मंगलवार, 13 नवंबर 2018

मणि माल छंद

मणिमाल छंद 
विधान~ 
19 वर्ण ,10,9 वर्णों पर यति , 4 चरण
दो-दो चरण समतुकांत।
( 112 121 121 211 2 12 112 1)

कर जोड़ कर नित्य करें, 
          हम मातु को नित याद ।
नव रूप देत सदा दया ,
          जब पूजते हम पाद ।  

नवरात्रि ज्योत जहाँ जले,
       करती वहाँ यह वास ।
उपकार भाव यही मिले,
          कर माँ तु हृदय वास ।

..... विवेक दुबे"निश्चल"@...
डायरी 5(164)
    

ठहर गया


उसे देख देख वो ठहर गया ।
देकर जो यूँ कुछ नजर गया ।

 दूर था कल तक निग़ाह के ,
आज धड़कन बन उतर गया ।

 सजाकर महफ़िल दिल की ,
क़तरा क़तरा सा निखर गया ।

गिरा न क़तरा आँख से कभी ,
एक अश्क़ निग़ाह सँवर गया ।

करता रहा फरियाद मुंसिफ़ भी ।
दौर ज़िरह का यूँ मुकर गया ।

ग़ुम हुए हर्फ़ हर्फ़ किताबों से ,
रफ्ता रफ्ता लफ्ज़ असर गया ।

...विवेक दुबे"निश्चल"@...

गुस्ताखी कर बैठा

यह कैसी गुस्ताखी कर बैठा ।
इश्क़ खुद खुदी से कर बैठा ।

चलकर भी साथ दुनियाँ के ,
तिश्निगी से दामन भर बैठा ।

लिपटा रहा अपने लिबासों में ,
अस्क़ाम असर दिल पर बैठा ।

टोकती रही रूह हर कदम  ,
इनाद रूह ख़ाक धर बैठा ।

भूलकर अस्ल असर अपना ,
"निश्चल" आराईश गुरुर बैठा ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@..
डायरी 5(182)

खुदी -अहंकार
अस्काम - बुराइयां 
इनाद - विरोध 
अस्बाब - कारण
अस्ल - मूल
असर - फल परिणाम 
आराईश = सजावट, सुन्दरता

चलो एक दीप जलाते है

आज चलो एक दीप जलाते हैं ।
तम अन्तर्मन आज मिटाते है ।

दीप्त करें स्वयं स्वयं को ,
स्व-कान्ति स्वयं जागते है ।

रिक्त रहे न मन कोना कोई ,
मन कण कण दमकाते हैं ।

 स्वयं चेतन रश्मि से ,
अहम अंधकार मिटाते हैं ।

आज चलो एक दीप जलाते हैं ।
तम अन्तर्मन आज मिटाते है ।

.... विवेक दुबे" निश्चल"@...

उजर रहा मन मन के आंगे ।
मन दीप उजारे तम के आंगे ।
रिक्त हुआ व्योम सभी तब ,
खोल दिए जब मन के द्वारे ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@..
डायरी 5(185)



शुक्रवार, 9 नवंबर 2018

ठहर जरा

 ठहर जरा, इनायत का इतना करार है ।
 क्युं निग़ाहों को,निग़ाहों का इंतज़ार है ।

है सँग निग़ाह, संग सा सख्त जो ,
क्युं दिल को, उसका इख़्तियार है ।

जला है जो, मेरे वास्ते अंधेरों में ,
क्युं यही उसका, इश्क़ इक़रार है ।

सुखाता रहा , आब आँख में अपनी ,
क्युं करता नही ,दर्द अपना इज़हार है ।

चलता है जो, साथ सख़्त राहों पर ,
क्युं मंजिल का, वो भी तलबगार है ।

लिखता रहा , लफ्ज़ वास्ते जिसके,
क्युं सुनता,वो मुझे मेरे अशआर है ।(दोहे)

करती रही ,  बयां,हालात को सूरत  ,
"निश्चल" नही , चेहरा-ए-असरार है ।(रहस्मय)

... विवेक दुबे"निश्चल"@...




गुरुवार, 8 नवंबर 2018

चलता है पथ अंगारों को लेकर

चलता है पथ अंगारों को लेकर ।
साथ अधूरे कुछ तारों को लेकर ।

गढ़ता है फिर दिनकर दिन को ,
आधे छूटे कुछ वादों को लेकर ।

सहज रहा है नव आशाओं को ,
अपने ही कुछ भारों के लेकर ।

जीत चला है पग पग पथ को ,
जीत तले कुछ हारों को लेकर ।

थकित नही ठहरा कुछ पल को ,
साँझ तले शीत सहारों को लेकर ।

चलना है बस एक नियति यही ,
अपने ताप तले विचारों को लेकर ।

चलता है पथ अंगारों को लेकर ।
साथ अधूरे कुछ तारों को लेकर ।

निश्चल" है फिर भी वो चलता है  ,

 धवल किरण श्रृंगारों को लेकर ।

.. विवेक दुबे"निश्चल"@...

क्युं रिश्तों को अपना बनाते हो ।

क्युं रिश्तों को अपना बनाते हो ।
क्युं दर्द अपना जुबां पर लाते हो ।

बे-वफ़ा रहे है मुसलसल रिश्ते  ,
क्युं रिश्तों से वफ़ा दिखलाते हो ।

 चलते तुम अपनी ही राह पर ,
चौराहों पर घुल मिल जाते हो ।

 मिले आपस मे कुछ कदम को ,
 कुछ साथ फिर ज़ुदा हो जाते हो ।

जाते तुम राह नई मंजिल को ,
तुम राह नई फिर कहलाते हो ।

नही मुक़म्मिल कभी कहीं कोई ,
मंजिल मंजिल रिश्ते गढ़ते जाते हो ।

छूट गया फ़िर पीछे कल को वो ,
आज मुक़ाम नया जो पा जाते हो ।

क्युं रिश्तों को अपना बनाते हो ।
क्युं दर्द अपना जुबां पर लाते हो ।

....विवेक दुबे"निश्चल"@...

बुधवार, 7 नवंबर 2018

दीप तलें अंधियारे रहे

नव वंदनवार लगाते रहे ।
स्वास्तिक द्वार सजाते रहे ।

दीप धरे कुछ द्वारे में ,
दृष्टि पसरे उजियारे रहे ।

नव जीवन की आशा में ,
बुझते दीप बने सहारे रहे ।

बीती गहन निशा धीरे से ,
उज्वल से कुछ भुनसारे रहे ।

प्रखर चेतना चेतन मन की ,
पर दीप तले अंधियारे रहे ।

... विवेक दुबे"निश्चल"@...

मंगलवार, 6 नवंबर 2018

दीप दिवाली के जलकर

दीप दिवाली के जलकर ,
अंधियारे पिघलाते हैं ।

तिमिर समेट तले अपने ,
स्वयं रहित हो जाते हैं ।

देकर उज्वल आभा जगमग ,
एक राह नई फिर दिखलाते हैं ।

दीप दिवाली के जलकर ,
अंधियारे पिघलाते हैं ।

आशाओं की किरणों सँग ,
हर अंधकार पर छा जाते हैं ।

जलकर स्वयं बारबार यूँ हीं ,
ज़ीवन की परिभाषा दे जाते हैं ।

दीप दिवाली के जलकर ,
अंधियारे पिघलाते हैं ।

देकर सकल तरल अपना ,
शेष रहित स्वयं हो जाते है ।

नहीं पराजय कभी कहीं उनकी,
स्व-प्रकाश आभित जो हो जाते है ।

 हर चलते तम अंश अंश का ,
"निश्चल" फिर भी कहलाते हैं ।

दीप दिवाली के जलकर ,
अंधियारे पिघलाते हैं ।

... विवेक दुबे"निश्चल"@...



दीप दीप आज दीप जले हैं

दीप दीप आज दीप जले है ।
अंधियारे प्रकाश तले घुले है ।

तिमिर छुपा दीप दीप तले ,
उजियारों से दीप मिले है ।

हुआ पराजित तम धुति से ,
अधर अधर आज खिले है ।

प्रकाशित क्षिति श्रंगारित तन  ,
अंग अंग गहने सुहाग ढ़ले है ।

रुकी नही कहीं कभी रश्मि ,
उज्वल उजियारे अंनत चले है ।

दीप दीप आज दीप जले है ।
अंधियारे प्रकाश तले घुले है ।

...विवेक दुबे"निश्चल"@...


बुधवार, 24 अक्टूबर 2018

शरद पूर्णिमा

रात श्याम मेरे शरद विराजेंगे ।
श्यामा चरणन में अहमं बिसारेंगे ।

भोज लगाऊं मैं छीर खीर का ,
माखन मिश्री जिस पर साजेंगे ।

 पीयूष सींचता मधुकर जिस पर ,
 श्यामा चरणामृत फिर हम पावेंगे ।

रात श्याम मेरे शरद विराजेंगे ।
श्यामा चरणन में अहमं बिसारेंगे ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@...


सोमवार, 15 अक्टूबर 2018

नव पथ बढ़ना

अहीर  छंद
11 
 रूठ गए सब तब भी।
 मान गए हम जब भी ।
          रीत प्रीत आन की ।
          सीख यही प्राण की ।

जीत तले साँझ सी ।
सिद्ध नही बिश्राम सी ।
             भोर फिर संग्राम की ।
              नव पथ आयाम की ।

आता गया रुकना ।
  भावों सँग झुकना ।
             हार नही थकना ।
             बात यही कसना ।

   जीत तले न रुकना ।
   सिद्ध हुए न बिकना ।
              लक्ष्य नए फिर गढ़ना ।
              नित्य नव पथ बढ़ना ।

... *विवेक दुबे"निश्चल"*@..

आया माता निकट तुम्हारे

मत्ता छंद
222 211 112 2

गीतों में माँ तुम बस जाओ ।
ज्योती सी प्रेम तुम जगाओ ।
 आया माता निकट तुहारे ।
 तू है दाता तुमहि सहारे ।

दीनो की लाज झट बचाये ।
 सारे ही कष्ट फट हटाये ।
 माता तेरे गुन सब गायें ।
 तेरी भक्ती जन जब पायें ।

 दे दो माता सुफल सहारे ।
 आया हूँ याचक बन द्वारे ।
  दाता है तू जग जननी माँ ।
 माया तेरी शिव कथनी माँ ।

  दुर्गा हो आदि शिव शक्ति हो ।
   चंडी माया हर हर भक्ति हो ।
    तेरे ही रूप रचत माया  ।
    सारा प्रकाश जगत छाया ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@....

माँ उपकार करो

मनोज्ञा छंद
(111  212  2 )

 भजत नित्य माता ।
 सकल ज्ञान पाता ।
 चरन पाद सेवा ।
 मिलत ज्ञान मेवा ।

 सहज भाव आया ।
 सकल प्राण लाया ।
 नित तुझे मनाऊँ ।
 कब "विवेक" पाऊँ ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@...


आओ माँ उपकार करो ।
  दुष्टों का तुम संहार करो ।
 पाप अनाचार रजः छाई है ,
  हर पापी पर प्रहार करो ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@..

कलम चलती है शब्द जागते हैं।

सम्मान पत्र

  मान मिला सम्मान मिला।  अपनो में स्थान मिला ।  खिली कलम कमल सी,  शब्दों को स्वाभिमान मिला। मेरी यूँ आदतें आदत बनती गई ।  शब्द जागते...