बुधवार, 18 जुलाई 2018

जिंदगी सवालों सी

जिंदगी सवालों सी ।
 उलझी जवाबों सी ।
        डूबकर किनारों पे ,
         छूटते सहारों सी ।

  अपने ही गुलशन में ,
  रूठती बहारों सी ।
        जिंदगी सवालों सी ।
       उलझी जवाबों सी ।

 रात की हसरत में ,
 दिन के दुलारों सी ।
        जिंदगी सवालों सी ।
        उलझी जवाबों सी ।

 रूठता है कब कोई ,
 नही कोई हिसाबों सी ।
      जिंदगी सवालों सी ।
      उलझी जवाबों सी ।

  चलता है ख़ातिर अपने ,
   राह है गुवारों सी ।
         जिंदगी सवालों सी ,
          उलझी जवाबों सी ।

"निश्चल" सितारा वो ,
 निग़ाह में हजारों सी ।
       जिंदगी सवालों सी ,
        उलझी जवाबों सी ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@....



एक विस्तृत नभ सम

एक विस्तृत नभ सम ।
 भू धरा धरित रजः सम ।
         आश्रयहीन अभिलाषाएं ।
        नभ विचरित पँख फैलाएं ।
निःश्वास प्राण सांसों में ।
लम्पित लता बांसों में ।
         बस आशाएँ अभिलाषाएं ।
         ओर छोर न पा पाएं ।
   मन निर्बाध विचारों में ।
  जीवन के सहज किनारों में ।
   
          एक विस्तृत नभ सम ।
          भू धरा धरित रजः सम ।

   जब शशि गगन में आए ।
    निशि तरुणी रूप सजाए ।
          विधु भरता बाहों में ।
          विखरें दृग कण आहों में ।     
   प्रफुल्लित धरा शिराएं ।
    तृण कण जीवन पाएं ।
            नव चेतन प्राणों में ।
            चलता दिनकर राहों में ।

    एक विस्तृत नभ सम ।
    भू धरा धरित रजः सम ।
            
  .. विवेक दुबे"निश्चल"@...

तुझ सक्षम को स्वयं संजोना होगा


 तुझ सक्षम को स्वयं संजोना होगा ।
 तब सा-आकार स्वप्न सलोना होगा ।
 इस अंबर का भी एक कोना होगा ।

कुंठित अभिलाषाएं धूमिल आशाएं ,
अपने ही साहस जल से धोना होगा ।
 इस अंबर का भी एक कोना होगा ।

 रचकर निज प्रण प्राण सांसों में ,
 निज को निज में ही खोना होगा ।
इस अंबर का भी एक कोना होगा ।

 रीत रहे न प्रीत रहे कोई मन में ,
 मन को मन का ही होना होगा ।
इस अंबर का भी एक कोना होगा ।

 स्व को स्वयं से तजकर तुझको ,
 निज स्वयं तुझे बिलोना होगा ।
इस अंबर का भी एक कोना होगा ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@...

तसल्ली देना कोई उन से सीख ले


तसल्ली देना कोई उन से सीख ले ।
प्यार की भाषा कोई उन से सीख ले ।

 है नही इश्क़ किसी से यूँ तो उनको ,
 इश्क़ क्या है कोई उन से सीख ले ।
..
क्युं करते नही वो वफ़ा किसी से ,
वफ़ा क्या है कोई उनसे सीख ले ।

चले नहीं वो कभी राह-ए-मोहब्बत ,
तन्हाई क्या है कोई उनसे सीख ले ।

क्युं सहजे कुछ क़तरे अश्क़ के ,
दर्द क्या है कोई उनसे सीख लें ।

क्युं रौनक नही उस निग़ाह में कोई ,
आब क्या है कोई उनसे सीख ले ।

क्युं लिखता ही रहा है वो "निश्चल"
 क़ता क्या है कोई उनसे सीख लें 

 ..... विवेक दुबे"निश्चल"@..

शनिवार, 14 जुलाई 2018

छूट गए वो हर बंधन

 टूट गए वो हर बंधन ,
 दृष्टा बनकर खुद को जो देखा । 

 जिस बंधन से खुद को ,
  था मैं जकड़े बैठा ।

 नियति एक कर्म भाव की ,
 कर्ता उस कर्ता में देखा ।

 भाव नही प्रतिफ़ल का कोई ,
 मन भाव परे जा कर बैठा ।

 दृष्टा बनकर खुद को देखा ।

 सब कर्म हुए कार्य भाव से ,
 सब कार्य हुए निमित्त भाव से ,
 बस जैसा वो कहता बैसा होता ।


 कर्म वही है कार्य वही है ,
 सर्वथा स्वीकार्य वही है ,
 सब उसकी ही माया का पोथा ।

 कुंठा कैसी भ्रांति कैसी ,
 अशान्त मन क्लांति कैसी ।

 दृष्टा है वो सम भाव से ,
 सूक्ष्म शरीर हँसता न रोता ।

 टूट गए वो हर बंधन ,
 दृष्टा बनकर खुद को जो देखा ।

  .... विवेक दुबे"निश्चल"@...

नैना नैनन के प्यासे

नैना नैनन के प्यासे ।
 अधर अधरन के प्यासे ।

प्रीतम की इन यादों में ,
स्पंदन साँसों के साजे ।

 आ जाएं प्रीतम मोरे ,
 भा जाऊँ मैं मन में ।

 ये मन भागे ,
 मन के आंगे ।

 राह तकी है जन्मों से ,
 जन्म जाने कितने आंगे ।

 पा जाऊँ एक छवि प्रीतम की ,
 खो जाऊँ मैं बस प्रीतम में ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@..

हर मुश्किल हल होगी


  हर मुश्किल हल होगी । 
  आज नही तो कल होगी ।

  चलता चल तू राह पथिक ,
  राह छोर पे मंजिल होगी ।

   न हार कभी इन राहों से , 
   कोशिश कदम सफ़ल होगी ।

 पग धरता चल अंगारों पे ,
 पग तले धरा शीतल होगी ।

 झुक जाएगा अम्बर भी,
 एक दिन पुरुषार्थ तले तेरे ।

  तेरे कदमों की  उसको भी,   
   एक दिन चाहत होगी ।

 हर मुश्किल हल होगी ।
आज नही तो कल होगी ।

..... विवेक दुबे"निश्चल"@..... 

चलना ही तो जीवन है

कम शब्दों को लिखकर मैं ,
गहरे भाव सजाता हूँ ।

     खोजा करता हस्ति अपनी ,
     दिनकर सँग चलता जाता हूँ ।

 साँझ तले दिनकर छुपता ,
 अँधियारो में मैं खो जाता हूँ ।

       उजियारों से थककर मैं ,
      अंधियारों में थकान मिटाता हूँ ।

 हर रात निशा के आँचल में ,
 मैं जीवन फिर पा जाता हूँ ।

        सहज रही स्याह निशा मुझको ,
       अपनी छाया से भी छुप जाता हूँ ।

हार नही मानूँगा फिर भी मैं ,
खुद को अहसास दिलाता हूँ ।

     कभी हार नही कभी जीत नही ,
     जीवन में बस इतना ही तो पाता हूँ ।

   चलना ही तो जीवन है ,
  "निश्चल" चलता ही जाता हूँ ।

..... विवेक दुबे"निश्चल"@...

इतना होता हूँ क्युं

इतना होता हुँ क्युं मैं,जमाने का दीवाना ।
अपने ही अंदाज़ से,चलाना चाहे जमाना ।

 ठूंसकर अल्फ़ाज़ अपने को मेरे मुहँ में ,
 कहता है मुझसे ,अब तू इन्हें गुनगुना ।

वो मतला ना ही मक़ता ही रहा कोई ,
जो चाहा था मैंने आप खुद को सुनना ।

 गुनगुनाया था मैंने जिसे अपने वास्ते ।
 न चाहा था कभी ज़माने को सुनाना ।

 कहती दुनियाँ कुछ कहो अपने अंदाज़ में ।
बनाती है मेरे अंदाज़ से फिर एक फ़साना ।

 "निश्चल" न रह सका मैं अपने वास्ते ,
 करता रहा जमाना यूँ मुझे बेगाना ।

 .... विवेक दुबे"निश्चल"@...

एक ग़जल कहूँ या न कहुं

आज एक ग़जल कहूँ या न कहुँ ।
 तुझे खिलता कमल कहूँ या न कहुँ ।

चाहत-ए-जिंदगी की ख़ातिर ,
दिल-ए-दख़ल कहूँ या न कहुँ ।

 बहता दरिया तोड़कर किनारों को ,
 उसे आज समंदर कहूँ या न कहुँ ।

 छूटता ही रहा एक लफ्ज़ कहीं कोई ,
 उस सफ़े को सफ़ा कहूँ या न कहुँ ।

 जीता न वो मेरी हार के वास्ते ,
 उस जीत को हार कहूँ या न कहुँ ।

चलते रहे जो क़दम मेरे साथ से ,
उस अदा को वफ़ा कहूँ या न कहुँ ।

रह गया तख़ल्लुस जिस ग़जल में मेरा ,
उसे मैं मुकम्मिल ग़जल कहूँ या न कहुँ ।

..... विवेक दुबे"निश्चल"@...

शुक्रवार, 13 जुलाई 2018

आदमी ग़जल



काफ़िया --- आर
 रदीफ़  ----- हैं

आदमी आदमी के गुनहगार हैं ।
 आदमी आज यूँ भी वफ़ादार हैं ।

है नही मुरब्बत दिल मे कोई  ,
इस जहां में सभी आज बे-जार हैं ।

वा-बस्ता साथ में है सभी आज भी,
बीच सब के हुए सिर्फ इक़रार हैं ।

हो रहे हैं ख़ुश वो अपने दांव पर ,
मानते है जिन्हें जीत वो हार हैं ।

जीतने के लिए खेलकर दांव को ,
हार से आदमी के युं इक़रार हैं ।

जीतेगें अब नही तो अब वो ,
"निश्चल" के क्युं आज इख़्तियार हैं ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@......

ग़जल

एक प्रयास ग़जल का

काफ़िया --- आर
 रदीफ़  ----- है 
बह्र ------212×4

आदमी आदमी का गुनहगार है ।
आदमियत हुई आज शर्मसार है ।

है नहीं मुरब्बत दिल में कोई  ,
इस जहां में सभी आज बे-जार है ।

वा-बस्ता साथ में है सभी आज भी,
बीच सब के हुआ सिर्फ इक़रार है ।

हो रहे हैं ख़ुश वो अपने दांव पर ,
मानते हैं जिसे जीत वो हार है ।

जीतने के लिए खेलकर दांव को ,
हार से आदमी का यूं इक़रार है ।

जीतेगा अब नहीं तो अब वो ,
"निश्चल" को क्यूं आज इख़्तियार है ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@.....

गुरुवार, 12 जुलाई 2018

एक साँझ सदा ढ़लती

रात तले शबनम ढ़लती ।
 क़तरा बन कर  चलती ।

मचल जमीं के दामन में ,
जर्रा जमीं जा मिलती ।

 ज़ीवन की साँसों में भी ,
 एक बात यही मिलती ।

 भोर खिले उजियारों की,
 एक साँझ सदा ढ़लती ।

पा जाने की आशा से ,

 ढ़लती और निकलती ।

   एक रात सुबह संग ,
 "निश्चल" निश्चित मिलती ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@....

दोहे 24 से 26

24
नयन समाये हैं साजन, मन बन आस चकोर ।
 दूर देश प्रियवर है,मन तड़फत बिन तोर ।
25
 सजनी साधे बड़ी आस,अंतर मन भरी प्यास ।
 डोले मन पिया मिलन, राह तके भरे नयन ।
26
 आओ प्रियवर देर भई, साँझ भई भोर गई।
 रजनी सँग चँदा आया, तूने मोहे बिसराया ।
   ..... विवेक दुबे "निश्चल"..

कलम चलती है शब्द जागते हैं।

सम्मान पत्र

  मान मिला सम्मान मिला।  अपनो में स्थान मिला ।  खिली कलम कमल सी,  शब्दों को स्वाभिमान मिला। मेरी यूँ आदतें आदत बनती गई ।  शब्द जागते...