रविवार, 16 दिसंबर 2018

जिंदगी जिंदा निशानों सी ।


जिंदगी जिंदा निशानों सी ।
रही उम्र की पहचानों सी ।

गुजरती रही हर हाल में ,
कायम रहे अरमानों सी ।

खोजती निग़ाह नज्र को ,
कुछ अपने ही गुमानों सी ।

 चली मुख़्तसर सफर पर ,
 यक़ी खोजती इमानों सी ।

मिली फ़िक़्र के वास्ते यूँ ,
ज़िस्म मकां मेहमानों सी ।

जूझती हरदम हालात से ,
 रही जंग के मैदानों सी ।

 अल्फ़ाज़ लिखे मुसलसल ,
"निश्चल" कलम दीवानों सी ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@....

मुख़्तसर/ संक्षिप्त /अल्प

"निश्चल"यहाँ मगर शामिल नही होता


हालात से इंसां आदिल नही होता ।
आप से कभी,फ़ाज़िल नही होता ।

भींगाता है लहर-ए-समंदर से जो ,
वो समंदर मगर साहिल नही होता ।

चलता है आफ़ताब रोशनी को लेकर ,
साँझ के मंजर का क़ातिल नही होता ।

है भटकता सा एक चाँद आसमां में ,
सितारों सा मुक़ा हांसिल नही होता ।

बहता है चीरकर दरिया जमीन को  ,
मंजिल से मगर,ग़ाफ़िल नही होता ।

 आता है वास्ते दुनियाँ की खुशी के ,
"निश्चल"यहाँ मगर शामिल नही होता ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@...

आदिल/न्याय क़रने बल
फ़ाज़िल/खुद विद्वान
ग़ाफ़िल/ असावधान

शनिवार, 15 दिसंबर 2018

कितना सच्चा सरल लिखा उसने ।

668

कितना सच्चा सरल लिखा उसने ।
जीवन को एक गरल लिखा उसने ।

उस ठहरी हुई कलम से ,
शब्द शब्द सचल लिखा उसने ।

शुष्क हुई उन आँखों में ,
भर भाव सजल लिखा उसने ।

लिख भाषा रिश्ते नातो की ,
सम्बंधो का सकल लिखा उसने ।

सार लिखा है ज़ीवन का ,
 नही कहीं नकल लिखा उसने ।

बदल रहे पल में रिश्ते ,
हर रिश्ता अचल लिखा उसने ।

हार गया अपनो के आगे ,
और जीवन सफल लिखा उसने ।

टालकर हर सवाल को ,
हर जवाब अटल लिखा उसने ।

भर मन शान्त भाव को ,
"निश्चल" विकल लिखा उसने ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@......

डायरी 6(79)
Blog post 15/12/18

एक मौन निमंत्रण सा ।

  667


एक मौन निमंत्रण सा ।
 भावों का आमंत्रण सा ।

 लिप्त रहा चित्त में चित्त ,
 अन्तर्मन का अर्पण सा ।

 सुध खोता खुद में खुद ,
 आत्म देह समर्पण सा ।

 छवि देखे तन से मन की ,
 नैनो में नैनन दर्पण सा ।

निखर रहा पाषाण नदी का ,
बहता नीर बीच घर्षण सा ।

सँवर उठा वो सांझ तले ,
रश्मि तारा विकिरण सा ।

शीतलता की आस लिए ,
निहार हार दे तर्पण सा ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@...

डायरी (78)

न जीत से , न हार से ,

666
न जीत से , न हार से ,
मिलता नही कुछ , प्रतिकार से ।

जीतती है , जिंदगी ये ,
मिल अपनो के , ही दुलार से ।

 चुभता शूल , तुझे कही पे ,
 है आंखे वो नम , दर्द की पुकार से ।

खोजते पन , उस मन में ,
देखते है नयन , जिसे निहार से ।

मिलते अपने ही , अपने पाथ से ,
खिलती है जिंदगी , प्रीत के शृंगार से ।

ले चलें मिला, कदम से कदम ,
लक्ष्य तक भर ,जीत की जयकार से ।

 हो साथ पथ पाथ , अपनो का ,
 कुछ बड़ा नही , इस पुरुष्कार से ।

ले चला चल साथ ,अपनो का ,
जीतते तुझसे वो , अपनी ही हार से ।

न जीत से , न हार से ,
मिलता नही कुछ , प्रतिकार से ।


.... विवेक दुबे"निश्चल"@....
डायरी 6(77)

पूर्ण ब्रह्म वो जो स्वयं है ,

 665
हर विचार रहा अधूरा सा ।
 हुआ नही रजः कण सम पूरा सा ।

अद्भुत विधि है बिधना की ,
रंग भिन्न विविध भरता पूरा सा ।

जोड़ नही तू कुछ अपने मन से ,
कोई कार्य रहे न उसका अधूरा सा ।

पूर्ण ब्रह्म वो जो स्वयं है ,
वो ही करता तुझको मुझको पूरा सा ।

... विवेक दुबे"निश्चल"@....
डायरी 6(76)

जो चलकर भी "निश्चल" रहता ,

664
रुक हार कहीं जो थकता है ।
यह काल उसे ही ठगता है ।

सहता है जो   धूप ताप को ,
फ़ल वही   तो   पकता है ।

कहलाता तरल नीर वो भी ,
पोखर में जो जल रुकता है । 

बहता है जो नीर नदी सा ,
सागर में वो ही रूपता है ।   

जो चलकर भी "निश्चल" रहता ,
पाषाण मील सा वो सजता है ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@...

डायरी 6(75)

मुक्तक 672/677

672

दुनियाँ कमतर ही आँकती रही।
चुभते तिनके से आँख सी रही ।

 फैलते रहे दरिया से किनारे पे  ,
 दुनियाँ इतनी ही साथ सी रही ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@...

673

मुझे समझने के लिए, फ़िकर चाहिए ।
निग़ाह नज़्र में ,  आब जिकर चाहिए ।

न समझ हो कुछ , समझने के लिए , 
फक़त दिल , इतना ही असर चाहिए ।

..विवेक दुबे"निश्चल"@.

677

इस वक़्त से नही कुछ भला है ।
नहीं इस वक़्त से कुछ भला है ।

गुजरता रहा हाल हर हालत से ,
मेरे सवाल का ज़वाब ये मिला है ।

... विवेक दुबे"निश्चल"@....

675

कुछ दिन की कतरन है ।
सब रीते से ही बर्तन है ।

रीते से दिन खाली खाली ,
रातों का उतरा यौवन है ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@....

676

दिल की  यूँ झोली भर लो ।
खुशियों की बोली कर लो ।

       डूबकर खुशी के समंदर में ,
      जिंदगी कुछ होली कर लो ।

      ... विवेक दुबे"निश्चल"@.

677

कुछ फैसले किताबो से ।
कुछ फैसले मिज़ाज़ो से ।

बदल कर मिजाज अपना,
झुकते रहे जो सहारों से ।

... विवेक दुबे"निश्चल"@..

Blog.post 15/12/18

मुक्तक 670/671

670
कुछ कब होता है ।
कुछ कब होना है ।

छूट रहे कुछ प्रश्नों में ,
एक प्रश्न यही संजोना है ।

गूढ़ नही कुछ कोई ,
रजः को रजः पे सोना है ।
-----
671
हे अज्ञान ज्ञान के बासी ।
तू खोज रहा मथुरा काशी ।
तुझे श्याम मिलेंगे मन भीतर ,
तेरा मन देखे जिसकी झांकी ।
.
... विवेक दुबे"निश्चल"@..
डायरी 3

गुरुवार, 13 दिसंबर 2018

हर राह ही रही "निश्चल" मेरी ।

हर बह्र से खारिज ग़जल मेरी ।
कुछ कहती निग़ाह मचल मेरी ।

 उठते जो तूफ़ान रूह समंदर में ,
 अल्फ़ाज़ को छूती हलचल मेरी ।

आँख के गिरते क़तरे क़तरे को ,
ज़ज्ब कर जाती कलम चल मेरी ,
    
     खो गया क़तरा सा समंदर में ,
    बस इतनी ही एक दखल मेरी ।

मिल गया वाह जिसे अंजाम में ,
हो गई वो ग़जल मुकम्मल मेरी ।

     मिलता रहा साँझ सा भोर से ,
     हर राह ही रही "निश्चल" मेरी ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@..
डायरी 6(74)

लब ख़ामोश खुलें राजदार मिलेंगे ।

तू ढूंढ़ जरा बहाने हज़ार मिलेंगे ।
हर दिल में नही दिलदार मिलेंगे ।

न सजा ख़्वाब ख़्याल की खातिर ,
हर ख़्याल ख़्वाब के पार मिलेंगे ।

झाँक तो सही किसी निग़ाह में जरा ,
ज़िस्म तुझे रूह से गुनहगार मिलेंगे ।

करना नही सौदे नियत के अपनी ,
आज खुदगर्ज बड़े व्यापार मिलेंगे ।

परेशां है जमीं बरसते आसमां से ,
हमदर्दी के कुछ यूं त्योहार मिलेंगे ।

हर मिलती नजर निग़ाह के पीछे ,
अमन-ओ-ईमान के खार मिलेंगे ।

जीतना न कभी इस दुनियाँ से ,
हार के बाद ही तुझे यार मिलेंगे ।

"निश्चल"छेड़ किसी ज़ज्बात को ,
 लब ख़ामोश खुलें राजदार मिलेंगे ।

..... विवेक दुबे"निश्चल"@....
डायरी 6(73)

"निश्चल" रहा फिर भी नवाब सा ।

मैं हर्फ़ हर्फ़ एक किताब सा ।
मैं लफ्ज़ रहा बे-जवाब सा ।

खो गया अपनी मायूसी में ,
हटता नही जो हिजाब सा ।

अपने अरमानों की चाहत में ,
बदलता रहा वक़्त शबाब सा ।

 कह गया अल्फ़ाज़ खामोशी से ,
 हांसिल हुआ नही रुआब सा ।

 फांके मिले ग़जल और गीत से ,
"निश्चल" रहा फिर भी नवाब सा ।

... विवेक दुबे"निश्चल@...

डायरी 6(72)
Blog post 13/12/18

कहाँ इंसान से ईमान खो गया ।

आज कहाँ इंसान से ईमान खो गया ।
राम कहीं तो कहीं रहमान खो गया ।

करते रहे सजदे जाते रहे शिवाला ,
 नजरों में मगर सम्मान खो गया ।

बदल रही है रौनके पाक रिश्तों की ,
घर घर से आज मेहमान खो गया ।

 मिलते रहे गले लोग मुर्दार की तरह ,
 जिंदगी से जिंदा अरमान खो गया ।

 खुदगर्ज बने खुद खुदी के लिये ,
 हर फ़र्ज़ अपनी पहचान खो गया ।

करते नही खुशी उस खुशी के लिये ,
"निश्चल" कहाँ वो अहसान खो गया ।

..... विवेक दुबे"निश्चल"@....

डायरी 6(71)





अर्चन वंदन वो होगा शब्दों का ।

अर्चन वंदन वो होगा शब्दों का ।
एक मौन निमंत्रण होगा शब्दों का ।

गढ़कर परिभाषा कुछ शब्दों की ,
भावों से आलिंगन होगा शब्दों का ।
...
रिक्त रहा नही कहीं कुछ कोई ,
मन तृप्त हुआ होगा शब्दो का ।

खिलकर गूढ़ अर्थ के भाव तले ,
तन शृंगार मिला होगा शब्दों का ।
....
हर्षित पुलकित सी होगी काया ,
सृजन सफ़ल वो होगा शब्दों का ।

 "निश्चल"रहकर चलता चल सा ,
  निष्छल फल होगा शब्दो का ।

.... विवेक दुबे"निश्चल@...
डायरी 6(70)

कलम चलती है शब्द जागते हैं।

सम्मान पत्र

  मान मिला सम्मान मिला।  अपनो में स्थान मिला ।  खिली कलम कमल सी,  शब्दों को स्वाभिमान मिला। मेरी यूँ आदतें आदत बनती गई ।  शब्द जागते...