कुछ खास नहीं कवि पिता की संतान हूँ । ..... निर्दलीय प्रकाशन भोपाल द्वारा बर्ष 2012 में "युवा सृजन धर्मिता अलंकरण" से अलंकृत। जन चेतना साहित्यिक सांस्कृतिक समिति पीलीभीत द्वारा 2017 श्रेष्ठ रचनाकार से सम्मानित कव्य रंगोली त्रैमासिक पत्रिका लखीमपुर खीरी द्वारा साहित्य भूषण सम्मान 2017 से सम्मानित "निश्चल" मन से निश्छल लिखते जाओ । ..... . (रचनाये मौलिक स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित .)
रविवार, 1 सितंबर 2019
बुधवार, 21 अगस्त 2019
सफ़र डगर
748
रुककर सफ़र डगर पर ,
डगर सफ़र फ़िर चलता है ।
जो तूफानों से लड़कर ,
हालातों से जा भिड़ता है ।
तपकर संघर्षो की अग्नि में ,
कुंदन सा होकर ढ़लता है ।
अथक चला ज़ीवन पथ पर ,
पग पग पथ डग धरता है ।
तब दूर क्षितिज पर तारा कोई ,
सदूर क्षितिज तक मंजिल गढता है ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@..
डायरी 6
रुककर सफ़र डगर पर ,
डगर सफ़र फ़िर चलता है ।
जो तूफानों से लड़कर ,
हालातों से जा भिड़ता है ।
तपकर संघर्षो की अग्नि में ,
कुंदन सा होकर ढ़लता है ।
अथक चला ज़ीवन पथ पर ,
पग पग पथ डग धरता है ।
तब दूर क्षितिज पर तारा कोई ,
सदूर क्षितिज तक मंजिल गढता है ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@..
डायरी 6
राखी
750
रिश्तों का हो अंजन ।
प्यार का हो बंधन ।
विश्वास के दर्पण में ,
सागर सा हो मन ।
यह राखी ही मेरे ,
शृंगार का हो साधन ।
कभी न हो जो पूरा ,
मुझसे तेरा यह ऋण ।
इस राखी के धागे में ,
यह तन मन हो अर्पण ।
बहना यह जीवन ,
हो बस तुझे समर्पण । ...
।। शुभ राखी ।।
....विवेक दुबे"निश्चल"@....
दायरी 6
रिश्तों का हो अंजन ।
प्यार का हो बंधन ।
विश्वास के दर्पण में ,
सागर सा हो मन ।
यह राखी ही मेरे ,
शृंगार का हो साधन ।
कभी न हो जो पूरा ,
मुझसे तेरा यह ऋण ।
इस राखी के धागे में ,
यह तन मन हो अर्पण ।
बहना यह जीवन ,
हो बस तुझे समर्पण । ...
।। शुभ राखी ।।
....विवेक दुबे"निश्चल"@....
दायरी 6
मंगलवार, 20 अगस्त 2019
मेरे होने की कहानी
मेरे होने की , कहानी लिख दूँ ।
फिर कोई अपनी, निशानी लिख दूँ ।
खो गए हालात , जिन हाथों से ,
उन हाथों की, जख्म सुहानी लिख दूँ ।
न हो चैन मयस्सर, जिस जिस्म रूह को ,
कशिश उस रूह की, रूहानी लिख दूँ ।
गुजरता गया दिन , शोहरतों में ,
रात की फिर , वीरानी लिख दूँ ।
बदलती रही रंग , मौसम की तरह ,
ये जिंदगी , फिर भी दीवानी लिख दूँ।
सिमेटकर कुछ , हंसी खयालों को ,
उनवान नया ,नज़्म पुरानी लिख दूँ ।
ले आया यहां, सफर उम्र का चलते चलते ,
"निश्चल"पड़ाव पे, उम्र की नादानी लिख दूँ ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@....
फिर कोई अपनी, निशानी लिख दूँ ।
खो गए हालात , जिन हाथों से ,
उन हाथों की, जख्म सुहानी लिख दूँ ।
न हो चैन मयस्सर, जिस जिस्म रूह को ,
कशिश उस रूह की, रूहानी लिख दूँ ।
गुजरता गया दिन , शोहरतों में ,
रात की फिर , वीरानी लिख दूँ ।
बदलती रही रंग , मौसम की तरह ,
ये जिंदगी , फिर भी दीवानी लिख दूँ।
सिमेटकर कुछ , हंसी खयालों को ,
उनवान नया ,नज़्म पुरानी लिख दूँ ।
ले आया यहां, सफर उम्र का चलते चलते ,
"निश्चल"पड़ाव पे, उम्र की नादानी लिख दूँ ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@....
बुधवार, 31 जुलाई 2019
Muktak 828/833
828
अशआर-ए-हालात लिखता रहा ।
लिपटकर शब्दों से दिखता रहा ।
सिमेटकर ज़िस्म ख़्वाब ख्यालो का ,
एक रूह-ए-कशिश मिटता रहा।
........
829
दिखाता रहा कैफ़ियत अपनी ,
कुछ दर्द मलाल इस तरह रहा ।
न बदल सका हालात आपनी ,
वो मुतमईन हाल इस तरह रहा ।
....
830
लफ्ज़ लफ्ज़ बेचैन है ।
बस इतना ही चैन है ।
बदलते है हालात तो ,
होती भोर की भी रेन है ।
.... ..
831
वो चराग़ उगलते रहे उजाले ।
आप को कर अंधेरों के हवाले ।
होती रहीं नाफ़रमानीयाँ उम्र की ,
नुक़्स जिंदगी से न गये निकाले ।
...
832
आइनों में नुक़्स निकाले न गये ।
ऐब हमसे कभी सम्हाले न गये ।
कहता रहा हर बात बे-वाकी से ,
इल्ज़ाम बे-बजह उछाले न गये ।
.....
*दुर्मिल सवैया*
चलती इक रात सदा भरने ,
नभ का आँचल अपने तम से ।
जगती रजनी सजती क्षितिज़ा ,
मिलने चलती अपने नभ से ।
सजता नव रूप निशाकर का,
खिलता भरता तन योवन से ,
घटता बढ़ता नित ही विधु भी,
सजता नभ ही तारक तन से ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@.....
अशआर-ए-हालात लिखता रहा ।
लिपटकर शब्दों से दिखता रहा ।
सिमेटकर ज़िस्म ख़्वाब ख्यालो का ,
एक रूह-ए-कशिश मिटता रहा।
........
829
दिखाता रहा कैफ़ियत अपनी ,
कुछ दर्द मलाल इस तरह रहा ।
न बदल सका हालात आपनी ,
वो मुतमईन हाल इस तरह रहा ।
....
830
लफ्ज़ लफ्ज़ बेचैन है ।
बस इतना ही चैन है ।
बदलते है हालात तो ,
होती भोर की भी रेन है ।
.... ..
831
वो चराग़ उगलते रहे उजाले ।
आप को कर अंधेरों के हवाले ।
होती रहीं नाफ़रमानीयाँ उम्र की ,
नुक़्स जिंदगी से न गये निकाले ।
...
832
आइनों में नुक़्स निकाले न गये ।
ऐब हमसे कभी सम्हाले न गये ।
कहता रहा हर बात बे-वाकी से ,
इल्ज़ाम बे-बजह उछाले न गये ।
.....
*दुर्मिल सवैया*
चलती इक रात सदा भरने ,
नभ का आँचल अपने तम से ।
जगती रजनी सजती क्षितिज़ा ,
मिलने चलती अपने नभ से ।
सजता नव रूप निशाकर का,
खिलता भरता तन योवन से ,
घटता बढ़ता नित ही विधु भी,
सजता नभ ही तारक तन से ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@.....
मुक्तक 820/827
820
तुझे सम्हालना होगा ।
साथ मचलना होगा ।
पाकर खुद को खुद में,
खुद से मिलना होगा ।
... ...
821
जो बदल सके न किसी को ।
तो बदल चल तू खुदी को ।
कर सफ़र मुक़म्मिल अपना ,
मंजिल बना ले रज़ा उसी को ।
... ....
822
आती रहीं बहारें, बहार आने को ।
न बदला असमां,मौसम बिताने को ।
पहनकर लिबास , वो जिस्मों के ,
ठहरी रहीं रूहें,नए ज़िस्म पाने को ।
....
823
ना यूं गुमान पालिये ।
निगाह अपनों पे भी डालिये ।
मिलती है छांव दरख़तों में ,
शाख़ों को ना काट डालिए ।
........
824
लफ्ज़ लफ्ज़ कुरेद सा रहा ।
यूँ हालात से गुरेज़ सा रहा ।
बदलता रहा ही मायने अपने ,
अल्फ़ाज़ करता फ़रेब सा रहा ।
....विवेक दुबे"निश्चल"@....
825
वो पोषित यौवन, स्वेद सुगंधों से ,
चलता ज़ीवन, ज़ीवन का भार लिए ।
विकट नियति ,चली सतत निरंतर ,
अपने ही न होने का ,आभास लिए ।
......
826
गम की स्याही से , जीवन का आनंद लिखा है ।
भाव लिए जीवन ने, जीवन का छंद लिखा है ।
सुर ताल सरल नही हैं , इस जीवन कविता के ,
छूट गया जो गजलों में,गीतों में वो बंद लिखा है ।
.........
827
लिख न सका जवाब,
उन सवालों के सामने ।
गुम होते गए हालात ,
जो ख़यालों के सामने ।
लेकर चला तौफ़ीक़-ए-हुनर ,
अपने ईमान से ,
होता ही गया लाचार ,
कुछ मिसालों के सामने ।
गढ़ता ही रहा जो उजाले,
अंधेरों से लड़कर ,
चोंधियाती रहीं वो निगाहें ,
उन उजालों के सामने ।
चलता ही चला वक़्त सा,
वक़्त के हालात से ,
ठहर न सका अपनी ही,
निहालों के सामने ।
...विवेक दुबे"निश्चल"@...
तौफ़ीक़/
शक्ति, सामर्थ्य/हिम्मत, हौसला/दैवकृपा।
निहाल/सन्तुष्ट/सफलताएं
..... विवेक दुबे"निश्चल"@..
डायरी 3
तुझे सम्हालना होगा ।
साथ मचलना होगा ।
पाकर खुद को खुद में,
खुद से मिलना होगा ।
... ...
821
जो बदल सके न किसी को ।
तो बदल चल तू खुदी को ।
कर सफ़र मुक़म्मिल अपना ,
मंजिल बना ले रज़ा उसी को ।
... ....
822
आती रहीं बहारें, बहार आने को ।
न बदला असमां,मौसम बिताने को ।
पहनकर लिबास , वो जिस्मों के ,
ठहरी रहीं रूहें,नए ज़िस्म पाने को ।
....
823
ना यूं गुमान पालिये ।
निगाह अपनों पे भी डालिये ।
मिलती है छांव दरख़तों में ,
शाख़ों को ना काट डालिए ।
........
824
लफ्ज़ लफ्ज़ कुरेद सा रहा ।
यूँ हालात से गुरेज़ सा रहा ।
बदलता रहा ही मायने अपने ,
अल्फ़ाज़ करता फ़रेब सा रहा ।
....विवेक दुबे"निश्चल"@....
825
वो पोषित यौवन, स्वेद सुगंधों से ,
चलता ज़ीवन, ज़ीवन का भार लिए ।
विकट नियति ,चली सतत निरंतर ,
अपने ही न होने का ,आभास लिए ।
......
826
गम की स्याही से , जीवन का आनंद लिखा है ।
भाव लिए जीवन ने, जीवन का छंद लिखा है ।
सुर ताल सरल नही हैं , इस जीवन कविता के ,
छूट गया जो गजलों में,गीतों में वो बंद लिखा है ।
.........
827
लिख न सका जवाब,
उन सवालों के सामने ।
गुम होते गए हालात ,
जो ख़यालों के सामने ।
लेकर चला तौफ़ीक़-ए-हुनर ,
अपने ईमान से ,
होता ही गया लाचार ,
कुछ मिसालों के सामने ।
गढ़ता ही रहा जो उजाले,
अंधेरों से लड़कर ,
चोंधियाती रहीं वो निगाहें ,
उन उजालों के सामने ।
चलता ही चला वक़्त सा,
वक़्त के हालात से ,
ठहर न सका अपनी ही,
निहालों के सामने ।
...विवेक दुबे"निश्चल"@...
तौफ़ीक़/
शक्ति, सामर्थ्य/हिम्मत, हौसला/दैवकृपा।
निहाल/सन्तुष्ट/सफलताएं
..... विवेक दुबे"निश्चल"@..
डायरी 3
mमुक्तक 811/819
811
बस निकल चल ।
निगाह फिसल चल ।
खुदगर्ज है दुनियाँ ,
देखता असल चल ।
राह मुड़ी चौराहे पर ,
रास्ते ना बदल चल ।
लुभाते हैं यह नजारे ,
ना ठहर "निश्चल"चल ।
.....
812
हालात से जो हार जाता है ।
वक्त से वो नहीं पार पाता है ।
चला चलता जो अपनी लगन से ,
वो ही तो समय के पार आता है ।
चला चल तू अपनी ही लगन से ,
ये समय ही तो हर बार आता है ।
.......
813
चलते रहे सँग वो दीवाने बहाने से ।
रूह लिए सँग दो जिस्म पुराने से ।
खिलते रहे अश्क़ फ़ूल बनकर ,
मिलकर अपनी ही पहचानों से ।
......
814
साथ चला समय मेरे ,प्रहरी बनकर ।
भोर पहर रात कटी , गहरी बनकर ।
स्वप्न सजे इन , जगती आंखों में ,
आशित कांक्षाओं की, देहरी बनकर ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@.....
बस निकल चल ।
निगाह फिसल चल ।
खुदगर्ज है दुनियाँ ,
देखता असल चल ।
राह मुड़ी चौराहे पर ,
रास्ते ना बदल चल ।
लुभाते हैं यह नजारे ,
ना ठहर "निश्चल"चल ।
.....
812
हालात से जो हार जाता है ।
वक्त से वो नहीं पार पाता है ।
चला चलता जो अपनी लगन से ,
वो ही तो समय के पार आता है ।
चला चल तू अपनी ही लगन से ,
ये समय ही तो हर बार आता है ।
.......
813
चलते रहे सँग वो दीवाने बहाने से ।
रूह लिए सँग दो जिस्म पुराने से ।
खिलते रहे अश्क़ फ़ूल बनकर ,
मिलकर अपनी ही पहचानों से ।
......
814
साथ चला समय मेरे ,प्रहरी बनकर ।
भोर पहर रात कटी , गहरी बनकर ।
स्वप्न सजे इन , जगती आंखों में ,
आशित कांक्षाओं की, देहरी बनकर ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@.....
815
कुछ फैसले कुदरत के ।
मोहताज़ रहे शोहरत के ।
बहता रहा दर्या वक़्त का,
ग़ुम हुये पल मोहलत के ।
......
816
अपने पराये पे गोर न कर ।
जज़्ब इरादों को और न कर ।
बदलती है दुनियाँ हालात से,
साँझ धुंधलके का शोर न कर ।
.......
817
अक़्स तलाशता आदमी ।
निग़ाह सँवारता आदमी ।
इन फ़रेब के आईनों में ,
क्युं सच उभारता आदमी ।
.......
818
एक उम्र ठहर सी रही है ।
ज़िन्दगी निखर सी रही है ।
छुड़ाकर दामन हसरतों का ,
अब चाहतों से डर सी रही है ।
........
819
ज़िस्म ज़ुदा न जान से रहे ।
यूँ रूह तले पहचान से रहे ।
हसरत-ए-जिंदगी की ख़ातिर ,
चाहतों के भी अहसान से रहे ।
... विवेक दुबे "निश्चल"@...
शनिवार, 27 जुलाई 2019
801/810
801
मेरी पहचाने , अब यूँ बदलती सी ।
ज़िस्म पीछे ,परछाइयां चलती सी ।
सीखे जो चलना ,अंगुली पकड़कर ,
उन्ही हाथों से ,जिंदगी सम्हलती सी ।
........
802
लिए हक़ीक़त का अहसास सी ।
ओ माँ तू बड़ी ख़ास ख़ास सी ।
मिलता है सुकूँ तेरे आँचल में ,
तेरी हँसी में सारी कायनात सी ।
......
803
1222×2
तू इतनी रेहमत दे दे ।
वक़्त की बस मोहलत दे दे ।
उठें हैं हाथ दुआ में मेरे ,
अपनो में शोहरत दे दे ।
.......
804
ये ज़िस्म तो बेजान है ।
रूह ही तो पहचान है ।
झूँठी है ये दुनियाँ सारी,
रब ही तो सच्ची शान है ।
.....
805
ज़िस्म-ए-इश्क रहा ,दीवाना सा ।
वो रुह-ए-इश्क़ रहा ,बेगाना सा ।
करता ही रहा सफर, मुसलसल ,
खोजता रहा एक राह मुहाना सा ।
... विवेक दुबे "निश्चल"@.
डायरी 3
मेरी पहचाने , अब यूँ बदलती सी ।
ज़िस्म पीछे ,परछाइयां चलती सी ।
सीखे जो चलना ,अंगुली पकड़कर ,
उन्ही हाथों से ,जिंदगी सम्हलती सी ।
........
802
लिए हक़ीक़त का अहसास सी ।
ओ माँ तू बड़ी ख़ास ख़ास सी ।
मिलता है सुकूँ तेरे आँचल में ,
तेरी हँसी में सारी कायनात सी ।
......
803
1222×2
तू इतनी रेहमत दे दे ।
वक़्त की बस मोहलत दे दे ।
उठें हैं हाथ दुआ में मेरे ,
अपनो में शोहरत दे दे ।
.......
804
ये ज़िस्म तो बेजान है ।
रूह ही तो पहचान है ।
झूँठी है ये दुनियाँ सारी,
रब ही तो सच्ची शान है ।
.....
805
ज़िस्म-ए-इश्क रहा ,दीवाना सा ।
वो रुह-ए-इश्क़ रहा ,बेगाना सा ।
करता ही रहा सफर, मुसलसल ,
खोजता रहा एक राह मुहाना सा ।
... विवेक दुबे "निश्चल"@.
डायरी 3
806
मज़हब बदला मेरे हिंदुस्तान ने ।
देश प्रेम को ले आया ईमान में ।
टूट रही है सरहद जात धर्म की ,
खोज लिया खुदा अपना इंसान में ।
.... ...
807
हे नारी है मान तुम्ही से ।
अभिमान तुम्ही से ।
सृजन कर्ता धरा तुम्ही हो ,
सृष्टि का हर प्रान तुम्ही से ।
.....
808
एक चित्र उभार ले ।
हृदय राम उतार ले ।
सहज सब हो जायेगा ,
प्रीत राम निखार ले ।
.........
809
एक ललक लालसा मन की ।
उस श्याम सलोने दर्पण की ।
मैं रूप निहारु राधिका सा ,
आस लिए मन अर्पण की ।
....
810
तुझे खुशीयाँ मिले जहाँ।
कायनात लेकर चले वहाँ ।
ठहरे हुए वक्त से है हम ,
गुम हो जाएंगे जाने कहाँ ।
... विवेक दुबे"निश्चल"@...
डायरी 3
786/800
786
रुख हवा सा बदल जाते है लोग ।
जुबां कायम से टल जाते है लोग ।
करते है वादे जो अपने ईमान के ,
वादों से वो फिसल जाते है लोग ।
.......
787
घटना घटती है, माटी माटी से छंटती है ।
सृष्टि बनती है, बनकर फिर मिटती है ।
जीव चला जीवन पथ पग धर धीरे धीरे ,
आस लिए दूर क्षितिज पर दृष्टि टिकती है।
..... ...
788
कुछ यूँ अहसान बन गया वो ।
हर बात का ईमान बन गया वो ।
लेकर आया जिसे मैं मेरे घर में ,
बे-वज़ह मेहमान बन गया वो ।
......
789
रोशनीयाँ बर्फ सी पिघलती रही ।
हसरतें हालात से निकलती रही ।
छिटकते रहे उजाले क्षिति कोर से ,
रात भोर दामन में संभलती रही ।
......
790
कुछ ख़्याल खुशनुमा से ।
कुछ रहे अधूरे गुमा से ।
लिपटता ही रहा उजाला ,
उस जलती रही शमा से ।
...."निश्चल"@...
791
तुझे पिघलना होगा ।
अंगारों पे चलना होगा ।
स्वर्णिम आभा दूर क्षितिज पर ,
सूरज सा निकलना ढलना होगा ।
.... ..
792
स्वीकार किया खुद को खुद में
एहसास किया उसको खुद में ।
भेद रहा नहीं कहीं भी कोई ,
जो खोज लिया तुझको खुद में ।
.......
793
समझ जरा तासीर तेरी ।
जिस्म नहीं जागीर तेरी ।
ठहरा एक रात के वास्ते ।
जात है राहगीर तेरी ।
......
794
लिखता रहा सूरत-ए-हाल को ।
पिरो कर हर्फ़ हर्फ़ ख़्याल को ।
खिलती नही सूरत हालात की ,
लपेटे रहा अल्फ़ाज़ मलाल को ।
.... ..
795
छूटता हर किनारा सा रहा ।
खूब यूँ इक सहारा सा रहा ।
"निश्चल" वो सितारा आसमाँ पे ,
दूर निगाहों से दुलारा सा रहा ।
..... विवेक दुबे "निश्चल"@....
डायरी 3
796
यह आवारगीयाँ मेरी ।
यह यलगारगीयाँ मेरी ।
करतीं रहीं गुस्ताखियाँ,
वक़्त से नादानियाँ मेरी।
.... ....
797
जो ख़ामोश सा रहता गया ।
वो सब कुछ कहता गया ।
चलता ही रहा सफ़र में ,
हालात ख़म सहता गया ।
(घुमाव)
...
798
लुटता लुटाता रहा निग़ाहों से,
ज़ज्ब खुशियाँ कूटता गया ।
न रहा बाँकी कही कुछ ,
मौन ही पीछे छूटता गया ।
........
799
हया से हारती हसरतें ।
निग़ाह से पुकारती हसरतें ।
उठकर मौजों के समंदर से ,
साहिल को दुलारती हसरतें ।
.... ...
800
तय नही है कुछ भी,
जीवन में जीवन का ।
उड़ता पंछी पिंजरे में ,
आकाश लिए मन का ।
...... विवेक दुबे"निश्चल"@..…
डायरी 3
रुख हवा सा बदल जाते है लोग ।
जुबां कायम से टल जाते है लोग ।
करते है वादे जो अपने ईमान के ,
वादों से वो फिसल जाते है लोग ।
.......
787
घटना घटती है, माटी माटी से छंटती है ।
सृष्टि बनती है, बनकर फिर मिटती है ।
जीव चला जीवन पथ पग धर धीरे धीरे ,
आस लिए दूर क्षितिज पर दृष्टि टिकती है।
..... ...
788
कुछ यूँ अहसान बन गया वो ।
हर बात का ईमान बन गया वो ।
लेकर आया जिसे मैं मेरे घर में ,
बे-वज़ह मेहमान बन गया वो ।
......
789
रोशनीयाँ बर्फ सी पिघलती रही ।
हसरतें हालात से निकलती रही ।
छिटकते रहे उजाले क्षिति कोर से ,
रात भोर दामन में संभलती रही ।
......
790
कुछ ख़्याल खुशनुमा से ।
कुछ रहे अधूरे गुमा से ।
लिपटता ही रहा उजाला ,
उस जलती रही शमा से ।
...."निश्चल"@...
791
तुझे पिघलना होगा ।
अंगारों पे चलना होगा ।
स्वर्णिम आभा दूर क्षितिज पर ,
सूरज सा निकलना ढलना होगा ।
.... ..
792
स्वीकार किया खुद को खुद में
एहसास किया उसको खुद में ।
भेद रहा नहीं कहीं भी कोई ,
जो खोज लिया तुझको खुद में ।
.......
793
समझ जरा तासीर तेरी ।
जिस्म नहीं जागीर तेरी ।
ठहरा एक रात के वास्ते ।
जात है राहगीर तेरी ।
......
794
लिखता रहा सूरत-ए-हाल को ।
पिरो कर हर्फ़ हर्फ़ ख़्याल को ।
खिलती नही सूरत हालात की ,
लपेटे रहा अल्फ़ाज़ मलाल को ।
.... ..
795
छूटता हर किनारा सा रहा ।
खूब यूँ इक सहारा सा रहा ।
"निश्चल" वो सितारा आसमाँ पे ,
दूर निगाहों से दुलारा सा रहा ।
..... विवेक दुबे "निश्चल"@....
डायरी 3
796
यह आवारगीयाँ मेरी ।
यह यलगारगीयाँ मेरी ।
करतीं रहीं गुस्ताखियाँ,
वक़्त से नादानियाँ मेरी।
.... ....
797
जो ख़ामोश सा रहता गया ।
वो सब कुछ कहता गया ।
चलता ही रहा सफ़र में ,
हालात ख़म सहता गया ।
(घुमाव)
...
798
लुटता लुटाता रहा निग़ाहों से,
ज़ज्ब खुशियाँ कूटता गया ।
न रहा बाँकी कही कुछ ,
मौन ही पीछे छूटता गया ।
........
799
हया से हारती हसरतें ।
निग़ाह से पुकारती हसरतें ।
उठकर मौजों के समंदर से ,
साहिल को दुलारती हसरतें ।
.... ...
800
तय नही है कुछ भी,
जीवन में जीवन का ।
उड़ता पंछी पिंजरे में ,
आकाश लिए मन का ।
...... विवेक दुबे"निश्चल"@..…
डायरी 3
782/785
782
वो लब्बोलुआब बता न सका ।
हुस्न-ओ-हिज़ाब उठा न सका ।
होती गई स्याह सुरमई शाम भी ,
चाँद रात का दामन हटा न सका ।
......
सारांश
....
वो इल्म क्यूँ भार सा रहा ।
वो हुनर से ही हारता रहा ।
क़तरे थे आब के आँखों मे ,
वो खमोश नज़्र निहारता रहा ।
..... ...
783
धोके से धोखा खाता रहा ।
तंज जमाने के पाता रहा ।
न बदल सका फ़ितरत अपनी,
इल्म दुनियाँ पे लुटाता रहा ।
... ..
784
बदलता गया मैं हालात सा ।
वक़्त से वक़्त के साथ सा ।
एक चाँद सा चला आसमां पे ,
शबनम का लिए अहसास सा ।
... ...
785
वो सच कहाँ था ,जो सच कहा था ।
मेरे ही रहबर ने,मुझको ही ठगा था ।
पढ़ता रहा जो क़सीदे शान में मेरी ,
लफ्ज़ लफ्ज़ जिनमे भरा दगा था ।
.....विवेक दुबे"निश्चल"@.....
डायरी 3
वो लब्बोलुआब बता न सका ।
हुस्न-ओ-हिज़ाब उठा न सका ।
होती गई स्याह सुरमई शाम भी ,
चाँद रात का दामन हटा न सका ।
......
सारांश
....
वो इल्म क्यूँ भार सा रहा ।
वो हुनर से ही हारता रहा ।
क़तरे थे आब के आँखों मे ,
वो खमोश नज़्र निहारता रहा ।
..... ...
783
धोके से धोखा खाता रहा ।
तंज जमाने के पाता रहा ।
न बदल सका फ़ितरत अपनी,
इल्म दुनियाँ पे लुटाता रहा ।
... ..
784
बदलता गया मैं हालात सा ।
वक़्त से वक़्त के साथ सा ।
एक चाँद सा चला आसमां पे ,
शबनम का लिए अहसास सा ।
... ...
785
वो सच कहाँ था ,जो सच कहा था ।
मेरे ही रहबर ने,मुझको ही ठगा था ।
पढ़ता रहा जो क़सीदे शान में मेरी ,
लफ्ज़ लफ्ज़ जिनमे भरा दगा था ।
.....विवेक दुबे"निश्चल"@.....
डायरी 3
778/781
778
वो रुका रुका सा रहा ।
हर्फ़ हर्फ़ लिखा सा रहा ।
क्यूँ धरती की चाहत में ,
वो आसमां झुका सा रहा ।
....
779
मैं पूछ बैठा चाहतें उसकी ,
वो गुजरा वक़्त चाहता रहा ।
मैं देखता रहा आदतें उसकी ,
वो हसरतों से ही हारता रहा ।
..... ....
780
अल्फ़ाज़ दख़ल डालता रहा ।
जिंदगी में ख़लल डालता रहा ।
ज़ज्बात भरे मासूम रिश्तों में ,
सूरत अस्ल नक़ल डालता रहा।
... ....
781
मुक़द्दर से मुक़द्दर बदलता रहा ।
साथ लिये मुक़द्दर यूँ चलता रहा ।
चढ़ता रहा सीढ़ियां हसरतों की ।
चाहत-ए-दर बंद सा मिलता रहा ।
........विवेक दुबे"निश्चल"@..
डायरी 3
वो रुका रुका सा रहा ।
हर्फ़ हर्फ़ लिखा सा रहा ।
क्यूँ धरती की चाहत में ,
वो आसमां झुका सा रहा ।
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779
मैं पूछ बैठा चाहतें उसकी ,
वो गुजरा वक़्त चाहता रहा ।
मैं देखता रहा आदतें उसकी ,
वो हसरतों से ही हारता रहा ।
..... ....
780
अल्फ़ाज़ दख़ल डालता रहा ।
जिंदगी में ख़लल डालता रहा ।
ज़ज्बात भरे मासूम रिश्तों में ,
सूरत अस्ल नक़ल डालता रहा।
... ....
781
मुक़द्दर से मुक़द्दर बदलता रहा ।
साथ लिये मुक़द्दर यूँ चलता रहा ।
चढ़ता रहा सीढ़ियां हसरतों की ।
चाहत-ए-दर बंद सा मिलता रहा ।
........विवेक दुबे"निश्चल"@..
डायरी 3
774/777
774
आइनों में नुक़्स निकाले न गये ।
ऐब हमसे कभी सम्हाले न गये ।
कहते रहे हर बात बे-वाकी से ,
इल्ज़ाम बे-बजह उछाले न गये ।
..... .
775
आती सी ही रहीं बहारें , बहारों से ।
न बदला असमां,मौसम नजारों से ।
पहनकर लिबास , वो जिस्मों के ,
ठहरी रहीं रूहें,नए ज़िस्म दारों से ।
......
776
मिटते रहे निशां निशानों से ।
बहते रहे दर्या अरमानों से ।
रुत बदलते ही रहे मौसम ,
लाते रहे बहारें दीवानों से ।
....
777
तलाश को तलाश की तलाश सी ।
ज़िन्दगी नही फिर भी उदास सी ।
चलती रही मुसलसल सफ़र पर ,
लगाती रही हालात-ए-कयास सी ।
... विवेक दुबे"निश्चल"@.....
डायरी 3
आइनों में नुक़्स निकाले न गये ।
ऐब हमसे कभी सम्हाले न गये ।
कहते रहे हर बात बे-वाकी से ,
इल्ज़ाम बे-बजह उछाले न गये ।
..... .
775
आती सी ही रहीं बहारें , बहारों से ।
न बदला असमां,मौसम नजारों से ।
पहनकर लिबास , वो जिस्मों के ,
ठहरी रहीं रूहें,नए ज़िस्म दारों से ।
......
776
मिटते रहे निशां निशानों से ।
बहते रहे दर्या अरमानों से ।
रुत बदलते ही रहे मौसम ,
लाते रहे बहारें दीवानों से ।
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777
तलाश को तलाश की तलाश सी ।
ज़िन्दगी नही फिर भी उदास सी ।
चलती रही मुसलसल सफ़र पर ,
लगाती रही हालात-ए-कयास सी ।
... विवेक दुबे"निश्चल"@.....
डायरी 3
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कलम चलती है शब्द जागते हैं।
सम्मान पत्र
मान मिला सम्मान मिला। अपनो में स्थान मिला । खिली कलम कमल सी, शब्दों को स्वाभिमान मिला। मेरी यूँ आदतें आदत बनती गई । शब्द जागते...






















