शनिवार, 15 दिसंबर 2018

पूर्ण ब्रह्म वो जो स्वयं है ,

 665
हर विचार रहा अधूरा सा ।
 हुआ नही रजः कण सम पूरा सा ।

अद्भुत विधि है बिधना की ,
रंग भिन्न विविध भरता पूरा सा ।

जोड़ नही तू कुछ अपने मन से ,
कोई कार्य रहे न उसका अधूरा सा ।

पूर्ण ब्रह्म वो जो स्वयं है ,
वो ही करता तुझको मुझको पूरा सा ।

... विवेक दुबे"निश्चल"@....
डायरी 6(76)

जो चलकर भी "निश्चल" रहता ,

664
रुक हार कहीं जो थकता है ।
यह काल उसे ही ठगता है ।

सहता है जो   धूप ताप को ,
फ़ल वही   तो   पकता है ।

कहलाता तरल नीर वो भी ,
पोखर में जो जल रुकता है । 

बहता है जो नीर नदी सा ,
सागर में वो ही रूपता है ।   

जो चलकर भी "निश्चल" रहता ,
पाषाण मील सा वो सजता है ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@...

डायरी 6(75)

मुक्तक 672/677

672

दुनियाँ कमतर ही आँकती रही।
चुभते तिनके से आँख सी रही ।

 फैलते रहे दरिया से किनारे पे  ,
 दुनियाँ इतनी ही साथ सी रही ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@...

673

मुझे समझने के लिए, फ़िकर चाहिए ।
निग़ाह नज़्र में ,  आब जिकर चाहिए ।

न समझ हो कुछ , समझने के लिए , 
फक़त दिल , इतना ही असर चाहिए ।

..विवेक दुबे"निश्चल"@.

677

इस वक़्त से नही कुछ भला है ।
नहीं इस वक़्त से कुछ भला है ।

गुजरता रहा हाल हर हालत से ,
मेरे सवाल का ज़वाब ये मिला है ।

... विवेक दुबे"निश्चल"@....

675

कुछ दिन की कतरन है ।
सब रीते से ही बर्तन है ।

रीते से दिन खाली खाली ,
रातों का उतरा यौवन है ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@....

676

दिल की  यूँ झोली भर लो ।
खुशियों की बोली कर लो ।

       डूबकर खुशी के समंदर में ,
      जिंदगी कुछ होली कर लो ।

      ... विवेक दुबे"निश्चल"@.

677

कुछ फैसले किताबो से ।
कुछ फैसले मिज़ाज़ो से ।

बदल कर मिजाज अपना,
झुकते रहे जो सहारों से ।

... विवेक दुबे"निश्चल"@..

Blog.post 15/12/18

मुक्तक 670/671

670
कुछ कब होता है ।
कुछ कब होना है ।

छूट रहे कुछ प्रश्नों में ,
एक प्रश्न यही संजोना है ।

गूढ़ नही कुछ कोई ,
रजः को रजः पे सोना है ।
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671
हे अज्ञान ज्ञान के बासी ।
तू खोज रहा मथुरा काशी ।
तुझे श्याम मिलेंगे मन भीतर ,
तेरा मन देखे जिसकी झांकी ।
.
... विवेक दुबे"निश्चल"@..
डायरी 3

गुरुवार, 13 दिसंबर 2018

हर राह ही रही "निश्चल" मेरी ।

हर बह्र से खारिज ग़जल मेरी ।
कुछ कहती निग़ाह मचल मेरी ।

 उठते जो तूफ़ान रूह समंदर में ,
 अल्फ़ाज़ को छूती हलचल मेरी ।

आँख के गिरते क़तरे क़तरे को ,
ज़ज्ब कर जाती कलम चल मेरी ,
    
     खो गया क़तरा सा समंदर में ,
    बस इतनी ही एक दखल मेरी ।

मिल गया वाह जिसे अंजाम में ,
हो गई वो ग़जल मुकम्मल मेरी ।

     मिलता रहा साँझ सा भोर से ,
     हर राह ही रही "निश्चल" मेरी ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@..
डायरी 6(74)

लब ख़ामोश खुलें राजदार मिलेंगे ।

तू ढूंढ़ जरा बहाने हज़ार मिलेंगे ।
हर दिल में नही दिलदार मिलेंगे ।

न सजा ख़्वाब ख़्याल की खातिर ,
हर ख़्याल ख़्वाब के पार मिलेंगे ।

झाँक तो सही किसी निग़ाह में जरा ,
ज़िस्म तुझे रूह से गुनहगार मिलेंगे ।

करना नही सौदे नियत के अपनी ,
आज खुदगर्ज बड़े व्यापार मिलेंगे ।

परेशां है जमीं बरसते आसमां से ,
हमदर्दी के कुछ यूं त्योहार मिलेंगे ।

हर मिलती नजर निग़ाह के पीछे ,
अमन-ओ-ईमान के खार मिलेंगे ।

जीतना न कभी इस दुनियाँ से ,
हार के बाद ही तुझे यार मिलेंगे ।

"निश्चल"छेड़ किसी ज़ज्बात को ,
 लब ख़ामोश खुलें राजदार मिलेंगे ।

..... विवेक दुबे"निश्चल"@....
डायरी 6(73)

"निश्चल" रहा फिर भी नवाब सा ।

मैं हर्फ़ हर्फ़ एक किताब सा ।
मैं लफ्ज़ रहा बे-जवाब सा ।

खो गया अपनी मायूसी में ,
हटता नही जो हिजाब सा ।

अपने अरमानों की चाहत में ,
बदलता रहा वक़्त शबाब सा ।

 कह गया अल्फ़ाज़ खामोशी से ,
 हांसिल हुआ नही रुआब सा ।

 फांके मिले ग़जल और गीत से ,
"निश्चल" रहा फिर भी नवाब सा ।

... विवेक दुबे"निश्चल@...

डायरी 6(72)
Blog post 13/12/18

कहाँ इंसान से ईमान खो गया ।

आज कहाँ इंसान से ईमान खो गया ।
राम कहीं तो कहीं रहमान खो गया ।

करते रहे सजदे जाते रहे शिवाला ,
 नजरों में मगर सम्मान खो गया ।

बदल रही है रौनके पाक रिश्तों की ,
घर घर से आज मेहमान खो गया ।

 मिलते रहे गले लोग मुर्दार की तरह ,
 जिंदगी से जिंदा अरमान खो गया ।

 खुदगर्ज बने खुद खुदी के लिये ,
 हर फ़र्ज़ अपनी पहचान खो गया ।

करते नही खुशी उस खुशी के लिये ,
"निश्चल" कहाँ वो अहसान खो गया ।

..... विवेक दुबे"निश्चल"@....

डायरी 6(71)





अर्चन वंदन वो होगा शब्दों का ।

अर्चन वंदन वो होगा शब्दों का ।
एक मौन निमंत्रण होगा शब्दों का ।

गढ़कर परिभाषा कुछ शब्दों की ,
भावों से आलिंगन होगा शब्दों का ।
...
रिक्त रहा नही कहीं कुछ कोई ,
मन तृप्त हुआ होगा शब्दो का ।

खिलकर गूढ़ अर्थ के भाव तले ,
तन शृंगार मिला होगा शब्दों का ।
....
हर्षित पुलकित सी होगी काया ,
सृजन सफ़ल वो होगा शब्दों का ।

 "निश्चल"रहकर चलता चल सा ,
  निष्छल फल होगा शब्दो का ।

.... विवेक दुबे"निश्चल@...
डायरी 6(70)

समझ न सकोगे ।

मेरे सवालों को समझ न सकोगे ।
चलोगे साथ मेरे बस तुम थकोगे ।

कभी करती नही सवाल ये जिंदगी ,
इस बे-सबाल को तुम क्या कहोगे ।

 ये फासला खड़ा है तुझमे मुझमे ,
 दूर रहकर भी तुम दूर न रहोगे ।

बेकार ही रहा सफ़र तुझ सँग ,
बात एक दिन यह तुम कहोगे ।

.... विवेक दुबे "निश्चल"@..
डायरी 6(68)

किस को आना है ।

किस को आना है ।
किस को जाना है ।

बस एक प्रश्न यही ,
करता रहा दिवाना है ।

राह चले सब अपनी ,
सबका एक ठिकाना है ।

बीत रहे पल पल में ,
पल को यही बताना है ।

चलकर भी न पहुचें ,
 पर सफर सुहाना है 

"निश्चल" रहे हर दम ,
समय यहीं बिताना है ।

... विवेक दुबे"निश्चल"@...

 हम रीत राग में उलझे है ।
 कहते फिर भी सुलझे है ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@..

डायरी 6(67)
Blog post 13/12/18

अपनो के दुलारों से ।

चलो साथ किनारों पे ।
 अपनो के दुलारों से ।

 पार हुआ हर दरिया ,
 तिनको से सहारों से ।
 ..
 सँग मिला दिन भर ,
 ताप मिले नजारों से ।

 साँझ ढ़ले घर लौटें ,
अपनी सी पुकारो से ।

जीवन की बगियाँ में ,
पुष्प यहीं बहारों से ।

खोज रहे है गुपचुप ,
तन मन के इशारों से ।

चलो साथ किनारों पे ।
 अपनो के दुलारों से ।

... विवेक दुबे"निश्चल"@...

डायरी 6(66)
Blog post 13/12/18

रातों का योवन उतरता सा ।

मन से मन को भरता सा।
घट पर घट सा धरता सा।

बीत रहा समय यहाँ भी ।
ये वक़्त कहाँ ठहरता सा।

 मन क्यों मन को हरता सा ।
 तन क्यों मन का करता सा ।

 दृष्ट सदा सत्य नही रहा है ,
 नीर नयन रहा पहरता सा ।

  दिन दिन को कतरता सा।
  रीते बर्तन से बिखरता सा ।

 बीत रहे दिन खाली खाली ,
 रातों का योवन उतरता सा ।

मन से मन को भरता सा।
घट पर घट सा धरता सा।

 .... विवेक दुबे"निश्चल"@..

डायरी 6(65)
Blog post 13/12/18



तुझे देखकर भी न देखते रहे ।

दिल यूँ कुछ भटकते रहे ।
ख़्याल बीच अटकते रहे ।

न जा सके पार ख़यालों के ,
ख़्याल से ही लिपटते रहे ।
...
हम बार बार रोकते रहे ।
नज़्र निग़ाह से टोकते रहे ।

उलझकर निग़ाह की चाह में ,
हम खुद खुद को कोसते रहे ।
...
 मन सँग बदन लपेटते रहे ।
तन बदन को समेटते रहे ।

एक पहचान की चाहत में ,
तुझे देखकर भी न देखते रहे ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@..
सद्गुरु
डायरी 6(64)

कलम चलती है शब्द जागते हैं।

सम्मान पत्र

  मान मिला सम्मान मिला।  अपनो में स्थान मिला ।  खिली कलम कमल सी,  शब्दों को स्वाभिमान मिला। मेरी यूँ आदतें आदत बनती गई ।  शब्द जागते...