शनिवार, 30 दिसंबर 2017

इतिहास लिखें

 इतिहास लिखें न हम कल का।
 इतिहास लिखें हम कल का।
 राह बदल दें हम सरिता की,
  सत्य लिखें हम पल पल का।
  ...
 सत्य की सुगंध हो, होंसले बुलंद हों।
 जीत लें असत्य सभी,इतना सा द्वंद हो ।
 ....
 सीखता है वो अपनी हर भूल से।
 खिलता फूल मिट्टी की धूल से।
  .... 
 बिकती है कलम भी,
 सत्ता के गलियारों में ।
 जय चंद समाये है ,
इन पहरे दारों में ।
 बाँट दिए है दिल से दिल,
 इनके जज़्बाती नारों ने ।
 घात लगा हमले होते, 
 सीमा के पहरे दारों पे। 
 देश नही दुनियाँ दिखती,
 इनको अपने यारों में।
 भूख बेवसी बेकारी सब,
 मिट रही बस नारों से ।
  बिकती है कलम भी,
 सत्ता के गलियारों में।
  .... "निश्चल" विवेक  दुबे..

शाश्वत सत्य

शाश्वत सत्य यही,
विधि विधान यही ।
 मिलता मान सम्मान,
 होता अपमान यहीं।
  इस काव्य विधा के मधुवन में,
 असल नक़ल की पहचान नही।
 ...
 संत चले अब सत्ता पथ पर।
ऊँट बैठे जाने किस करवट।।
  ...
 विषय है शोध का,स्वर खो रहा विरोध  का।
 पुतला था ठोस सा,हो रहा क्यों मोम सा ।
.....
 इतिहास लिखें न हम कल का।
 इतिहास लिखें हम कल का।
 राह बदल दें हम सरिता की,
  सत्य लिखें हम पल पल का।
  ...
 सत्य की सुगंध हो, होंसले बुलंद हों।
 जीत लें असत्य सभी,इतना सा द्वंद हो ।
 ....
 सीखता है वो अपनी हर भूल से।
 खिलता फूल मिट्टी की धूल से।
  .... "निश्चल" विवेक दुबे...

उड़ान

उड़ना चाहो आप जो, 
 पँख दियो फैलाए ।
पँख नही हों उधार के, 
 पँख अपने लगाए । 
 ....
 जीत है कभी हार है ।
 जिंदगी एक श्रृंगार है ।
 बंधी प्रीत की डोर से,
 यह नही प्रतिकार है ।
   ..... 
 ज़िंदगी जब भी तेरा ख्याल आता है ।
 यूँ अहसास बनकर तू पास आता है।
 जीता हूँ यूँ कुछ पल जिंदगी के मैं ,
  जिंदगी कभी तुझे मेरा ख्याल आता है ।
 .... 
शिकायतें
कोई खरीदता ही नहीं 
 सोचा मुफ्त में दे दूँ इन्हें
 मुफ़्त में लेता नहीं कोई 
 सहेजता हूँ अब खुद ही इन्हें।
   .... 
 मिलता नहीं हमें हम सा कोई ,
 यह बेदर्द दुनियाँ ज़ालिम बड़ी है।
...."निश्चल" विवेक दुबे..

समय

हाँ समय बदलते देखा है ।
सूरज को ढ़लते देखा है ।
 चन्दा को घटते देखा है ।
 तारों को गिरते देखा है ।
 हाँ समय बदलते देखा है ।
 हिमगिरि पिघलते देखा है ।
 सावन को जलते देखा है ।
 सागर को जमते देखा है ।
 नदियां को थमते देखा है ।
 हाँ समय बदलते देखा है ।
 खुशियों को छिनते देखा है ।
 खुदगर्जी का मंजर देखा है ।
 अपनों को बदलते देखा है ।
 हाँ समय बदलते देखा है ।
 नही कोई दस्तूर जहां , 
  ऐसा दिल भी देखा है । 
 नजरों का वो मंजर देखा है ।
 उतरता पीठ में खंजर देखा है ।
 हाँ समय बदलते देखा है ।
...."निश्चल" विवेक दुबे..

मुड़ जातीं हैं धाराएँ

मुड़ जाती हैं धाराएं भी ,
 टकराकर पत्थरों से ।
 बदल जाती है ज़िंदगी भी,
 मिलकर अनजाने अपनों से। ।
 .....
 सफ़र ज़रा मुश्किल था ।
 वो पत्थर नही मंज़िल था ।
 निशां न थे कहीं क़दमों के ,
 हौंसला फिर भी हाँसिल था ।
 .... 
वादों के शूलों से ज़ख्म क़ुदरते हैं ।
 वो कुछ यूँ मेरे जख्म उकेरते हैं।
 ....

मानस की सहना नियति , सहती अत्याचार ।
 चुप रहती सहती सतत,करे नहीं प्रतिकार ।।
 ....."निश्चल"विवेक दुबे...

चाँद

एक आस है उस चाँद की तलाश है ।
 एक प्यास है यह चाँद ही अहसास है ।
        ....
 वो इठलाता है आसमां पे ।
 एक चाँद है जो आसमां पे ।
 उतरता नहीं कभी जमीं पे ।
  शर्माता है क्यों सुबह से ।
  ..
आया चंद्र पूर्व के छोर से ।
  देखूँ मैं साजन की ओट से ।
   बाँध अँखियन के पोर से ।
   मन हृदय विश्वास डोर से ।

चौथ चंद्र खिला है ,
 निखरा निखरा है ।
 एक चंद्र गगन में ,
 एक मन आँगन में।
  जीती है जिसको वो,
  पल पल प्रतिपल में।
   श्रृंगारित तन मन से,
   प्रण प्राण प्रियतम के । 
     देखत रूप पिया का,
    चंद्र गगन अँखियन से।
 ...."निश्चल" विवेक दुबे...

जीवन संगनी तू

...... जीवन संगनी  ....

   रागनी तू अनुगामनी तू।
   राग तू अनुरागनी तू ।
               चारणी तू सहचारणी तू।
               शुभ तू शुभगामनी तू।
  नैया तू पतवार तू ।
  सागर तू किनार तू ।
               प्रणय प्रेम फुहार तू ।
               प्रकृति सा आधार तू ।              
 प्रीत का प्रसाद तू ।
 सुखद सा प्रकाश तू ।     
             खुशियों का आकाश तू।
            "विवेक"का विश्वास तू ।
 ...."निश्चल" विवेक दुबे...

व्यवस्था

   *ॐ* हृदय रखिए ,
 *ॐ* करे शुभ काज ।
 *ॐ* श्रीगणेश है,
 *ॐ* शिव सरकार ।
  .....।

 नैतिकता पढ़ी कभी किताबों में ।
  नैतिकता मिलती नही बाज़ारों में ।
  सुनते आए किस्से बड़े सयानों से,
  यह मिलती घर आँगन चौवरो में ।
  ...... 
 बून्द चली मिलने सागर तन से ।
 बरस उठी बदली बन गगन से ।
 क्षितरी बार बार बिन साजन के ।
 बहती चली फिर नदिया बन के ।
 एक दिन *बून्द प्यार की* जा पहुँची ,
 मिलने साजन सागर के तन से ।
....... 
 तन्हा वक़्त छीन रहा बहुत कुछ ।
 हँसी लेकर वक़्त दे रहा सब कुछ ।
  .....
राह चलत कभी ऐसा भी हो जात ।
 *तनु* सो सरल मित्र मिल जात।
 करत सदा सम्मान हृदय मन से ,
 जो गहरी हृदय मन पैठ जमात ।
  .....
 वो लालसा बड़ी न्यारी जागी थी ।
 सौंपी अपने घर की चाबी थी ।
 लालच में आकर हमने जिसको ।
 उसने ही की चोरों की सरदारी थी ।
  ....
जीवन रेखा रेल भी हारी है ।
 यह जाने कैसी लाचारी है ।
 हो रही बे-पटरी बेचारी है ।
 राजशाही व्यवस्था पर भारी है ।
....."निश्चल" विवेक दुबे..

सपने

  सपनो का सत्य कैसा।
 सत्य को डर कैसा ।
 चल निडर डगर पर,
 देखें होता है असर कैसा।
 ....
  देखना न सपने कभी ।
  सपने सच होते नही ।
 चल डगर पर कर्म की,
 कर्म निष्फ़ल होते नही ।

वो भी आस पुरानी है ।
प्यास अब बेमानी है ।
  कुछ अपने सपनो सँग 
 मृग मरीचिका सी जिंदगानी है।
...."निश्चल" विवेक...

 .

कलम

हम नही जानते तारीख़ 
स्याही संग क्या कहती है ।
 जानते इतना वो अपना 
रास्ता ख़ुद तय करती है ।
 स्याही क़लम सँग 
चलती है चल पड़ती है ।
 तारीखें लिख तारीखें 
बदल दिया करती है ।
.....
            दिल जब भर आता है,
           आँखों में सैलाब आता है ।
           कलम उठती है हाथ में
           शब्दों से तूफ़ान आता है ।।
...



                कवि देखता दुनिया को,
                 दुनिया की नजर से ।
                 कवि को देखती दुनिया,
                  सिर्फ अपनी नजर से ।।
                    ...विवेक दुबे...

      .

वो लालसा

वो लालसा बड़ी न्यारी जागी थी ।
 सौंपी अपने घर की चाबी थी ।
 लालच में आकर हमने जिसको ।
 उसने ही की चोरों की सरदारी थी ।
  ....
कर सांठ गांठ अपनो से वो।
 खेले अपनो के सपनो से वो ।
 दिखा मधुर दिवा स्वप्न सलोने ,
 कहते हमसे अपना होने को वो ।
  ....
जो जीतता है वो इतिहास लिखता है।
 सत्य इतिहास यूँ ही बार बार मिटता है।
 तोड़ता है कलम कानून फैसले के बाद,
 जो दिखता है कानून तो वो ही लिखता है ।
   ....
राजनीति के पटल पर,
आज कुछ नया हो गया।
 न बन सका जो पति कभी,
 आज देश का पिता हो गया ।
   ....
सह रहे सहते आये है।
सह लेंगे सहते जाएंगे ।
 हँसकर जख्म मिटायेंगे,
 ज़ख्म नये पाते जाएंगे ।
...
न जाने कैसा वक़्त हो गया।
 हर जुमला जात पे ठहर गया।
  जंग ज़ुबानी तलवार से पैनी,
 चुनाव मैदान-ऐ- जंग हो गया ।
  हो रहीं पार हदें आज सारी ,
  जुमला विकास कहीं खो गया ।
  भूख सत्ता की है बड़ी भारी,
  भूँखा तो भूखा ही सो गया । 
     ......
हो जाए कुछ तक़रार कर लें थोड़ी राजनीत आज ।
 शब्दों को पकड़ें लपक लपक तोड़ें मरोड़ें झपट झपट।
 मौसम छाया चुनाव का मत की उड़ी फुहार ।
  आरोपों की हो बरसात जीतें या हो जाए हार ।
  ...
कानून सोता रहा देश रोता रहा ।
 सुनाया फरमान जैसे कोई अहसान ।
बुझी  मेहनतकश की चूलें की आँच ।
 सफेद पोश पर न आई आँच । 
 आया सारा धन धना धन वापस ,
 मलते रह गए वो अपने हाथ ।
 काला भी हो गया सफेद सभी ।
पाई उच्चता ओर भी  उच्च ने।
 मध्यम की छीनी बिछौने से खाट 
 निम्न धसा धरातल में 
 दो रोटी को करता दो दो हाथ ।
 अच्छे दिन की एक अच्छी वो शुरुवात ।
   .... 
नालायक भी लायक हो गए।
 पनीर पकौड़े पालक हो गए । 
 राजनीत के ऐसे हालत हो गए ।
 धर्म जाति में सब खो गए। 
  .....
   विरोधाभास ही तो शेष है ।
   अब बचा नही कुछ विशेष है।
   अच्छे दिन की आस में ,
   तड़फता सारा आज देश है ।
        ... विवेक दुबे .....

तुम हुँकार भरो

गरजो तुम हुँकार भरो ।
सिंहो सा तुम नाद करो ।
 झुका नही कभी हिमालय ,
 जाओ शँख नाद करो ।
  
 हवन हुए बलि वेदी पर , 
 सदियों से हम ।
पहले तुम भारत का ,
जाओ  इतिहास पढों  ।

 झुकें नही कट जाएँगे, 
माता की तो लाज बचाएंगे ।
 पृथ्वी पोरस प्रताप शिवा , 
हम बन जाएंगे ।

 रूप धरेगी जब नारी चंडी सा,
 तीनों लोक थर्राएँगे ।
  होगा शँख नाद अर्जुन सा ,
 कृष्ण सारथी बन जाएंगे ।

 झुके नही भारत वासी ,
 सबक सभी को सिखलायेंगे ।
 मातृ भूमि के रक्षा यज्ञ में ,
 यज्ञ हवि से स्वाहा हो जाएंगे ।
  ....... विवेक दुबे ......©...

कुछ प्रश्न

प्रश्न उनका हमसे ...
 सपनों का भारत कैसा हो ? 

 एक प्रश्न हमारा उनसे ...

 देख सकें स्वप्न यामनी संग,
    बैसा आज सबेरा तो हो  ।
.....

जो मिट रहा है उसे सम्हालो पहले ।
 अन्न दाता को       बचा लो पहले ।
 अनिष्ट के संकेत     साफ साफ हैं ।
  पहले वो ......       फिर आप हैं ।
.....
आज महंगाई बनी डायन है ।
 खाली थाली सूना आँगन है ।
 बुझे बुझे दिये दीवाली के ,
 सूना सूना अब सावन है ।
  टूट रहे स्वप्न सितारों जैसे,
  चन्दा से भी अनबन है ।
  भोर तले सूरज ऐसा ,
 जैसे करता संध्या बंदन है ।
  निशा अंधियारी ऐसी छाई,
 दिखती नही प्रभात किरण है ।
 मंहगाई के बोझ तले दबे ऐसे ,
  महँगा जीवन मरण सरल है ।
.....
फेंको तुम औद्योगिक कचरा खूब नदी समन्दर में ।
 कहते हो गणपति विसर्जन करना है घर अंदर में ।
 फैलता है प्रदूषण कुछ मूर्तियों के विसर्जन से ,
 क्या अमृत घुला है उद्योगों के कचरा उत्सर्जन में ।
   .... 
किसान कर रहे आत्महत्या , चढ़ा इतना ब्याज है ।
 हैरान है अन्नदाता आसमां से भी अब गिरती गाज है ।
 हर दिन होतीं बेपटरी रेलें तनिक नही अहसास है  
ला रहे बुलेट ट्रेन वो ,इस पर उन पर नाज है । 
  घूम घूम रहे हम दुनियाँ भर में,नही तनिक भी लाज है । 
 40 हज़ार हैं पुनर्वास के इंतज़ार में अब भी ,
 सरदार सरोवर पर होता जश्न-ऐ-आगाज़ आज है ।
  सत्ता के मद में आती नही तनिक भी लाज़ है ।

विवेक दुबे "विवेक".......

अपनी माटी अपना देश

उस माटी में मिल जाओ
 उस पानी में घुल जाओ 
 न भटको दूर कभी न जाओ 
 जिस माटी पानी से पोषण पाओ 
  .... 

शेष नहीं अब आज समर्पण,
होता है कुछ शर्तों पर गठबंधन ।
 रिश्ते नाते सूखे तिनकों से ,
एक चिंगारी से जलता घर आँगन ।
   ...
 आओ मिलकर गीत बनाएँ
 शब्दों से कुछ संगीत सजाएँ 
 हो जाए थोड़ी सी हाँ या न 
 अहसासों को आभास बनाएं 
....
बंट गए हम धर्म और जात में।
 ईस्वर तो एक है हर किताब में।
   .... 

हालातो की हसरत एक यह भी है ।
 कुछ सवालों के जवाब जरूरी भी हैं ।
 यकीं है मुझे तुझ पे यकीं करो मुझ पे भी ,
 जीतता है सच क्यों हालात से डरते हो ।
   ...
  .... विवेक दुबे "विवेक"©रायसेन .......

कलम चलती है शब्द जागते हैं।

सम्मान पत्र

  मान मिला सम्मान मिला।  अपनो में स्थान मिला ।  खिली कलम कमल सी,  शब्दों को स्वाभिमान मिला। मेरी यूँ आदतें आदत बनती गई ।  शब्द जागते...