मंगलवार, 3 अप्रैल 2018

आता नही मुड़कर

ठहर गई वो क़लम ,
                    खूब कह कर ।
 ख़ामोश हुआ शीशा ,
                   ज्यों टूटकर कर ।
 लफ्ज़ आते नही पास,
                   जुस्तजू बन कर ।
 कहता है वक़्त गुजरा ,
                 याद मुझे क्यूँ कर ।
 चल आज के साथ ,
                 क्या करेगा मुझे जी कर । 
 गुजरना मेरी फ़ितरत है,
                आता नही मैं मुड़कर ।

      ..विवेक दुबे"निश्चल"@....

स्त्री

आई स्त्री हर युग मे,
 राह बताने को ।
 अपने को ,
 दांव लगाने को ।
 देश बचाने को ,
 समाज बचाने को ।
 हार गए जहाँ ,
 पुरूष सभी ।
 तैयार मिली तब,
 अबला सबला,
 बन जाने को ।
 आई स्त्री हर युग में,
राह बताने को ।
... विवेक दुबे "निश्चल"@....

तू ही निर्मल


तू ही निर्मल ,
                    तू ही पवन ,
  तू ही गंगाजल ,
                 ऐसा माता तेरा आँचल।

तेरा रक्त शिराओं से ,
                     अमृत वक्ष धार बहे।
    माता तेरे आँचल मे ही
                     नित्य कलाओं से चँद्र बड़े ।

 तेरे वक्षों से जो सुधा बहे,
            दुनियाँ उसको सौगन्ध कहे ।
 तेरे पावन स्नेह स्पर्श से,
                  त्रिदेव भी अभिभूत भए ।

 मेरी अँखियाँ तेरी अँखियाँ,
                 मेरी निंदिया तेरी निंदिया ।
  सुध-बुध खोती मेरी खातिर,
                        मेरे कष्टों से न दूर रहे ।

  जगत विधाता भी बस ,
                      माँ को ही सम्पूर्ण कहें ।
     ...... विवेक दुबे"निश्चल"@...........

दर्द माँ सहती है

जब भी दुनियाँ,
 मुझे सताती है ।
 माँ तू तब आज भी ,
 पास मेरे चली आती है ।

 आता है नजर पीठ पर ,
   हाथ तेरा मुझे  ,
   आज भी तू  ,
 यूँ होंसला बढ़ाती है ।

 डरता नही ज़माने से,
  तेरी आहट  ,
 कदम से कदम मिलाती है ।

 जीतता हूँ , हर जंग दुनियाँ से ,
 तेरे नाम की ,
 ताक़त मुझे जिताती है ।

 माँ आज भी,...
 ... विवेक दुबे "निश्चल"@...


जब भी दुनियाँ मुझे सताती है

जब भी दुनियाँ,
 मुझे सताती है ।
 माँ तू तब आज भी ,
 पास मेरे चली आती है ।

 आता है नजर पीठ पर ,
   हाथ तेरा मुझे  ,
   आज भी तू  ,
 यूँ होंसला बढ़ाती है ।

 डरता नही ज़माने से,
  तेरी आहट  ,
 कदम से कदम मिलाती है ।

 जीतता हूँ , हर जंग दुनियाँ से ,
 तेरे नाम की ,
 ताक़त मुझे जिताती है ।

 माँ आज भी,...
 ... विवेक दुबे "निश्चल"@...

दमकता पौरुष

काल के कपाल पे , मृत्यु के भाल पे ।
 जन्म के श्रृंगार से , जीव के दुलार से ।
 जीतता आप से , जीवन की ढाल से ।
 हारता न हार से , जीत के प्रतिकार से । 
 सृष्टि के स्वीकार से , अनन्त काल से ।
 जीवन चलता नित , नए रूप श्रृंगार से ।
 घटता बढ़ता प्रति दिन ,चँद्र सी चाल से ।
 दमकता पौरुष ,भानू सा जीवन भाल पे ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@...

रविवार, 1 अप्रैल 2018

कुछ पन्ने जीवन के

कुछ पन्ने जीवन के यहाँ हैं ।
 कुछ पन्ने ज़ीवन के वहाँ हैं ।
 लिख गया वो हर पल को,
 जीवन जाने कहाँ कहाँ है ।
          अब वो जर जर ज़रा है ।
          पतझड़ से पत्ता झड़ा है ।
         यूँ धरा पर आन पड़ा है ।
         रौंदता जिसे सारा जहां है ।
 वो भी कभी एक मिसाल था ।
 वो वट वृक्ष घना विशाल था ।
 रूठती उसकी अब धरा है ।
 सूखता सा वो धरा खड़ा है ।
         जकड़े थीं जो जड़ें जिसे,
         छोड़ती हैं वो अब उसे ।
        घेरती ज़रा जरा जरा है ।
        वो धरा पर अब धरा है ।
  साथ कल था अभिमान के,
 आज अभिमान भी तजा है ।
  बेचैन है मिलने को राख में ,
  धरा पर पड़ी शुष्क ज़रा है ।
        ...विवेक दुबे"निश्चल"© ...

भोला बचपन

बन्द हुए आज किताबों में ।
आते भी नही अब ख़्वाबों में ।
भोले बचपन के वो छूटे नाते । 
 मिलते हैं अब बस यादों में ।

  भोर भए चिड़ियों सँग ,
  जेठ मास के उजियारों में,
  माघ मास के जाड़ो में ,
   बंद हुए लिहाफों में ।

 भोले बचपन की एक कहानी थी ।

 दीवानी सी परियों की रानी सी ।
 शादी रचती राजा और रानी सी ।
 भोले पन मन की वो अभिलाषा ।
 ज्ञात नही  शादी की  परिभाषा ।

 कितने वो भोले भाले पल ,
 रूठे खुश होते अगले पल ।
 गुड़िया की शादी होती थी ।
 गुड्डे से  ब्याही  होती थी  ।

आती वो खुद सज धज कर ,
जो गुड़िया अपनी लाई होती थी ।
मैं भी खूब अकड़ रहा होता ,
 क्योकि गुड्डा तो मेरा होता ।

 धूम धाम से फिर शादी होती।
 दुल्हन जैसी वो शरमाई होती ।
 मैं भी खूब अकड़ रहा होता ।
 गुड्डा जो हाथ पकड़ रहा होता ।

जाना अब खुद ब्याहे हम तब ,
 यह शादी आखिर क्या होती ।
 उस भोलेपन की डौली उठती ,
 नव जीवन की तैयारी होती ।

 छोड़ भोले पन के पीहर को ,
 गुड़िया गुड्डे सँग इस जीवन के,
 कपट महल में आ बस जाती ।
 अब न बो मुस्कुराते न इतराते ,
 "निश्चल"भाव से साथ निभाते ।

 उस भोले बचपन के ,
 छूटे नाते भोले पन से ।
 मिलते न वो नाते अब,
 दूल्हा रूठा दुल्हन से ।

 देखूँ दर्पण अब भी बनठन के ।
 जुड़ा हुआ हूँ यूँ बचपन से ।
  यह झुर्रियाँ नही उम्र की,
 यह अनबन भोले बचपन से ।

....विवेक दुबे"निश्चल"@.....




बृद्ध की व्यथा


 व्यथा उस अंतिम पड़ाव की ।
 चाह जिन्हें अपनो के चाह की। 
 कर हवन सारा यौवन तन,
 स्वप्न सलोनी हर बात की । 

  अभिलाषा बस संतानों की ,
  सुगम प्रगति की राहों की ।
  लगा दांव पर सब कुछ ,
  जीवन की नही परवाह की ।

 बीत गया तन आया चौथा पन,
 एक दृष्टि बची बस आस की ।
 बिसार दिया उस को अब, 
 भूले सब माया उस त्याग की ।

  शायद वो नियति थी इनके कल की ,
  एक यह नियति है इनके आज की ।
   चिंता है बस अब तो उनको ,
    उनके कल आते श्राद्ध की ।

  .....विवेक दुबे"निश्चल"@...

छोड़ चला था धीरे धीरे

उसको छोड़ चला था धीरे से वो    ।
 जिसके साथ न कोई बहाना था ।
 
 करे प्रायश्चित अनचाही भूलों का ,
 अब शूल उसे बस चढ़ जाना था ।

 रीता था वो अन्तर्मन से धीरे धीरे ,
  बाहर मन उसको  बिसराना था ।

 लगता पल भर में मिथ्या सब ,
 खोज सत्य उसे अब लाना था । 

 यक्ष प्रश्न बना खड़ा था जीवन ,
 हल स्वयं से जिसका पाना था ।

उसको छोड़ चला था धीरे से वो  ,
 जिसके साथ न कोई बहाना था ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@....
Blog post 1/4/18

अब तो आँख भी

 अब तो आँख आँख नीर बहाती है ।
 ग़म के बादल से छाई अँधियारी है ।

टूट रहीं है सीमा पर डोरे जीवन की ,
 दुश्मन की गोली चुपके से आ जाती है ।

 राख हुए सपने यौवन मन के ,
 डिग्री को दीमक खा जाती है ।

 अहं भाव के मकड़ जाल में ,
मंदिर मस्ज़िद उलझीं बेचारी हैं ।

 लिपट रहे अँधियारे उजियारों से ,
 अपनो की अपनो से सौदेदारी है ।

  गहन निशा हर दिन कुंठाओं की  ,
  दिनकर को भी ढँक जाती है ।

 राह नही सूझे कोई अब तो  ,
 राहें राहों में उलझी जाती हैं ।

 तारा भी न चमके भुंसारे का ,
 निशा गहन की ऐसी सरदारी है ।


 अब तो आँख आँख  ...

 ..... विवेक दुबे"निश्चल"@...

वक़्त चलता इंसान का

वक़्त चलता है इंसान का ।
 आता है कभी भगवान सा ।
 मंजिल चली आती चलकर,
 लगता जीवन आसान सा ।


 आता है कभी शैतान सा ।
 हर सहारा भी बे-काम सा ।
  छूटता सहारा बीच राह में ,
   गुम होता हर मुक़ाम सा ।

वक़्त चलता है इंसान का ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@...

जीवन का संग्राम

 भाव लिए अखण्ड डूबा कंठ कंठ ।
  गीत लिखे प्रीत के बिखरे खंड खंड। 

 नीर बहा श्याम सा नैनन अभिराम सा, 
 गीत की हर प्रीत के पूर्ण विराम सा ।

  जागा भाव कलम के विश्राम का ।
 अंत यही जीवन के हर संग्राम का ।

 जीवन के हर संग्राम का .....!!
  ... विवेक दुबे"निश्चल"@ ....

जीवन की गलियां

भटका चलते चलते ज़ीवन की गलियों में।
खोज रहा खुद को मैं मन की गलियों में।
 जटिल बड़ी भूल भुलैया इस ज़ीवन की ,
 कैसे गुजरुँ जीवन की उलझी गलियों में।

 प्रश्न यही एक आता हर चौराहे पर,
 कब तक गुजरुँ फिर इन गलियों में ।
 आता जाता फिर मुड़ मुड़ जाता ,
 आंत हीन जीवन की गलियों में।
     भटका चलते चलते...

..."विवेक दुबे"निश्चल"@..

कलम चलती है शब्द जागते हैं।

सम्मान पत्र

  मान मिला सम्मान मिला।  अपनो में स्थान मिला ।  खिली कलम कमल सी,  शब्दों को स्वाभिमान मिला। मेरी यूँ आदतें आदत बनती गई ।  शब्द जागते...