गुरुवार, 13 दिसंबर 2018

समझ न सकोगे ।

मेरे सवालों को समझ न सकोगे ।
चलोगे साथ मेरे बस तुम थकोगे ।

कभी करती नही सवाल ये जिंदगी ,
इस बे-सबाल को तुम क्या कहोगे ।

 ये फासला खड़ा है तुझमे मुझमे ,
 दूर रहकर भी तुम दूर न रहोगे ।

बेकार ही रहा सफ़र तुझ सँग ,
बात एक दिन यह तुम कहोगे ।

.... विवेक दुबे "निश्चल"@..
डायरी 6(68)

किस को आना है ।

किस को आना है ।
किस को जाना है ।

बस एक प्रश्न यही ,
करता रहा दिवाना है ।

राह चले सब अपनी ,
सबका एक ठिकाना है ।

बीत रहे पल पल में ,
पल को यही बताना है ।

चलकर भी न पहुचें ,
 पर सफर सुहाना है 

"निश्चल" रहे हर दम ,
समय यहीं बिताना है ।

... विवेक दुबे"निश्चल"@...

 हम रीत राग में उलझे है ।
 कहते फिर भी सुलझे है ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@..

डायरी 6(67)
Blog post 13/12/18

अपनो के दुलारों से ।

चलो साथ किनारों पे ।
 अपनो के दुलारों से ।

 पार हुआ हर दरिया ,
 तिनको से सहारों से ।
 ..
 सँग मिला दिन भर ,
 ताप मिले नजारों से ।

 साँझ ढ़ले घर लौटें ,
अपनी सी पुकारो से ।

जीवन की बगियाँ में ,
पुष्प यहीं बहारों से ।

खोज रहे है गुपचुप ,
तन मन के इशारों से ।

चलो साथ किनारों पे ।
 अपनो के दुलारों से ।

... विवेक दुबे"निश्चल"@...

डायरी 6(66)
Blog post 13/12/18

रातों का योवन उतरता सा ।

मन से मन को भरता सा।
घट पर घट सा धरता सा।

बीत रहा समय यहाँ भी ।
ये वक़्त कहाँ ठहरता सा।

 मन क्यों मन को हरता सा ।
 तन क्यों मन का करता सा ।

 दृष्ट सदा सत्य नही रहा है ,
 नीर नयन रहा पहरता सा ।

  दिन दिन को कतरता सा।
  रीते बर्तन से बिखरता सा ।

 बीत रहे दिन खाली खाली ,
 रातों का योवन उतरता सा ।

मन से मन को भरता सा।
घट पर घट सा धरता सा।

 .... विवेक दुबे"निश्चल"@..

डायरी 6(65)
Blog post 13/12/18



तुझे देखकर भी न देखते रहे ।

दिल यूँ कुछ भटकते रहे ।
ख़्याल बीच अटकते रहे ।

न जा सके पार ख़यालों के ,
ख़्याल से ही लिपटते रहे ।
...
हम बार बार रोकते रहे ।
नज़्र निग़ाह से टोकते रहे ।

उलझकर निग़ाह की चाह में ,
हम खुद खुद को कोसते रहे ।
...
 मन सँग बदन लपेटते रहे ।
तन बदन को समेटते रहे ।

एक पहचान की चाहत में ,
तुझे देखकर भी न देखते रहे ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@..
सद्गुरु
डायरी 6(64)

एक पहचान की चाह में ,

दिल यूँ कुछ भटके से ।
ख़्याल बीच अटके से ।

      बे-पार रहे ख़यालों के ,
      चाहत से ही लिपटे से ।
...
लब बार बार रुकते से ।
नज़्र निग़ाह झुकते से ।

        उलझ निग़ाह चाहत में ,
        खुद खुद को चुभते से ।
...
बदन सँग मन लिपटे से ।
तन बदन वो सिमटे से ।

      एक पहचान की चाह में ,
      दिखकर भी न दिखते से ।

    .... विवेक दुबे"निश्चल"@..
सद्गुरु
डायरी 6(63)

सोमवार, 10 दिसंबर 2018

"निश्चल" चले सच साथ लेकर ,


मजबूत इरादे कहीं रुकते नही है ।
तूफ़ां के आंगे कभी झुकते नही है ।

प्रण ले जो प्राण से करके रहेंगे ,
हिमगिर भी सामने टिकते नहीं है ।

चल पड़े जो दृण संकल्प लेकर ,
छूकर आसमां भी थकते नही है ।

टकराते है आँधियों से हँसकर ,
हारकर कभी पीछे हटते नहीं है ।

बढ़ते है चीरकर समंदर का सीना ,
उफनाती लहरों से कटते नही है ।

करते नही ईमान का सौदा कभी ,
इस झूँठी दुनियाँ से लुटते नही है ।

 "निश्चल" चले सच साथ लेकर ,
  दुनियाँ को झूँठ से ठगते नही है ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@....
डायरी 6(62)

ये परिवर्तन क्या है ?

ये परिवर्तन क्या है ?
बस दृश्य बदलते है ।

बदले हुए मोहरे भी ,
चाल नही बदलते है ।

पिटते प्यादे मोहरों से ,
बजीर नही हिलते है ।

ढाई चाल की ऐड़ लगी ,
शह से प्यादे पिटते है ।

ये परिवर्तन क्या है ?
बस दृश्य बदलते है ।

... विवेक दुबे"निश्चल"@...

मत देने से मत पाता ।
तो मैं भी मत दे आता ।

छिनते सारे मत जिससे ,
फिर मैं कैसा मत दाता ।

... निश्चल..

लिखते रहे सब तक़दीर हमारी ।
कहते रहे , तुम, जागीर हमारी ।
घिस पिसते रहे दो पाटों में ,
समझे नही कोई पीर हमारी ।

बचपन आया योवन तन में ,
काम नही डिग्री की लाचारी ।
प्रौढ़ हुए युवा समय से पहले ,
रोजी की चिंता सिर पे भारी ।

सर्द खड़ा है खेतों में वो ,
लागत की वर्षा होती भारी ।
दे आया उनके दामों में धन ,
मालामाल माया के पुजारी ।

कहते है वो बड़ी शान से ,
अपने वादों में सत्ताधारी ।
बेठाओ तुम हमे कुर्सी पर ,
कर देंगे हम भर झोली भारी ।

बांट रहे है माल-ए-मुफ्त ,
सब के सब ही बारी बारी ।
काम नही पर हाथों में ,
बढ़ती है हाथों की बेकारी ।

कुछ दिन की कतरन है ,
रातो का योवन भारी ।
सब रीते से बर्तन है ,
रीत गये दिन खाली ।

... विवेक दुबे"निश्चल"@....
डायरी 6(62)

ये कैसी कहानी है ।


ये कैसी कहानी है ।
आंखों का पानी है ।

      ख़ुश्क रहा कोर में ,
      वो इतनी निशानी है ।

रूठते नही रुठकर ,
जो आदत पुरानी है ।

      मिलती रही हँसकर ,
      ये दुनियाँ दीवानी है ।

ठहर जरा क्षण को ,
 ये रात भी सुहानी है ।

         भोर मिले चलना ,
         रात तो बितानी है ।

 "निश्चल" सहज हर पल को,
  ये जिंदगी आनी जानी है ।

... विवेक दुबे"निश्चल"@....
डायरी 6(61)

कुदरत के ये सन्नाटे ,

कुदरत के ये सन्नाटे ,
 पग मौन चुभे कांटे ।

तपती सी ये धरती ,
 बस प्यास उसे बांटे ।

चलता शुष्क कंठ लिये ,
नभ नीर जहाँ बांटे ।

रहा आश्रयहीन सा वो ,
प्रश्न यही रात कहाँ काटे ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@..

तुझे मिले कुछ ऊंचा असमां से ।
हो जुदा कुछ जो इस जहां से ।

एक पहचान हो कल अपनी ,
अपने ही छोड़े कदम निशां से ।

उठते रहे हाथ हरदम ही मेरे ,
हर दुआ में मेरे इस दुआ से ।

... विवेक दुबे"निश्चल"@....

डायरी 6(60)

असरात लिखा करता हूँ ।

1
हालात लिखा करता हूँ ।
       असरात लिखा करता हूँ ।

बिखेरकर अल्फ़ाज़ अपने ,
         ज़ज्बात लिखा करता हूँ ।
.----2
जूझता रहा मैं ,
               हालात के हादसों से ।

गुजरता रहा मैं ,
             वक़्त के रास्तों से ।

कहाँ किसे कहुँ ,
           मैं मंजिल अपनी ,

बा-वास्ता रहा मैं ,
          खुदगर्ज वास्तो से ।
-----3
लिखता रहा खत,
            ख़्वाब ख़यालों से ।

पैगाम-ए-इश्क़ ,
         जिंदगी के सवालों से ।

पलटता रहा मैं ,
            जिल्द किताबों की ,

मिलते नही होंसलें ,
             कुछ मिसालों से ।
-----4
 वक़्त बड़ा कमज़र्फ हुआ है ।
           जफ़ा भरा हर्फ़ हर्फ़ हुआ है ।

  घुट रहे है अरमान सीनों में ,
            ये सर्द दर्द अब वर्फ़ हुआ है ।
---5
आँख मूंदने से रात नही होती ।
        झूंठे की कोई साख नही होती ।

 उड़ान कितनी भी हो ऊँची ,
          आसमान में सुराख नही होती ।
---6
कुछ कतरन है दिन की ।
           रीते रीते से बर्तन सी ।

रीत रहे दिन खाली खाली ,
           रातों है उतरे यौवन सी ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@..

डायरी 6(59)

जफ़ा/ जुल्म 
कमज़र्फ/ ओछा /कमीना

   

भाषा की परिभाषा में ।

शब्दों की अभिलाषा में ।
भाषा की परिभाषा में ।

खोज रहा मन , गुपचुप ,
कुछ अर्थ पिपासा में ।

लय घुटता कुछ रुकता है ,
डूब रहा राग निराशा में ।

प्रणय गीत गाता फिर भी ,
मधुर मिलन की आशा में ।

भाव भरे है , गीत मेरे ,
सरगम का हरदम प्यासा मैं ।

खनकेंगे सुर भी साथ मेरे ,
रहता मन मन की दिलाशा में ।

गहन निशा के आँचल से ,
उठता भोर तले, उबासा मैं ।

मौन लिए मन,मन के भीतर ,
गढ़ चलता भाव सहासा मैं ।

शब्दों की अभिलाषा में ।
भाषा की परिभाषा में ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@..
डायरी 6(57)

ऐसा कोई मुक़ा ढूंढते है ।

वो जमीं वो गली वो मकां ढूंढते है ।
जो हो यहीं कहीं वो जहां ढूंढते है ।

टकराती साहिल से बेख़ौफ बेझिझक ,
मचलती उस मौज की दास्तां ढूंढते है ।

लफ्ज़ ख़ामोश ख़यालों की ख़ातिर ,
उस ज़ीस्त रूह की जुबां ढूंढते हैं ।

जलते गुलिस्तां नफ़रत की आग में ,
निग़ाह आब की कोई अना ढूंढते है ।

 सींचे चाहत-ए-आब से गुल को ,
 गुलशन का कोई बागवां ढूंढते है ।

लूटते है दरिया साहिल को ,
मौज मैं किनारे वफ़ा ढूंढते है ।

करते रहे सफ़र सफर की खातिर ,
छूटते क़दमो के निशां ढूंढते है ।

पता मिले मंज़िल का जिस जगह पे,
चल"निश्चल" ऐसा कोई मुक़ा ढूंढते है ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@....
डायरी 6(58)
अना/अहमं

रविवार, 9 दिसंबर 2018

एक ठहरा हुआ असर सा






 एक ठहरा हुआ असर सा ।
 भागते से , इस शहर सा ।

 कुछ जीतने की चाहत में ,
 चाहतों पे , एक कहर सा ।

  वक़्त का कुछ कर्ज़  सा ।
  रहा कही क्यों फ़र्ज़  सा ।

  बदलता ही रहा हर घड़ी ,
  बस रहा इतना ही हर्ज़ सा

.... विवेक दुबे"निश्चल"@..
Blog post 9/12/18



कलम चलती है शब्द जागते हैं।

सम्मान पत्र

  मान मिला सम्मान मिला।  अपनो में स्थान मिला ।  खिली कलम कमल सी,  शब्दों को स्वाभिमान मिला। मेरी यूँ आदतें आदत बनती गई ।  शब्द जागते...