मिला सुफल कहाँ ।
कर्म बने आभूषण ,
मैं सतत चला जहाँ ।
......
718
एक सपना भोर सा ,
नही कोई और सा ।
अंनत अंतर् मन में ,
विस्तृत सृष्टि छोर सा ।
.....
719
किसे क्या मिला ।
मुझे क्या मिला ।
वक़्त की छांव में ,
वक़्त से क्या गिला ।
... ..
720
पाषाण हृदय, रजः सम तन ।
रिक्त सम्बेदना,अहंकार मन ।
अहमं तले चलता चिंतन ,
भटके कस्तूरी मृग वन वन ।
......
721
पता नही क्या लिखता सा ।
निग़ाह तले न टिकता सा ।
दूर रही ख़ामोश निगाहें ,
द्रवित अन्तर्मन मिटता सा ।
... विवेक दुबे"निश्चल"@...
डायरी 3
मुक्तक 716/721
716
हारूँ इतनी तो मेरी सदा नही ।
ठहरा कुछ पल पर थका नही ।
चलता हूँ पथ पे सतत निरन्तर ,
पर मंजिल से कोई ख़ता नही ।
...
717
रहा बिफल कहाँ ।
मिला सुफल कहाँ ।
कर्म बने आभूषण ,
मैं सतत चला जहाँ ।
......
718
एक सपना भोर सा ,
नही कोई और सा ।
अंनत अंतर् मन में ,
विस्तृत सृष्टि छोर सा ।
.....
719
किसे क्या मिला ।
मुझे क्या मिला ।
वक़्त की छांव में ,
वक़्त से क्या गिला ।
... ..
720
पाषाण हृदय, रजः सम तन ।
रिक्त सम्बेदना,अहंकार मन ।
अहमं तले चलता चिंतन ,
भटके कस्तूरी मृग वन वन ।
......
721
पता नही क्या लिखता सा ।
निग़ाह तले न टिकता सा ।
दूर रही ख़ामोश निगाहें ,
द्रवित अन्तर्मन मिटता सा ।
... विवेक दुबे"निश्चल"@...
डायरी 3
हारूँ इतनी तो मेरी सदा नही ।
ठहरा कुछ पल पर थका नही ।
चलता हूँ पथ पे सतत निरन्तर ,
पर मंजिल से कोई ख़ता नही ।
...
717
रहा बिफल कहाँ ।
मिला सुफल कहाँ ।
कर्म बने आभूषण ,
मैं सतत चला जहाँ ।
......
718
एक सपना भोर सा ,
नही कोई और सा ।
अंनत अंतर् मन में ,
विस्तृत सृष्टि छोर सा ।
.....
719
किसे क्या मिला ।
मुझे क्या मिला ।
वक़्त की छांव में ,
वक़्त से क्या गिला ।
... ..
720
पाषाण हृदय, रजः सम तन ।
रिक्त सम्बेदना,अहंकार मन ।
अहमं तले चलता चिंतन ,
भटके कस्तूरी मृग वन वन ।
......
721
पता नही क्या लिखता सा ।
निग़ाह तले न टिकता सा ।
दूर रही ख़ामोश निगाहें ,
द्रवित अन्तर्मन मिटता सा ।
... विवेक दुबे"निश्चल"@...
डायरी 3
मुक्तक 711/715
711
एक यही भाग्य का टोटा है ।
शब्दों ने शब्दों को रोका है ।
लिखता मन हर धड़कन को ।
अश्कों को पलकों ने सोखा है ।
.....विवेक दुबे"निश्चल"@....
712
कलम चली दीवानो सी ।
मोहताज रही पहचानों की ।
पीछे पीछे छोड़ चली ,
छाँया अपने निशानों की ।
... विवेक दुबे"निश्चल"@..
713
मुस्कुराने की भी एक बजा चाहिए ।
नज़्र-ओ-निग़ाह की अदा चाहिए ।
कैसे रहे कायम बात पर अपनी ,
हर अंदाज़ की एक फ़िज़ा चाहिए ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@...
714
फिर नए प्रश्न से , होती यारी ।
फिर नए जश्न की, है तैयारी ।
राह गढ़ी मंज़िल ने, जाने कैसी ,
भटक रही यहाँ वहाँ, ख़ुद्दारी ।
.....विवेक दुबे"निश्चल"@...
715
झूँठ चला पनघट की और ।
लेकर वादों की सतरंगी डोर ।
धर मन भावन गाघर सिर पर ,
फिर जा पहुंचा पनघट की छोर ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@...
डायरी 3
एक यही भाग्य का टोटा है ।
शब्दों ने शब्दों को रोका है ।
लिखता मन हर धड़कन को ।
अश्कों को पलकों ने सोखा है ।
.....विवेक दुबे"निश्चल"@....
712
कलम चली दीवानो सी ।
मोहताज रही पहचानों की ।
पीछे पीछे छोड़ चली ,
छाँया अपने निशानों की ।
... विवेक दुबे"निश्चल"@..
713
मुस्कुराने की भी एक बजा चाहिए ।
नज़्र-ओ-निग़ाह की अदा चाहिए ।
कैसे रहे कायम बात पर अपनी ,
हर अंदाज़ की एक फ़िज़ा चाहिए ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@...
714
फिर नए प्रश्न से , होती यारी ।
फिर नए जश्न की, है तैयारी ।
राह गढ़ी मंज़िल ने, जाने कैसी ,
भटक रही यहाँ वहाँ, ख़ुद्दारी ।
.....विवेक दुबे"निश्चल"@...
715
झूँठ चला पनघट की और ।
लेकर वादों की सतरंगी डोर ।
धर मन भावन गाघर सिर पर ,
फिर जा पहुंचा पनघट की छोर ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@...
डायरी 3
शनिवार, 27 अप्रैल 2019
गुरुवार, 18 अप्रैल 2019
जीवन
683
एक रजः कण यूँ तो अपूर्ण रहा ।
पर स्वयं में स्वयं वो परिपूर्ण रहा ।
घूणित द्रव्यमान अंतर् में जिसके ,
अंतर्मन ब्रह्मांड एक सम्पूर्ण रहा ।
करता जो हरदम श्रम क्षमता से ,
स्थिर केंद्र गतिमान वो घूर्ण रहा ।
थकित नही जो नियति नियम से ,
जीवन एक वो ही तो पूर्ण रहा ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@...
डायरी 6(93)
एक रजः कण यूँ तो अपूर्ण रहा ।
पर स्वयं में स्वयं वो परिपूर्ण रहा ।
घूणित द्रव्यमान अंतर् में जिसके ,
अंतर्मन ब्रह्मांड एक सम्पूर्ण रहा ।
करता जो हरदम श्रम क्षमता से ,
स्थिर केंद्र गतिमान वो घूर्ण रहा ।
थकित नही जो नियति नियम से ,
जीवन एक वो ही तो पूर्ण रहा ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@...
डायरी 6(93)
रविवार, 14 अप्रैल 2019
मुक्तक 703/710
703
दर्प घटा । (कम)
मान बढ़ा ।
क्षोभ छटा ।
ध्यान घटा ।(घटना)
.. विवेक दुबे"निश्चल"@..
704
स्वयं को स्वयं मान रहा ।
इतना ही अभिमान रहा ।
गढ़ चला इरादे सदियों के ,
दो पल का जो मेहमान रहा ।
..... विवेक दुबे"निश्चल"@...
705
ज़ीवन भी डरता ज़ीवन से ।
मन ही हरता परिवर्तन से ।
टूटे टांके कुछ आशाओं के ,
उधड़ा ताना अपनी सीवन से ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@...
706
सूरज सा तू चलता चल ।
ताप तले तू जलता चल ।
पा जाये जग उजियारा ,
भोर भरे तू खिलता चल ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@...
707
लिखता रहा मैं , खुद ही नजर में ।
छुपता रहा मैं ,दुनिया की नजर में ।
सिमेटता रहा मैं , ज़ज्बात जमाने के ,
विखेरता रहा दर्द , अपनी नज़र में ।
....विवेक दुबे"निश्चल"@...
708
क्यों खुशियों को आग लगाऊं ।
क्यों कलम तले फिर तप जाऊं ।
कह सुनकर बातें जज़्बातों की ,
क्यों अहसासों में झुलसा जाऊं ।
.......विवेक दुबे"निश्चल"@...
709
तज अहंकार के अहमं को ।
कर अभिभूत हृदय स्वयं को ।
मुक्त हृदय अब चलता मैं ,
उठ स्वार्थ संकुचित घेरे से ।
साथ शेष सृष्टि सम्बंध राग ,
झंकृत हो हृदय बीणा तार ।
शांत चित्त आलोकित मन ,
स्पंदन सत्यं शिवं सुंदरम ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@..
710
डमरू घनाक्षरी
शिल्प- 8,8,8,8,
(बिना मात्रा के 4चरण प्रति चरण 32 वर्ण)
तल तक चल कर ,मचल लहर पर ।
सकल सहज कर ,डट मत तट पर ।
जब चल हटकर , उधर ठहर कर ।
तब जल भरकर ,सजल नयन कर ।
नभ जल भरकर ,बरसत रज पर ।
सहजत हर कण , धरकर तन पर ।
नयन सजल कर ,मन दरसन कर ।
जनम सफल कर, भगवत भजकर ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@...
डायरी 3
दर्प घटा । (कम)
मान बढ़ा ।
क्षोभ छटा ।
ध्यान घटा ।(घटना)
.. विवेक दुबे"निश्चल"@..
704
स्वयं को स्वयं मान रहा ।
इतना ही अभिमान रहा ।
गढ़ चला इरादे सदियों के ,
दो पल का जो मेहमान रहा ।
..... विवेक दुबे"निश्चल"@...
705
ज़ीवन भी डरता ज़ीवन से ।
मन ही हरता परिवर्तन से ।
टूटे टांके कुछ आशाओं के ,
उधड़ा ताना अपनी सीवन से ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@...
706
सूरज सा तू चलता चल ।
ताप तले तू जलता चल ।
पा जाये जग उजियारा ,
भोर भरे तू खिलता चल ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@...
707
लिखता रहा मैं , खुद ही नजर में ।
छुपता रहा मैं ,दुनिया की नजर में ।
सिमेटता रहा मैं , ज़ज्बात जमाने के ,
विखेरता रहा दर्द , अपनी नज़र में ।
....विवेक दुबे"निश्चल"@...
708
क्यों खुशियों को आग लगाऊं ।
क्यों कलम तले फिर तप जाऊं ।
कह सुनकर बातें जज़्बातों की ,
क्यों अहसासों में झुलसा जाऊं ।
.......विवेक दुबे"निश्चल"@...
709
तज अहंकार के अहमं को ।
कर अभिभूत हृदय स्वयं को ।
मुक्त हृदय अब चलता मैं ,
उठ स्वार्थ संकुचित घेरे से ।
साथ शेष सृष्टि सम्बंध राग ,
झंकृत हो हृदय बीणा तार ।
शांत चित्त आलोकित मन ,
स्पंदन सत्यं शिवं सुंदरम ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@..
710
डमरू घनाक्षरी
शिल्प- 8,8,8,8,
(बिना मात्रा के 4चरण प्रति चरण 32 वर्ण)
तल तक चल कर ,मचल लहर पर ।
सकल सहज कर ,डट मत तट पर ।
जब चल हटकर , उधर ठहर कर ।
तब जल भरकर ,सजल नयन कर ।
नभ जल भरकर ,बरसत रज पर ।
सहजत हर कण , धरकर तन पर ।
नयन सजल कर ,मन दरसन कर ।
जनम सफल कर, भगवत भजकर ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@...
डायरी 3
मुक्तक 697/702
697
संघर्षो से जो पाया व्यर्थ न जाये कभी ।
खुद को दुनियाँ में खोया न जाये कभी ।
जीत चलो तिमिर तले हर उजियारे को ,
उजियारों को तम में ढाला न जाये कभी ।
....विवेक दुबे"निश्चल"@...
698
मेरे मुस्कुराने की बजह न रही ।
महफिलों में अब अदा न रही ।
ख़ामोश से रहे वो परिंदे सभी ,
मौसम-ऐ-गुल फ़िज़ा न रही ।
...
699
फिर ख़ामोश से सभी है ।
जाने क्या रही कमी है ।
यूँ तो असमां है नजर में ,
पैर तले दो गज जमीं है ।
....
700
एक मुसलसल, सिलसिला रहा ।
अल्फ़ाज़ लफ्ज़ का, सिला रहा ।
फैरता रहा नजर ,जो शराफत से ,
वो जाने कैसा एक , गिला रहा ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@..
701
वक़्त की जाने कैसी ये शरारत है ।
आज निग़ाहों को नही मलालत है ।
उजड़ते है घर तूफ़ान से परिंदों के ,
अपनो को नही अपनों की चाहत है ।
है रौनकें जिनसे उसके मयकदे की,
वो साक़ी करती रिंदो की ज़लालत है ।
....
702
फिर दस्तक तूफ़ान से पहले, खामोशी की ।
एक अदा इम्तेहान से पहले, बुत पोशी की ।
जबां है फ़िर मयकदा, एक रात के वास्ते ,
है हर निग़ाह साक़ी-ऐ-रिंद , मदहोशी की ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@...
डायरी 3
संघर्षो से जो पाया व्यर्थ न जाये कभी ।
खुद को दुनियाँ में खोया न जाये कभी ।
जीत चलो तिमिर तले हर उजियारे को ,
उजियारों को तम में ढाला न जाये कभी ।
....विवेक दुबे"निश्चल"@...
698
मेरे मुस्कुराने की बजह न रही ।
महफिलों में अब अदा न रही ।
ख़ामोश से रहे वो परिंदे सभी ,
मौसम-ऐ-गुल फ़िज़ा न रही ।
...
699
फिर ख़ामोश से सभी है ।
जाने क्या रही कमी है ।
यूँ तो असमां है नजर में ,
पैर तले दो गज जमीं है ।
....
700
एक मुसलसल, सिलसिला रहा ।
अल्फ़ाज़ लफ्ज़ का, सिला रहा ।
फैरता रहा नजर ,जो शराफत से ,
वो जाने कैसा एक , गिला रहा ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@..
701
वक़्त की जाने कैसी ये शरारत है ।
आज निग़ाहों को नही मलालत है ।
उजड़ते है घर तूफ़ान से परिंदों के ,
अपनो को नही अपनों की चाहत है ।
है रौनकें जिनसे उसके मयकदे की,
वो साक़ी करती रिंदो की ज़लालत है ।
....
702
फिर दस्तक तूफ़ान से पहले, खामोशी की ।
एक अदा इम्तेहान से पहले, बुत पोशी की ।
जबां है फ़िर मयकदा, एक रात के वास्ते ,
है हर निग़ाह साक़ी-ऐ-रिंद , मदहोशी की ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@...
डायरी 3
मुक्तक 690/696
690
कह गया बात वो,
ईमान से ईमान की ।
नही कोई जात,
इंसान की पहचान की ।
बदलता है रंग ,
अक्सर खुदगर्ज़ी के वो ,
है नही फ़िक़्र उसे ,
क्यों उस जहान की ।
-----
691
यूँ बदलता रंगत , इंसान गया ।
जो बदलता , अहसान गया ।
रह गया दौर , ख़ुदगर्ज़ी का ,
क्यूँ जात इंसां से, ईमान गया ।
....
692
इस दौर-ऐ-जफ़ा में,
तुम वफ़ा कहाँ से लाओगे ।
तिज़ारत-ऐ-जहां में,
तुम सफ़ा कहाँ से लाओगे ।
घुला है ज़हर ,
आब-ओ-हवा में,अब इस क़दर ,
इस क़ायम दुनियाँ में,
तुम शफ़ा कहाँ से लाओगे ।
जफ़ा/अन्याय
सफ़ा/साफ/पवित्र
शफ़ा/स्वस्थ
.....
693
न मैं किसी को समझ सका ।
न ही कोई मुझे समझ सका ।
न खरीद सका मैं किसी को ,
न ही मैं कहीं बिक सका ।
-----
694
जिंदगी संजीद रही ।
यूँ अपनी ईद रही ।
बदले हालात अस्र से ,
वक़्त की ताकीद रही ।
......
संजीदा/गम्भीर शांत
ताक़ीद/आग्रह
695
है मेरी गुरु सी वो ।
सुधारती है त्रुटि वो ।
सिखा रीत ज़ीवन की ,
सदा संवारती है वो ।
..
696
हाँ , नही कहना सीख लो ।
स्व को , स्वयं से खींच लो ।
"निश्चल" चलो निज भाव से,
आत्म निवेदित रीत लो ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@...
डायरी 3
कह गया बात वो,
ईमान से ईमान की ।
नही कोई जात,
इंसान की पहचान की ।
बदलता है रंग ,
अक्सर खुदगर्ज़ी के वो ,
है नही फ़िक़्र उसे ,
क्यों उस जहान की ।
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691
यूँ बदलता रंगत , इंसान गया ।
जो बदलता , अहसान गया ।
रह गया दौर , ख़ुदगर्ज़ी का ,
क्यूँ जात इंसां से, ईमान गया ।
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692
इस दौर-ऐ-जफ़ा में,
तुम वफ़ा कहाँ से लाओगे ।
तिज़ारत-ऐ-जहां में,
तुम सफ़ा कहाँ से लाओगे ।
घुला है ज़हर ,
आब-ओ-हवा में,अब इस क़दर ,
इस क़ायम दुनियाँ में,
तुम शफ़ा कहाँ से लाओगे ।
जफ़ा/अन्याय
सफ़ा/साफ/पवित्र
शफ़ा/स्वस्थ
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693
न मैं किसी को समझ सका ।
न ही कोई मुझे समझ सका ।
न खरीद सका मैं किसी को ,
न ही मैं कहीं बिक सका ।
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694
जिंदगी संजीद रही ।
यूँ अपनी ईद रही ।
बदले हालात अस्र से ,
वक़्त की ताकीद रही ।
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संजीदा/गम्भीर शांत
ताक़ीद/आग्रह
695
है मेरी गुरु सी वो ।
सुधारती है त्रुटि वो ।
सिखा रीत ज़ीवन की ,
सदा संवारती है वो ।
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696
हाँ , नही कहना सीख लो ।
स्व को , स्वयं से खींच लो ।
"निश्चल" चलो निज भाव से,
आत्म निवेदित रीत लो ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@...
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कलम चलती है शब्द जागते हैं।
सम्मान पत्र
मान मिला सम्मान मिला। अपनो में स्थान मिला । खिली कलम कमल सी, शब्दों को स्वाभिमान मिला। मेरी यूँ आदतें आदत बनती गई । शब्द जागते...


















