शनिवार, 17 नवंबर 2018

मैं बस एक सादा सा रिश्ता हूँ ।

 मैं जैसा हूँ बदल नहीं सकता हूँ ।
 मैं बस एक सादा सा रिश्ता हूँ ।

पहुँचे लक्ष्य मुहाने चल मुझ पर ,
हाँ मैं एक सीध सा ही रस्ता हूँ ।

सहज रहा आती जाती यादों को ,
पीठ धरे हरदम यादों का बस्ता हूँ ।

 मैं जैसा हूँ बदल नहीं सकता हूँ ।
 मैं बस एक सादा सा रिश्ता हूँ ।

धूमिल संध्या कुछ पद चापों से ,
दिनकर के आते फिर पिसता हूँ । 

 अपने तन पर पड़ते घावों को ,
 आते जाते कदमो से घिसता हूँ ।

 मैं जैसा हूँ बदल नहीं सकता हूँ ।
 मैं बस एक सादा सा रिश्ता हूँ ।

 धूप कहीं छाँव कहीं मुझ पर ,
 मंजिल की खातिर बिछता हूँ ।

 "निश्चल" रहा हर दम ही मैं ।
 बढ़ता हूँ ना ही मैं घटता हूँ ।

पहुँचे लक्ष्य मुहाने चल मुझ पर ,
हाँ मैं एक सीध सा ही रस्ता हूँ ।

... विवेक दुबे"निश्चल"@....
डायरी 5(179)




मैं बस एक सादा सा रिश्ता हूँ ।

यह नसीब भी आदत बदलता रहा ।


यह नसीब भी आदत बदलता रहा ।
बदल बदल कर साथ चलता रहा ।
.... 
मुक़ाम की तलाश को तलाशता रहा ।
वो हर दम हारते से हालात सा रहा ।
...  
अपने आप से यूँ भी सौदा रहा।
ज़िन्दगी का यूँ भी मसौदा रहा।
....
 अपने ही आप को ढालता रहा ।
 ज़ज्ब जज्बात को पालता रहा ।

   सच में झूठ का साथ देता राह ।
  कुछ यूँ सच का साथ देता रहा  ।

विवेक दुबे"निश्चल"@.
डायरी 5(178)

ख़ामोश हुए , अरमानों की ख़ातिर ।


क्या खूब दीवानगी है ।
         ज़िस्म की रवानगी है ।

खो जाते नैना चँचल ,
        मन की यही बानगी है ।
....
छलकते रहे पैमाने ,
       मयखानों की खातिर ।

 होते रहे दीवाने ,
       बेगानों की खातिर ।

 सुनाकर नज़्म ,
      आज महफ़िल में ,

ख़ामोश हुए ,
     अरमानों की ख़ातिर ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@...
डायरी 5(177)

रिक्त व्योम छूने की आशा में ।

रिक्त व्योम छूने की आशा में ।
कुंठित मन अभिलाषा में ।

तप्त धरा पथ पग रख कर ।
चलता शापित पथ पर ।

लक्ष्यहीन सी दृष्टि विखरी ।
दूर क्षितिज छितरी छितरी ।

दीप्त नहीं आभा कोई आवर्तन को ।
तम गर्भ तले अवशोषित दृष्टि पसरी ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@...
डायरी 5(176)

छोड़ चला वो धीरे धीरे ,

छोड़ चला वो धीरे धीरे ,
दुष्कर सी उन राहों को ।

मदहोशी के आलम में ,
बहकाती फ़िज़ाओं को ।

 छोड रहा  बूंद बूंद सा ,
परिपोषित विचारो को ।

आ बैठा हृदय कुंज तले ,
ले अपने सुरभित सहारों को ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@..
डायरी 5(175)

रीते रीते से सब बर्तन ।


रीते  रीते से सब बर्तन ।
उधड़ रही बाहों से अचकन ।

भूल गया सब तरुणाई सँग ,
झूँठा सा वादों का बचपन ।

मदहोश हुआ योवन पाकर ,
मन करता मन से अनबन ।

नेह बसा था जिन नयनों में ,
बदल गई अब वो चितवन ।

अहम हुआ मन को तन का ,
चलता गर्भित ले तन मन ।

भूल चला उसको अहम तले,
हर लेता जो तन से ज़ीवन ।

रीते रीते से सब बर्तन ।
उधड़ रही बाहों से अचकन ।

.... विवेक दुबे"निश्चल@..
डायरी 5(174)
Blog post 17/11/18

अपने अपनों के बाजार निकले ।

अपने अपनों के बाजार निकले ।
करने को वो व्यापार निकले ।

 जात धर्म के पलड़े पर ,
 क़रने को विस्तार निकले ।

 तौल रहे हैं मोल रहे हैं ।
 कुछ रद्दी के अखवार निकले ।

कुछ वादों की परत सुनहरी ,
देने को वो उपहार निकले ।

मानवता मानव से हार रही ,
मानव मानव के गद्दार निकले ।

क्या कहे कवि कविता गढ़ ,
शब्द शब्द के पहरेदार निकले ।

.....विवेक दुबे"निश्चल"@....
डायरी 5(173)

सब दे कर ले चलता कुछ वो ।

572
शिल्प चार सगण 16 वर्ण
        सम तुकांतक 

सब दे कर ले चलता कुछ वो ।
निकला मन के पथ पे अब वो ।
 मन रीत रहा मन दे चल के ।
 ठहरा सबसे मिलता चल के ।

रुक राह कभी ठहरा पल को ।
रख साथ लिया अगले पल को ।
तब रीत गया गुजरे पल से ।
मिलने चलता अगले पल से ।

भरता जल भीतर था घट के ।
घट वो अब रीत रहा भर के ।
लहरा उठता लहरें बन के ।
ठहरा जलधी तट से मिल के ।

कब राग पले अब याद नहीं ।
सब छोड़ चला सबसे मिल के ।
अब जीत नहीं अब हार नहीं ।
चलता अब वो "निश्चल" बन के ।

लहरा चलती लहरें बन के ।
बहती तटनी तट से मिल के ।

..... विवेक दुबे"निश्चल"@...
डायरी 5(172)

यूँ मुझे बदनाम न कर ।

यूँ मुझे बदनाम न कर ।
 किस्सा-ए-आम न कर ।

लाकर किनारे तक मुझे ,
तू कोई अहसान न कर ।

 छोड़ तूफानों के सहारे मुझे ,
 जी लूँ खुद को पहचान कर ।

 दरिया जहां तक बहने दे मुझे ,
 जाने दे मुझे मेरे अंजाम पर ।

 खो जाएगा दरिया भी एक दिन ,
पहुंचा कर मुझे मेरे मुक़ाम पर ।

... विवेक दुबे"निश्चल"@...
डायरी 5(171)

भृमित रहा मघुकर भी ।

111 121 111 2

भृमित रहा मघुकर भी ।
उदित नहीं दिनकर भी ।

सहज चला तिमिर तले ,
पथिक रहा पथ पर ही ।

सृजन तभी कर सकता ,
चलकर आ पथ पर ही ।

सृजित सभी पथ करना ,
धरकर भीतर पग ही ।

बस चलता चल पथ पे ,
मंजिल रहे पथ पर ही ।

थककर भी ठहर नहीं ,
कलम चले "निश्चल" सी ।

... विवेक दुबे"निश्चल"@..
डायरी 5(170)

शुक्रवार, 16 नवंबर 2018

वो सम्बन्धों की परिभाषा ।

609
वो सम्बन्धों की परिभाषा ।
जहाँ मौन रही हर भाषा ।

लिखती चितवन गीत नए ,
हृदय धड़क संगीत सजाता ।

भृम नही कोई नयनों में ,
मन ही मन को भरमाता ।

 कलम चले पलकों सी ,
शब्द शब्द सा लिख जाता ।

वो सम्बन्धों की परिभाषा ।
जहाँ मौन रही हर भाषा ।

... विवेक दुबे"निश्चल"@...
डायरी 6(21)

मनोज्ञा छंद

607
मनोज्ञा छंद
(111  212  2 )

 भजत नित्य माता ।
 सकल ज्ञान पाता ।
 चरन पाद सेवा ।
 मिलत ज्ञान मेवा ।

 सहज भाव आया ।
 सकल प्राण लाया ।
 नित तुझे मनाऊँ ।
 कब "विवेक" पाऊँ ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@...


आओ माँ उपकार करो ।
  दुष्टों का तुम संहार करो ।
 पाप अनाचार रजः छाई है ,
  हर पापी पर प्रहार करो ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@....
Blog post 15/10/18
डायरी 6(19)

मत्ता छंद

मत्ता छंद
222 211 112 2

 गीतों में माँ ,तुम बस जाओ ।
ज्योती दीप्त , कलम जगाओ ।
 आया माता ,निकट तुहारे ।
 तू है दाता,  तुमहि सहारे ।

 दीनो की लाज झट बचाये ।
 सारे ही कष्ट फट हटाये ।
 माता तेरे गुन सब गायें ।
 तेरी भक्ति जन जब पायें ।

 दे दो माता सुफल सहारे ।
 आया हूँ याचक बन द्वारे ।
  दाता है तू जग जननी माँ ।
 माया तेरी शिव कथनी माँ ।

  दुर्गा हो आदि शिव शक्ति हो ।
   चंडी माया हर हर भक्ति हो ।
    तेरे ही रूप रचत माया  ।
    सारा प्रकाश जगत छाया ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@....
डायरी 6(18)
Blog post 15/10/18

एक आइना ही अपना निकला ।

605
एक आइना ही अपना निकला ।
हर सच्चा तो सपना निकला ।

उठाता रहा कसम उसूलों की ,
उसूलों पर जितना निकला ।

  सजा नही कहीं श्रृंगारों में ,
  मुफ़्त ही बिकना निकला ।

लाया न हाल जुबां कभी कोई ,
किस्सा मुफ़्लिशि उतना निकला ।

 डूबता रहा रिवायत दुनियाँ में ,
 "निश्चल" नादां इतना निकला ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@...
डायरी 6(16)

कलम चलती है शब्द जागते हैं।

सम्मान पत्र

  मान मिला सम्मान मिला।  अपनो में स्थान मिला ।  खिली कलम कमल सी,  शब्दों को स्वाभिमान मिला। मेरी यूँ आदतें आदत बनती गई ।  शब्द जागते...