रविवार, 18 मार्च 2018

नव सम्बतसर


 रवि आया नव भोर का , 
   बिखेर धबल प्रकाश ।
 पुलकित मन सुधा धरा ,  
  श्रंगारित तन आज ।
 पथ भृमण और सोर का , 
  धरा पूर्ण करे आज ।
 नियम सृष्टि के पाथ का , 
  चली सतत  निभाय ।

  अभिनन्दन नव सोर का , 
   माँ शक्ति के वंदन गए ।
   जयकारा आदि शक्ति का ,
   जग जननी लाज बचाए ।

 आया नव सूरज नव भोर का 
 बीता एक वर्ष और सोर का ।
  .... *विवेक दुबे"निश्चल"@...

       . *नव वर्ष संवत २०७५*


चैत्र प्रतिपदा


चैत्र प्रतिपदा फिर आई है ।
धरा फूली नही समाई है ।

 झूम उठीं फसलें सब ,
 अमियाँ भी बौराई है ।

 सोर भृमण पूर्ण फिर 
 वसुंधरा कर आई है ।

 घटती उम्रों के सँग ,
 तरुणाई ली अँगड़ाई है ।

 आर्यवर्त की समृद्ध परंपरा ,
 याद आज हमे फिर आई है ।
    .... विवेक दुबे"निश्चल"@..

         नव वर्ष संवत २०७५
  चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की शुभकामनाऐं
  .... विवेक दुबे"निश्चल"@...

वो ख़्वाब-ओ-ख़्याल

वो ख़्वाब-ओ-ख़्याल हैं ।
 मुझे नही कोई मलाल है ।
 
        जीता हूँ ज़िन्दगी तेरे लिए,
         मुझे तेरा ही तो ख़्याल है । 

 यहाँ रौशनी की मिसाल है।
 यहाँ स्याह भी बे-मिसाल है।

        ज़िन्दगी की कशमकश में,
         रंज-ओ-ग़म हुए गुलाल हैं। 

  मुझे चाहतों की खातिर,
 चाहतों का न मलाल है। 

          चलता ख़ामोश राह पर,
          मंजिल भी बे-ख़्याल है ।

..... विवेक दुबे"निश्चल"@..

कलम चलती रही

  कलम चलती रही वक़्त से मेरे साथ ।
   अल्फ़ाज़ सजते रहे बन मेरे ज़ज़्बात ।

   सींचता जिन्हें रहा अश्क़ों से बार बार ,
   निकले खुशियों के तो कभी ज़ार ज़ार।

  सजा गईं रंगीन     दिल की किताब ,
   मेरा हर शफा      यूँ हुआ दाग दार ।
          ...विवेक दुबे"निश्चल"@.....

ख़्वाबों सँग सजती रजनी

ख़्वाबों सँग सजती रजनी ।
 यादों सँग   फबती रजनी ।

           दूर सुबह ले      चलती रजनी ।
           साँझ तले फिर मिलती रजनी ।

  बिछुड़ी फिर मिलती रजनी ,
  स्वप्न सलोने   गढ़ती रजनी । 

 पल पल रंग बदलती रजनी ।
 छलती बस    छलती रजनी ।

     आशाओं से        पलती रजनी ।
     अभिलाषाओं से पलटी रजनी ।

 .... विवेक दुबे "निश्चल"@..

ज़िंदगी बस इतनी सी कहानी है

  ज़िंदगी  बस इतनी सी    कहानी है ।
  सफर में मौत भी       एक रवानी है । 
  होता रुख़सत    मौजों को छोड़कर,
  रहती फिर भी    मौजों में रवानी है ।

  प्यासा रिंद अभी,रूठ जाती साक़ी है।
 ज़िंदगी के हाथों से ज़िंदगी जाती है। 
  मदहोश नही ज़िंदगी साक़ी अभी  ।
 रिंद-ऐ-ज़िंदगी प्यास अभी बाँकी है। 

 .... विवेक दुबे"निश्चल"@.....

बदल दे तू हालात को

  ले चल सबके साथ को ।
 न भुला अपने आप को ।
        दिखता जो वो होता नही ,
        याद रख अपने आप को ।

 न सोच के पीछे     तू चलेगा ।
 जमाने की निग़ाह से छुपेगा।
          ला खींच     खुद से खुद को ।
          सामने ला तू अपने आप को । 

 न हारना हौंसले    तू कभी ,
 तू जीत अपने विश्वास को ।

         हाथों में हैं हर हालात तेरे ,
         बदल दे तू हर हालत को ।

 ..... विवेक दुबे "निश्चल"@...

शब्द हैं पर भाव नही

शब्द हैं पर  भाव नहीं ।
बाते हैं पर विचार नहीं ।

      घर हैं पर परिवार नहीं ।
      अपने हैं पर दुलार नहीं ।

दिल है पर      द्वार नहीं ।
देश है पर पहरेदार नहीं ।

          इंसानो की इस बस्ती में ,
           इंसानियत कही खो गई ।

थक हार कर    बेचारी,
कही धूप में ही सो गई ।

.......विवेक दुबे "निश्चल"@....

नैतिकता

 नैतिकता पढ़ी कभी     किताबों में ।
  मिलती नही कहीं       बाज़ारों में ।
  सुनते आए किस्से बड़े  सयानों से ,
  यह मिलती घर आँगन चौवारों में ।
  .
   आँगन बँटते अब दीवारों से ।
   नाते चलते अब   व्यपारों से ।
    रिस्तें छूट रहे हैं   दीनारों में ,
    टूटा नाता अब    चौवारों से ।

 नैतिकता रही    आज किताबो में ।
 मिलती नही घर आँगन चौवारों में ।

 ....विवेक दुबे"निश्चल"@...
  

गैरो की ख़ातिर


काटेगा वो क्या फसल प्यार की ।
 बीज नफ़रत का जिसने बोया है ।

       गैरों की ख़ातिर अक्सर हमने,
       अपनो को ही तो खोया है । 

 बिलिदानों की बलि बेदी पर ,
 बस लाल माँ ने ही खोया है ।

       थामे लाठी कौन बने सहारा ,
       बूढ़ा बाप सोच सोच रोया है ।

   जगता प्रहरी जो रात भर  ,
   वो भी भोर भए सोया है ।

       जो खाता कसमें देश प्रेम की ,
      वो तो बस भूखा ही सोया है । 

 नाम नही उस दाने पर उसका ,
 दाना गर्भ धरा जिसने बोया है ।

          गैरो की ख़ातिर अक्सर हमने।

... विवेक दुबे"निश्चल"@..

 Blog post 18/3/18

काल क्रम

समय की वेदना यही , 
कहा गया जो वही सही ।

        कसते आज कसौटी पर,
        अतीत निकाल कर ।

 गुजर गया वो स्याह ,
  सुनहला सा था कल  ,

             आता है हर आज ,
             कल से निकल कर ।


 छोड़ता आज कल को,
  देख आते कल को ।

              छोड़ता नही कभी,
              समय इस क्रम को ।

   रहा अब आज  ,
  बहुत कुछ बदल है ।

             सतत रहता गतिमान ,
             बस काल क्रम तो ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@...

उम्र जुड़ रही


उम्र जुड़ रही तारीखों में ।
 निशां छोड़ रही रुख़सारों पे ।
 दर्ज हुए हिसाब निगाहों में ।
 छूटे कुछ गुजरी जीवन रहो में ।

 उम्र-ऐ-रौनक रुकने नही देती ।
 बकाया कोई रखने नही देतीं ।
 कर चल हर हिसाब तरीके से ,
 गुजरे यह ज़िंदगी सलीके से ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@.....
Blog post 18/3/18

संग दिल नही

निग़ाह तंग हूँ मगर तंग दिल नही ।
 हाँ संग हूँ मैं मगर संग दिल नही ।

मेरी खामोशी , ही भाती रही दुनियाँ को ।
जुवां खोली के जमाना, रुस्वा होता गया।

 फूल सा, खिला भी तो था मैं मगर ,
 रौंद कर मुझे , कारवां गुजरता गया । 

 मंजिलें अक्सर , सामने आती रही मेरे  ,
 चलते ही रास्ता , कहीं और मुड़ता गया ।

 मैं मायूस नही , दुनियाँ के रिवाज़ से ,
 मैं रिवाज़ दुनियाँ में , न ढ़लता गया ।

 था चेन ज़ख्म को , झूँठ के मरहम से। 
 मरहम सच,  ज़ख्म हरे करता गया । 

 मैं चुप हूँ  , आज भी यह सोचकर ,
 रास्ता मुड़ता गया , सफर कटता गया ।

देखता हूँ दुनियाँ ,दुनियाँ की निगाह से । 
 पिघलता है दिल, मोम सा ज़ज्बात से ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@..

मेरी साँझ

दुआओं में कोई रंग नही।
 मैं मगर दिल तंग नही।
  रोज सींचता हूँ , 
 ज़ज़्बात से जिन्हें ।
 होते ही कुबूल  ,
  रंग मिलेगा इन्हें ।
 मैं रहूँ न रहूँ ,
 कोई बात नही ।
  दुआओं की रोशनी से,
 चमकेगी तेरी राह नई ।
 रोशन रहेगा तू ,
तेरी ख़ातिर जमाने में।
 हो रही साँझ ,
 अब मेरी नई नई ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"...

कलम चलती है शब्द जागते हैं।

सम्मान पत्र

  मान मिला सम्मान मिला।  अपनो में स्थान मिला ।  खिली कलम कमल सी,  शब्दों को स्वाभिमान मिला। मेरी यूँ आदतें आदत बनती गई ।  शब्द जागते...