गुरुवार, 13 दिसंबर 2018

एक पहचान की चाह में ,

दिल यूँ कुछ भटके से ।
ख़्याल बीच अटके से ।

      बे-पार रहे ख़यालों के ,
      चाहत से ही लिपटे से ।
...
लब बार बार रुकते से ।
नज़्र निग़ाह झुकते से ।

        उलझ निग़ाह चाहत में ,
        खुद खुद को चुभते से ।
...
बदन सँग मन लिपटे से ।
तन बदन वो सिमटे से ।

      एक पहचान की चाह में ,
      दिखकर भी न दिखते से ।

    .... विवेक दुबे"निश्चल"@..
सद्गुरु
डायरी 6(63)

सोमवार, 10 दिसंबर 2018

"निश्चल" चले सच साथ लेकर ,


मजबूत इरादे कहीं रुकते नही है ।
तूफ़ां के आंगे कभी झुकते नही है ।

प्रण ले जो प्राण से करके रहेंगे ,
हिमगिर भी सामने टिकते नहीं है ।

चल पड़े जो दृण संकल्प लेकर ,
छूकर आसमां भी थकते नही है ।

टकराते है आँधियों से हँसकर ,
हारकर कभी पीछे हटते नहीं है ।

बढ़ते है चीरकर समंदर का सीना ,
उफनाती लहरों से कटते नही है ।

करते नही ईमान का सौदा कभी ,
इस झूँठी दुनियाँ से लुटते नही है ।

 "निश्चल" चले सच साथ लेकर ,
  दुनियाँ को झूँठ से ठगते नही है ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@....
डायरी 6(62)

ये परिवर्तन क्या है ?

ये परिवर्तन क्या है ?
बस दृश्य बदलते है ।

बदले हुए मोहरे भी ,
चाल नही बदलते है ।

पिटते प्यादे मोहरों से ,
बजीर नही हिलते है ।

ढाई चाल की ऐड़ लगी ,
शह से प्यादे पिटते है ।

ये परिवर्तन क्या है ?
बस दृश्य बदलते है ।

... विवेक दुबे"निश्चल"@...

मत देने से मत पाता ।
तो मैं भी मत दे आता ।

छिनते सारे मत जिससे ,
फिर मैं कैसा मत दाता ।

... निश्चल..

लिखते रहे सब तक़दीर हमारी ।
कहते रहे , तुम, जागीर हमारी ।
घिस पिसते रहे दो पाटों में ,
समझे नही कोई पीर हमारी ।

बचपन आया योवन तन में ,
काम नही डिग्री की लाचारी ।
प्रौढ़ हुए युवा समय से पहले ,
रोजी की चिंता सिर पे भारी ।

सर्द खड़ा है खेतों में वो ,
लागत की वर्षा होती भारी ।
दे आया उनके दामों में धन ,
मालामाल माया के पुजारी ।

कहते है वो बड़ी शान से ,
अपने वादों में सत्ताधारी ।
बेठाओ तुम हमे कुर्सी पर ,
कर देंगे हम भर झोली भारी ।

बांट रहे है माल-ए-मुफ्त ,
सब के सब ही बारी बारी ।
काम नही पर हाथों में ,
बढ़ती है हाथों की बेकारी ।

कुछ दिन की कतरन है ,
रातो का योवन भारी ।
सब रीते से बर्तन है ,
रीत गये दिन खाली ।

... विवेक दुबे"निश्चल"@....
डायरी 6(62)

ये कैसी कहानी है ।


ये कैसी कहानी है ।
आंखों का पानी है ।

      ख़ुश्क रहा कोर में ,
      वो इतनी निशानी है ।

रूठते नही रुठकर ,
जो आदत पुरानी है ।

      मिलती रही हँसकर ,
      ये दुनियाँ दीवानी है ।

ठहर जरा क्षण को ,
 ये रात भी सुहानी है ।

         भोर मिले चलना ,
         रात तो बितानी है ।

 "निश्चल" सहज हर पल को,
  ये जिंदगी आनी जानी है ।

... विवेक दुबे"निश्चल"@....
डायरी 6(61)

कुदरत के ये सन्नाटे ,

कुदरत के ये सन्नाटे ,
 पग मौन चुभे कांटे ।

तपती सी ये धरती ,
 बस प्यास उसे बांटे ।

चलता शुष्क कंठ लिये ,
नभ नीर जहाँ बांटे ।

रहा आश्रयहीन सा वो ,
प्रश्न यही रात कहाँ काटे ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@..

तुझे मिले कुछ ऊंचा असमां से ।
हो जुदा कुछ जो इस जहां से ।

एक पहचान हो कल अपनी ,
अपने ही छोड़े कदम निशां से ।

उठते रहे हाथ हरदम ही मेरे ,
हर दुआ में मेरे इस दुआ से ।

... विवेक दुबे"निश्चल"@....

डायरी 6(60)

असरात लिखा करता हूँ ।

1
हालात लिखा करता हूँ ।
       असरात लिखा करता हूँ ।

बिखेरकर अल्फ़ाज़ अपने ,
         ज़ज्बात लिखा करता हूँ ।
.----2
जूझता रहा मैं ,
               हालात के हादसों से ।

गुजरता रहा मैं ,
             वक़्त के रास्तों से ।

कहाँ किसे कहुँ ,
           मैं मंजिल अपनी ,

बा-वास्ता रहा मैं ,
          खुदगर्ज वास्तो से ।
-----3
लिखता रहा खत,
            ख़्वाब ख़यालों से ।

पैगाम-ए-इश्क़ ,
         जिंदगी के सवालों से ।

पलटता रहा मैं ,
            जिल्द किताबों की ,

मिलते नही होंसलें ,
             कुछ मिसालों से ।
-----4
 वक़्त बड़ा कमज़र्फ हुआ है ।
           जफ़ा भरा हर्फ़ हर्फ़ हुआ है ।

  घुट रहे है अरमान सीनों में ,
            ये सर्द दर्द अब वर्फ़ हुआ है ।
---5
आँख मूंदने से रात नही होती ।
        झूंठे की कोई साख नही होती ।

 उड़ान कितनी भी हो ऊँची ,
          आसमान में सुराख नही होती ।
---6
कुछ कतरन है दिन की ।
           रीते रीते से बर्तन सी ।

रीत रहे दिन खाली खाली ,
           रातों है उतरे यौवन सी ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@..

डायरी 6(59)

जफ़ा/ जुल्म 
कमज़र्फ/ ओछा /कमीना

   

भाषा की परिभाषा में ।

शब्दों की अभिलाषा में ।
भाषा की परिभाषा में ।

खोज रहा मन , गुपचुप ,
कुछ अर्थ पिपासा में ।

लय घुटता कुछ रुकता है ,
डूब रहा राग निराशा में ।

प्रणय गीत गाता फिर भी ,
मधुर मिलन की आशा में ।

भाव भरे है , गीत मेरे ,
सरगम का हरदम प्यासा मैं ।

खनकेंगे सुर भी साथ मेरे ,
रहता मन मन की दिलाशा में ।

गहन निशा के आँचल से ,
उठता भोर तले, उबासा मैं ।

मौन लिए मन,मन के भीतर ,
गढ़ चलता भाव सहासा मैं ।

शब्दों की अभिलाषा में ।
भाषा की परिभाषा में ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@..
डायरी 6(57)

ऐसा कोई मुक़ा ढूंढते है ।

वो जमीं वो गली वो मकां ढूंढते है ।
जो हो यहीं कहीं वो जहां ढूंढते है ।

टकराती साहिल से बेख़ौफ बेझिझक ,
मचलती उस मौज की दास्तां ढूंढते है ।

लफ्ज़ ख़ामोश ख़यालों की ख़ातिर ,
उस ज़ीस्त रूह की जुबां ढूंढते हैं ।

जलते गुलिस्तां नफ़रत की आग में ,
निग़ाह आब की कोई अना ढूंढते है ।

 सींचे चाहत-ए-आब से गुल को ,
 गुलशन का कोई बागवां ढूंढते है ।

लूटते है दरिया साहिल को ,
मौज मैं किनारे वफ़ा ढूंढते है ।

करते रहे सफ़र सफर की खातिर ,
छूटते क़दमो के निशां ढूंढते है ।

पता मिले मंज़िल का जिस जगह पे,
चल"निश्चल" ऐसा कोई मुक़ा ढूंढते है ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@....
डायरी 6(58)
अना/अहमं

रविवार, 9 दिसंबर 2018

एक ठहरा हुआ असर सा






 एक ठहरा हुआ असर सा ।
 भागते से , इस शहर सा ।

 कुछ जीतने की चाहत में ,
 चाहतों पे , एक कहर सा ।

  वक़्त का कुछ कर्ज़  सा ।
  रहा कही क्यों फ़र्ज़  सा ।

  बदलता ही रहा हर घड़ी ,
  बस रहा इतना ही हर्ज़ सा

.... विवेक दुबे"निश्चल"@..
Blog post 9/12/18



सोमवार, 3 दिसंबर 2018

इतना ही कर्ज़ रहा ।

इतना ही कर्ज़ रहा ।
के मैं बे-अर्ज़ रहा ।

      निभाता रहा रिश्ते ,
      यह मेरा फ़र्ज रहा ।
.. 
बदलता रहा तासीर ,
यह कैसा मर्ज़ रहा ।

       आया नही नज़र जो ,
       अश्क़ निग़ाह दर्ज रहा ।

हर ख़ुशी की ख़ातिर ,
हंसता एक दर्द रहा ।

  हर एक मुब्तसिम लब ,
  असर बड़ा सर्द रहा ।

... विवेक दुबे"निश्चल"@...

तबस्सुम/मुब्तसिम/मुस्कान
डायरी 6(55)

महदूद रहे कुछ ख़्याल ख़्वाब से ।

महदूद रहे कुछ ख़्याल ख़्वाब से ।
लिपटे रहे अल्फ़ाज़ किताब से ।

सिमेटकर हाल लफ्ज़ अपना ,
सुनते रहे हर सवाल अदाब से ।

उठेगी नज़र नज़्म दाद की खातिर ,
मजबूर रही मगर जुबां ज़वाब से ।

कहने को बहुत कुछ रहा पास मेरे ,
कहते रहे गज़ल पर वो बड़े रुआब से ।

अल्फ़ाज़ में सवाल जो करती रही ,
सिमटी रही निग़ाह वो नक़ाब से ।

रहे लफ्ज़ जवां ग़जल की खातिर ,
रही दूर एक नज़्म मगर शवाब से ।

महदूद रहे कुछ ख़्याल ख़्वाब से ।
लिपटे रहे अल्फ़ाज़ किताब से ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@...

(महदूद-सीमित)
डायरी 6(54)




रजः को रजः पे सोना है ।

 सबकी अपनी अपनी व्यथा है ।
ये जीवन एक तार्किक कथा है ।

    रिक्त रहा कुछ मन मौन धरा है ।
    एक तन उजला व्योम भरा है ।

रंग रंग से हर रंग सटा है ।
जीवन रंगों की रंगीन लता है ।

    है रंग अधूरी कही कोई छटा है । 
    हम जाने कैसे कौन रंग घटा है ।

कब कुछ क्या होता है ।
कुछ क्या कब होना है ।

छूट रहे कुछ प्रश्नों में ,
एक प्रश्न यही संजोना है ।

गूढ़ नही कही कुछ कोई ,
रजः को रजः पे सोना है ।

... विवेक दुबे"निश्चल"@..

डायरी 6(53)

अल्फ़ाज़ के रहे यूँ असर ।

 अल्फ़ाज़ के रहे यूँ असर ।
  मायने रहे क्युं बे-असर ।

     रात सर्द स्याह असरात की ,
    होती नही क्युं अब सहर ।

छोड़कर बुनियाद अपनी ,
मकां आज क्युं रहे बिखर ।

     चलते रहे एक राह पर ,
     रहे रिश्ते पर तितर बितर ।


....विवेक दुबे"निश्चल"@....
डायरी 6(51)

दो नयन मिलें हो , जब दर्पन से ।

 कुछ तो रस निकले,  उस मंथन से ।
 शब्द चुने है जो मन ,  अन्तर्मन से ।

 एक मुस्कान खिले , उन अधरों पर ,
 दो नयन मिलें हो  ,   जब दर्पन से ।
..--------
  मन रिक्त रहे न , कुछ मौन से ।
  कुछ ताने न हों , उजले व्योम से 

  रंग रहें नही अधूरे , कुछ वानो के ,
  न सोचे हम , रंग भरें अब कौन से ।
...-------
 हमे मिले कुछ ऊंचा , असमान से ।
 हो जुदा कुछ जो , इस जहान से ।

एक पहचान हो , कल अपनी ,
अपने ही छोड़े , कदम निशान से ।

उठते रहे हाथ , हरदम ही शान से ,
हर दुआ में मेरे  , इस ईमान  से ।

... विवेक दुबे"निश्चल"@..




रिक्त रहे कुछ मन मौन से ।
एक ताने उजले व्योम से ।

हैं रंग अधूरे कुछ वाने के ,
मैं रंग भरूँ अब कौन से । 
.


कलम चलती है शब्द जागते हैं।

सम्मान पत्र

  मान मिला सम्मान मिला।  अपनो में स्थान मिला ।  खिली कलम कमल सी,  शब्दों को स्वाभिमान मिला। मेरी यूँ आदतें आदत बनती गई ।  शब्द जागते...