गुरुवार, 26 जुलाई 2018

मुक्तक

462
वो जाम सा अंजाम था ।
निग़ाहों से अपनी हैरान था ।
नही था कोई रिंद वो साक़ी,
जिंदगी उसका ही नाम था ।
.... 
463
निगाहों को निग़ाहों से धोका हुआ है ।
ज्यों जागकर भी कोई सोया हुआ है ।
झुकीं हैं निग़ाहें यूँ हर शख़्स की क्युं ,
ज्यों निग़ाहों का निग़ाहों से सौदा हुआ है ।
....
464
चलते रहो साथ हर दम मगर, 
 बातें वफ़ा की किया ना करो ।
 घुटते हों अरमां जहाँ दिल में ,
 वो ज़िंदगी तुम जिया ना करो ।
... विवेक दुबे"निश्चल"@...
डायरी 3

मुक्तक

एक रात सजी दुल्हन जैसी ,
 अरमानों की चूनर ओढ़ी ।
चँचल चँदा होगा दामन में ,
 झिलमिल तारे होंगे हम जोली ।
..
460
पढ़ता रहा मैं किताबों को ।
 छानता रहा मैं अखबारों को ।
 एक खबर में ढूंढता रहा कहीं ,
 अपने शहर के उजियारों को ।
....
461
वो पर्त्-दर-पर्त् मुखोटे उतारते रहे ।
हम निग़ाह-दर-निग़ाह निहारते रहे ।
तलाशते रहे शराफत मुखोटों में , 
 क्यों हमें शराफत के मुग़ालते रहे ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@..



तलाशता रहा

तलाश


अजनवी शहर में ,
चाहत को तलाशता रहा ।

सितारों भरी रात में ,
चाँद को तलाशता रहा ।

रहा सफ़र हर मुकम्मिल,
 उसका यूँ तो मगर ,

सफ़र-दर-सफ़र मंजिल को ,
 तलाशता रहा ।

...... विवेक दुबे"निश्चल"@...

रिश्ते रहे आज म्यानों से ।

ना रहे याद हम , 
आज अंजानों से ।

       हसरतों की चाहत में ,
        खो गए पहचानों से ।

 रीतते ज्यों नीर से ,
 नीरद असमानों से ,

         बरसने की चाह में ,
         ग़ुम हुए निशानों से ।

  घिरती रही जिंदगी ,
 अक़्सर उलाहनों से ।

           होती रही लाचार ,
          घिरकर फ़सानो से ।

 घटते नही आज,
 फांसले दिल के ,

            रिश्ते रहे आज "निश्चल" ,
            होकर म्यानों से ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@...

विकास को बांट कर



विकास को   बांट कर ।
वसुधा को     छाँट कर ।
जा पहुँचे     आज हम ,
बिनाश के    काल पर ।

विकृति को मानकर ।
प्रगति को   जानकर ।
जा पहुँचे    आज हम ,
तनाव के     भाल पर ।

 प्रकाश को  पाल कर ।
 अंधेरों को  टाल कर ।
 जा पहुँचे    आज हम ,
 भानू के      गाल पर ।

 गति को   जान कर ।
 वृत्ति को    मान कर ।
 जा पहुँचे   आज हम ,
 पतन की    पाल पर ।

 समझें न जान कर ।
 बूझें न     मान कर ।
 जी रहे   आज हम ,
 अपने अभिमान पर ।

 प्रकृति को   साध कर ।
 कण कण व्यापार कर ।
 सो रहे       आज हम ,
 अपने    ईमान पर ।

... विवेक दुबे"निश्चल"@....

बस लिखता चल

बस लिखता चल जो मन कहता है ।
काव्य काल कब भाषा में रहता है ।

सृजित हुआ सदा यह मन से ,
 हृदय भाव मन ही कहता है ।

काव्य काल कब भाषा में रहता है ।

बदला नही कभी किसी भाषा में ,
यह समय सदा समय रहता है ।

 चला सदा लाँघ कर सीमाएं सारी ,
 देश काल भाषा के परे मन बहता है ।

काव्य काल कब भाषा में रहता है ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@..

वहाँ रिवाज़ नही

वो मलफूजात इमारतें ,
आज भी ढही नही है ।
तख़लीकी तजुर्बों की ,
 वहाँ कोई कमी नही है ।
तज़किरा न कर "निश्चल"'
 उस मरातिब नज़्म पर ,
 दावत-ए-रिहलत,
 वहाँ रिवाज़ नही है ।
..... विवेक दुबे"निश्चल"@..



मलफूजात (सूफियों के प्रवचन)
तख़लीकी (सुधार)
तज़किरा (चर्चा)
मुरातिब (दर्जा)
रिहलत (मृत्यु रवानगी)

ईंट पत्थर के मकानों से

ईंट पत्थर के मकानों से ।
 मेरे होने के निशानों से ।
 ....
       नही बोलता संग कोई ,
       ये हालात है अंजानो से ।
....
 गुजरता रहा लम्हा लम्हा ,
 लफ्ज़ ख़ामोश मुकामों से ।
...
         दर्ज होते रहे अल्फ़ाज़ ये ,
         आग़ोश मेरे ही वीरानों से ।
...
लूटकर महफ़िल तिश्निगी ,
दबता राह यूँ अहसानों से ।
.....
        कर उजागर अपने नाम को  ,
        हुआ रंज अपनी पहचानों से ।
.......
    कहने को तो वो "निश्चल"
   आज भी है मेरे दीवानों से ।


..... विवेक दुबे "निश्चल"@...

रविवार, 22 जुलाई 2018

समझता रहा कोई

समझता रहा कोई कोई समझाता रहा ।
 रूठता रहा वो कोई कोई मनाता रहा ।

 चलता रहा सफ़र राह-ए-जिंदगी पे ,
 ज़िंदगी से फक़त इतना ही नाता रहा  

 बिखेर चंद क़तरे अश्क़ शबनम से ,
  वो बागवां गुलशन सजाता रहा ।

 उठते से तूफ़ां उन हवाओं से  ,
 वो फ़िज़ा चिराग़ जलाता रहा ।

 फ़र्ज़-ए-कश्ती साहिल के वास्ते ,
 वो खुद को नाख़ुदा बनाता रहा । 

 "निश्चल" टूटकर भी टूट न सका कभी ,
 वो संग अपने आपको दिखाता रहा ।
..... विवेक दुबे"निश्चल"@...





मुक्तक

नशा मेरा बाखूब हुआ ।
  इश्क़ तेरा मंसूब हुआ ।
 डूबता रहा किनारों पे ,
 तमाशा यह खूब हुआ ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@..

शरारत हो जाए जरा जरा ।
 यूँ रात गुजर जाए जरा जरा ।
 टूटकर पैमाने साक़ी के हाथों से ,
 रिंद से बिखर जाएं जरा जरा ।
... विवेक दुबे"निश्चल"@..

जिंदगी तो लौट कर फिर आती है ।
खुशियों को नज़र क्यों लग जाती है ।
.... "निश्चल"@..
Blog post 22/7/18

कोई देख ले मुझे

कोई देख ले मुझे ।
कोई तो देख ले मुझे ।

अक़्स निग़ाहों में , 
खेंच ले मुझे ।
सोखकर अस्र मेरा , 
कोई सोच ले मुझे ।

 अश्क़ नही ,
 जो बह जाऊँगा ।
 शबनम सा कोई ,
 सोख ले मुझे ।

 वक़्त भी नही  ,
 जो गुजर जाउँगा  ।
 समंदर सा कोई ,
  रोक ले मुझे ।

 जज्वात हूँ मैं ,
 धड़कन सा ,
 दिल उतर जाऊँगा ,
 मैं मन सा ।

 कोई देख ले मुझे ।
 कोई तो देख ले मुझे ।

..... विवेक दुबे"निश्चल"@..

वो नैना

वो नैना मन भावन से ।
 कारे कजरारे सावन से ।

 बिजुरी चमके सावन की ।
 झपकें पलकें साजन की ।

 वो केश घनेरे काजल से ।
  लहराते गहरे से बदला से ।

 लहराती तब नागिन सी ।
 भींगी लट जो साजन की ।

 रिमझिम बूंदे सी सावन की ।
 पायल खनकी  साजन की ।

  वो चितवन जीवन सी ।
 धडक़त मन चेतन सी ।

 वो नैना मन भावन से ।
 कारे कजरारे सावन से ।

... *विवेक दुबे"निश्चल* "@.

मुक्तक

मैं असमां पे ठहरे बादल सा ।
तू झोंका मस्त पवन सा ।.
उड़ा ले चल साथ मुझे ,
बरस जाऊँ मैं सावन सा ।
...
सावन की बदरी सी तू आई ।
पवन मन ने ली  अंगड़ाई ।
 उड़ा ले चलूं तुझे दूर कहीं  ,
 खो जाए तुझमे मेरी तन्हाई  ।

 बरसे बून्द बून्द सी फिर तू ,
 तप्त पवन मन शीतलता छाई ।
 अस्तित्वहीन हो जाऊँ वहाँ मैं ,
साथ चले जो तू बन मेरी परछाई ।
..... विवेक दुबे"निश्चल"@...
Blog post 22/7/18

मुक्तक

आज कुछ लिखा ना गया ।
आज कुछ कहा ना गया ।
सुनता रहा मैं खमोशी से ,
जो सवाल मुझे कहा ना गया ।
... विवेक दुबे"निश्चल"@...

वो जाम सा अंजाम था ।
निग़ाहों से अपनी हैरान था ।
नही था कोई रिंद वो साक़ी,
जिंदगी उसका ही नाम था ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@...


कलम चलती है शब्द जागते हैं।

सम्मान पत्र

  मान मिला सम्मान मिला।  अपनो में स्थान मिला ।  खिली कलम कमल सी,  शब्दों को स्वाभिमान मिला। मेरी यूँ आदतें आदत बनती गई ।  शब्द जागते...