रविवार, 24 जून 2018

बदलते रहें

वक़्त अहसास के बदलते रहे ।
ज़िस्म सँग साँस के चलते रहे ।

थमतीं रहीं निगाहें बार बार ,
अश्क़ कोरों से अपनी ढलते रहे ।

किनारे भी रूठे रहे अक़्सर ,
दरिया भी जिनके सँग चलते रहे ।

न थे क़तरे वो शबनम के ,
अश्क़ क़तरे जमीं पलते रहे ।

लो खो रही सुबह फिर ,
सँग साँझ के चलते रहे ।

सँग सा था वो तो "निश्चल" ,
अश्क़ जज़्बात पिघलते रहे ।


....विवेक दुबे"निश्चल"@...

शनिवार, 23 जून 2018

बदलते रहे

वक़्त बदलते रहे अहसास के ।
ज़िस्म चलते रहे संग सांस के ।

थमती रहीं निगाहें  बार बार ,
 कोरों में अपनी अश्क़ लाद के ।

 रूठे रहे किनारे भी अक्सर,
 दरिया भी जिनके साथ के ।

 वो क़तरा न था शबनम का ,
 वो थे अश्क़ किसी आँख के ।

 लो खो रही सुबह फिर ,
 साथ अपनी साँझ के ।

 "निश्चल" संग सा था वो तो ,
 बरसे अश्क़ क्युं जज़्बात के ।

 .... विवेक दुबे"निश्चल"@...

हार नही मानूँगा

जीवन संग्रामों से हार नही मानूँगा ।
दुर्गम राहों पर विश्राम नही मागूँगा ।

चलता हूँ अथक निरन्तर पथ पर ,
 ज़ीवन पथ से मुक़ाम नही मागूँगा ।

 हार रहीं है प्रति पल अभिलाषाएं ,
 आशाओं से प्रमाण नही मागूँगा ।

   मैं ज़ीवन को जीने की खातिर ,
 ज़ीवन को अभिमान नही मानूँगा ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@.

निगाहें हमे झुकानी है


निगाहें हमे अब झुकानी है ।
हया इस जहां की निशानी है ।

 करते थे जो बातें हालात की ।
 निग़ाहें अब उनकी पुरानी है  ।

  हसरत न रही अब कुछ भी ,
 शराफत-ऐ-सियासत निशानी है ।

 जहाँ कत्ल हुआ ईमान भी ,
 यहाँ मौत भी अब सयानी है ।

  उसे याद ही नही कुछ भी ,
  उसे याद फिर दिलानी है ।

  डूबता दरिया अपने ही आप से ,
 समंदर ही जिसकी निशानी है । 

  .... विवेक दुबे"निश्चल"@...

एक आशा

 एक आशा जीवन की ।
 अभिलाषा इस मन की ।
 तलाश रही डगर डगर ,
 राह कठिन जीवन की ।
...  
  वो प्यास प्यास ही रही ।
  एक अधूरी आस ही रही ।
  साहिल न था दरिया का ,
 लहरों को तलाश ही रही ।
....
डूबता रहा साँझ के मंजर सा ।
सफ़र जिंदगी रहा समंदर सा । 
.... विवेक दुबे@"निश्चल"..

चाहत


एक इतनी सी दिल की चाहत है ।
निगाहों को निगाहों की आहट है ।

 होंसले टूटते नही समंदर के ,
साहिल को भिंगोने की आदत है ।

तर होती जमीं शबनम से ,
चाँद की कैसी शरारत है ।

हो मंजिल निग़ाह में सामने ,
 रास्ते नही फिर रुकावट है ।

करता सज़दा फ़र्ज़ जान कर ,
मंजूरियत ख़ुदा की चाहत है ।

है नियत बस इतनी सी ,
के नही कोई बदनीयत है ।

नही कोई और दौलत मेरी ,
मेरी बस एक यही दौलत है ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@

एकाकी चलता

वो आता उषा के संग ,
 किरण आसरा पाता ।
 संध्या के संग हर दिन ,
 दिनकर क्यों छुप जाता ।

 तजकर पहर पहर सबको ,
 वो एकाकी चलता जाता ।
 हर प्रभात का दिनकर ,
 संध्या दामन ढल जाता ।
 .... विवेक दुबे"निश्चल"@...

बुधवार, 20 जून 2018

मुक्तक आदमी 436



स्वयं को सँवारता आदमी ।
अन्य को बिसारता आदमी ।
 थोथले दम्भ के बल पर ,
 स्वयं को उभारता आदमी ।

 आदमी को यूँ मारता आदमी ।
 आदमी से यूँ कट रहा आदमी ।
 आज आदमियत की राह से ,
 आदमी से यूँ भटक रहा आदमी ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@..

सोमवार, 18 जून 2018

मुक्तक 435/437

434
 उलझने उलझती गई ।
 हसरते सुलझती गई ।
 जिंदगी रह गई ख़्वाब सी ,
 और ज़िंदगी गुजरती गई ।
.... 
435

:क्या लिखूँ क्या छोड़ दूँ मैं ।
जिंदगी को कहाँ मोड़ दूँ मैं ।
 गुजर जाता है हर मुक़ाम ,
 जज़्बों को जो  होड़ दूँ मैं।
.... 


437
आज फिर मैं कोई ग़जल कह दूँ ।
आज फिर दिल-ऐ-दखल कह दूँ ।
 निग़ाह अश्क़ गिरते क़तरे को ,
 आज फिर पूरा समंदर कह दूँ ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@...

झड़ता रहा पत्तों सा

झड़ता रहा पत्तो सा ।
चलता रहा रस्तों सा ।

 मिला नही कोई ठिकाना ,
  अंजाम रहा किस्तों सा ।

 वो टपका बून्द की मांनिद ,
 अंजाम हुआ अश्कों सा ।

  सहकर तंज दुनियाँ के ,
  रह गया   दरख्तों सा  ।

  जीतकर जंग दुनियाँ की ,
  उलझता गया  रिश्तों सा ।

 आजमाइशों की जकड़ से,
 कसता रहा मुश्कों सा ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@...

रविवार, 17 जून 2018

पिता

देता रहा जो छाँव उम्र  सारी ।
सहता रहा जो धूप खुद सारी ।

वो अपनी साँझ के झुरमुट में सुस्ता रहा है ।
फिर भी वो देखो कितना मुस्कुरा रहा है ।

बांटकर जीवन जीवन थमता जा रहा है ।
नियति के आँचल में प्यासा ही जा रहा है ।

पीकर दर्द के आँसू पिता मुस्कुरा रहा है ।
आज फिर समय समय को दोहरा रहा है ।
... विवेक दुबे"निश्चल"@...
Blog post 17/6/18

शनिवार, 16 जून 2018

पिता

रोता है अक्सर, खामोशी से कोई ।
 पीता है हर दर्द, हँस कर कोई ।
 छुपाता है आँसू, निगाहें चुराकर ,
 कलेजा पिता सा, पाता नही कोई ।
.... 
चाहतें रातों से ,उसकी भी कोई ।
हसरतें उजालों से, उसकी भी कोई ।
 जो रह गया, खामोश ही हर दम  ,
 दुनियाँ में ,पिता सा है नही कोई ।
.....
 खोकर बहुत कुछ ,खोता नही  ,
 खाकर ठोकरें, तेरी ख़ातिर कोई ।
 घुटता है जो, दुनियाँ की भीड़ में ,
 पिता सा नही, धीर गम्भीर कोई ।
  ....
 "निश्चल" रहे हर दम, जो कोई ,
  चलता रहे हर पल ,जो कोई ।
  तोड़कर सितारे, फ़लक से ,
  दामन में , भरता जो कोई।
..
    वो दुनियाँ में पिता है , 
   बस एक वो ही वो ही ।

    .... विवेक दुबे"निश्चल"@..




खुशियाँ उसकी ,
हद नही बे-हद है ।

औलाद की खुशी पर ,
 वो कितना गदगद है ।

 औलाद से अपनी ,
 उसे इतना ही मतलब है ।

 सोचता है वो बस यही ,
 मेरे गुजरे कल से ,
आज इसका बेहतर है ।

खुशियाँ उसकी ,
हद नही बे-हद है ।

औलाद की खुशी पर ,
 वो कितना गदगद है ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@..
पिता 
Bolg post 17/6/18
डायरी 4


गुरुवार, 14 जून 2018

रात सिरहाने



चल रात सिरहाने रखते है ।
उजियारों को हम तजते है ।

 दूर *गगन* में झिलमिल तारे ,
 चँदा से स्वप्न सुहाने बुनते है ।

सोई नही अभिलाषा अब भी ,
 नव आशाओं को गढ़ते है ।

 चल रात सिरहाने ...

 थकता है दिनकर भी तो ,
साँझ तले क्षितिज मिलते है ।

 नव प्रभात की आशा से ,
 तारे चँदा के संग चलते है ।

 टूट रहे अंधियारे धीरे धीरे ,
 उजियारे तम में ही मिलते है ।

 चल रात सिरहाने ...

 जीवन की हर आशा को ,
 दिनकर सा हम गढ़ते है ।

 नव प्रभातिल भोर तले ,
 दिनकर सा हम चलते है ।

 चल रात सिरहाने ...

.... विवेक दुबे"निश्चल"@...


बुधवार, 13 जून 2018

अनुगामनी जीवन संगनी

रागनी तू अनुगामनी तू।
   राग तू अनुरागनी तू ।
          चारणी तू सहचारणी तू।
          शुभ तू शुभगामनी तू।
  नैया तू पतवार तू ।
  सागर तू किनार तू ।
             प्रणय प्रेम फुहार तू ।
            प्रकृति सा आधार तू ।              
 प्रीत का प्रसाद तू ।
 सुखद सा प्रकाश तू ।     
           खुशियों का आकाश तू।
          "विवेक" का विश्वास तू ।
   सँग तू साथ तू ,साँस साँस तू ।
   हृदय भरा "निश्चल" उल्लास तू ।
          सजीव जीवन संगनी तू ।
          सुखी जीवन आधार तू।
       .. विवेक दुबे "निश्चल"©,...


कलम चलती है शब्द जागते हैं।

सम्मान पत्र

  मान मिला सम्मान मिला।  अपनो में स्थान मिला ।  खिली कलम कमल सी,  शब्दों को स्वाभिमान मिला। मेरी यूँ आदतें आदत बनती गई ।  शब्द जागते...