गुरुवार, 12 जुलाई 2018

दोहे 20 से 23

 20
 धैर्य धरा से सीखिए,नील गगन से विस्तार।
  सागर सा मन रखिए, गहरे सोच विचार।।
 21
धैर्य हितेषी आपका,व्याकुलता की काट।
धैर्य कभी न खोइए,लाख विपत्ति आए ।।
22
धैर्य ध्वजा धर्म की ,    धैर्य धर्म की लाज ।
धैर्य धारण जो करे, होय सफल हर काज ।
23
धैर्य कभी न हारिये , धैर्य धर्म की आड़।
धैर्य धरे जो मानवा , पुरुषोत्तम हो जाय ।।
 ..... विवेक दुबे"निश्चल""....

दोहे 17 से 19

17
क्रोध कबहुँ न कीजिए , क्रोध पतन का मूल ।
 क्रोध जो उपजे आपमे, नष्ट होय बुद्धि समूल ।
18
रस रहे न स्वाद रहे , बिन मौसम जो फ़ल आए ।
 बिन मौसम की बादरी,  नीर भरे उड़ जाए । 
 19
 उड़ जा कागा मुँडेर से , दे पिया  सन्देशा जाए ।
 कहियो तोरी याद में , नैन  सरिता हो जाए । 

  
.... विवेक दुबे"निश्चल"@...

दोहे 14 से 16

14
राधा बड़ है भागनी, नटखट है घनश्याम।
 बाजत कान्हा बाँसुरी, स्वर बोलें राधा नाम।
15
लालच लालसा चोरी,स्वार्थ बंधी सब डोरी ।
 छोड़ स्वार्थ हो जाए दुनियाँ कोरी की कोरी ।
16
 रच निस्वार्थ भाव से जीवन फिर तू अपना ,
 खेल श्याम सँग प्रेम प्रीत की तू तब होरी ।
  ..... विवेक दुबे"निश्चल"©.......

3 दोहे

एक प्रयास दोहे लेखन

11
नभ सूना बदली बिना ,
 भू को जा की आस ।
  तू सागर से नीर ला ,
 मिटे धरा की प्यास ।
12
सागर चुप हो देखता ,
 भरत न  बदली पेट ।
 नयना रोत किसान के ,
  भरे न बदली पेट ।
13
 ना जागे यदि नींद से , 
  मिट जाएगा अंश ।
  सहजा नही यदि वृक्ष को ,  
  नहीं बचेगा वंश ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@...


दोहे 5 से 10

6
समय कबहुँ न टालिए, समय न वापस आए ।
बीती बात बिसारिए, बीत गया सो बिता जाए ।
7
रात बड़ी है साँवली ,लेत प्रभा की ओट ।
आपने बिस्तार से,वा आपन को है खोत।
8
दिनकर ही दिन चढ़त है,दिनकर ही ढल जाए ।
यौवन जो काट के,  ज़रा गले लिपटाए ।
9
सहना मानस की नियति,सहती अत्याचार।
 बैठी है चुपचाप से, करे नहीं प्रतिकार।।

10
 सहना नियति मानस की, सहती अत्याचार ।
 इच्छा न प्रतिकार की, बैठी बस चुप चाप ।
 . .... विवेक दुबे"निश्चल"@...
डायरी 5

दोहे 1से5

1
गूढ़ ज्ञान नाही बूझिए , ज्ञान बडा उलझाए ।
सरल ज्ञान के भान से,राम हृदय मिल जाए ।
2
राम चरण की चाकरी,चित्त नही विश्राम।
कृपा करें राम जी, पूरन हों सब काम।
3
भक्त शिरोमणि आप,सुनते सबकी।अरदास।
 राम कृपा रहे अधूरी ,जो त्यागे राम दास ।
4
राम नाम के जाप से बजरंगी होय प्रसन्न ।
 तुलसी रट लगाई राम की हनुमत आए तुरन्त ।
5
 काव्य रचो निज भाव सो , गहरी पैठ बनाए ।
पाठक के पढ़ते ही जो , हृदय जान समाए ।

 .... विवेक दुबे"निश्चल"@...

कुछ मुक्तक 438/444

438
लज़्ज़ता छोड़ निर्लज़्ज़ता ओढ़ी ।
शर्म हया भी रही नही जरा थोड़ी ।
 रहे नही शिष्ट आचरण अब कुछ ,
 अहंकार की चुनर कुछ ऐसी ओढ़ी ।
....
439
  आइनों से खुद को मैं छुपाता रहा ।
बस अक़्स उसको मैं दिखाता रहा ।
छुपाकर सलवटें अपने चेहरे की ,
 आइनों से निग़ाह मैं मिलाता रहा ।
....
 440
किस्मत के खेल खिलाती है जिंदगी ।
किताबों में नही वो दिखती है जिंदगी ।
चलने की चाह में ही हर दम  ,
दुनियाँ की ठोकरें खिलाती है जिंदगी ।
......
441
 वो संग जो आज भी मौन थे ।
निगाहों में उनकी कुछ बोल थे ।
 कहते थे वक़्त के सितम को ,
 हर ज़ुल्म ही जिनके मोल थे ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@..
442
  समंदर आँखों का नम था ।
 काजल आँखों का कम था ।
उठे थे तूफ़ां उस दरिया मैं ,
 होंसला साहिल बे-दम था ।
.... 
443
आज इंसान ग़ुम हो रहा है ।
 इतना मज़लूम हो रहा है ।
खा रहे वो कसमें ईमान की ,
 यूँ ईमान का खूं हो रहा है ।
 ..... 

444
काश वक़्त से मशविरा हुआ होता ।
आज वो मेरा नाख़ुदा न हुआ होता ।
न डूबती कश्ती यूँ किनारों पर ,
एक साहिल भी मेरा हुआ होता ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@.
डायरी 3

शुक्रवार, 6 जुलाई 2018

निग़ाह राह ताकता

मनहरण घनाक्षरी
"""""""""""""""""

निग़ाह राह ताकता,
रहा वक़्त गुजारता ।
हँस सँग दुनियाँ के ,
दर्द मैं बिसारता ।

 जी कर खुशियों को भी ,
 खुशी रहा निहारता ।
 मैं एक दर्द के वास्ते ,
 खुशी को पुकारता  ।

बदलेगा आज कल ,
कल को क्यों पुकारता । 
बीत कर ही आज से ,
कल को निहारता ।

होगा आज कल फिर ,
आज क्यों कल टालता ।
रुका नही वक़्त कभी ,
 बात को दुलारता ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@...

गुरुवार, 5 जुलाई 2018

सावन के ये बादल


मनहरण घनाक्षरी
============

 सावन के ये बदल ,
 पिया मन भावन से ।
 छलकत रिम झिम  ,
  रस पिया मन से ।

थिरकन होंठो पर , 
मद है चितवन में ।
वो प्रणय निवेदन, 
 चाहत साजन से ।
  

 भींगी अंगिया तन पे , 
 दमका श्रृंगार सभी ,
  लरज़त है वा गोरी, 
 सखी ज्यों साजन से ।

 नैनन में आस जगी ,
आएंगे साजन मेरे
 अबकी जा सावन में , 
 ताप बुझे तन से ।
               
 .... विवेक दुबे"निश्चल"@...


सोमवार, 2 जुलाई 2018

वक़्त को यूँ बनाना पड़ा है

हमे भी वक़्त को यूँ बनाना पड़ा है।
हाथ सबसे हमें भी मिलाना पड़ा है।

 छुपा कर रंज दिल में अपने सारे ।
 सामने दुनियाँ के मुस्कुराना पड़ा है।

 बाहर-ऐ-चमन सामने नहीं कोई ,
सूखे फूलों से गजरा सजाना पड़ा है ।

 घटाएँ सावन की वो बरसी नहीं  ,
 निगाहों को सावन बनाना पड़ा है ।

 हम सफ़र कोई नही राह में मेरा ,
 रास्तों को हम सफ़र बताना पड़ा है।

 क़ुसूर रहा नही कभी कोई मेरा ,
 हर बार उसको मनाना पड़ा है ।

 वो बुत न रहे निगाहों में दुनियाँ की ,
"निश्चल" को चलना सिखाना पड़ा है।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@...
Blog post 2/7/18

नश्तर चुभोते रहे

यूँ अहसास नश्तर चुभोते रहे ।
खामोश लफ्ज़ जज़्बात रोते रहे ।

डूबकर दरिया भी समंदर में ,
 अपने आप को भिंगोते रहे ।

 तिश्निगी न चाही कभी मगर ,
 उजाले हर के साँझ खोते रहे ।

 डूबकर उभर जाएंगे हम कहीं ,
 इस ख्याल से खुद को डुबोते रहे ।

 उस साँझ की निशानी को ,
  सुबह तक हम संजोते रहे ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@...

क्यों नहीं देते

 हालात दिलों के तुम दिखा क्यों नही देते ।
येअश्क़ निगाहों से तुम गिरा क्यों नही देते ।

उठता है समंदर में तूफान जो कोई ,
साहिल से उसे तुम मिला क्यों नही देते ।

अरमान उठा जो आज उस दिल में ,
इस ज़िस्म में तुम गला क्यों नही देते ।

छेड़कर नग़मे प्यार के फिर कोई ,
जज़्बात दिलों के तुम जगा क्यों नही देते ।

ठहरा हूँ साहिल पर समंदर की चाह में ,
आँखों से अपनी दरिया पिला क्यों नही देते ।
आज बरस जाऊँ बून्द बून्द सा मैं ,
बारिश सा तुम मुझे सिला क्यों नही देते ।

"निश्चल" ही रहा हूँ अब तलक मैं ,
 मुसाफ़िर तुम मुझे बना क्यों नही देते ।
.... विवेक दुबे"निश्चल"@....

221     1221  1221   122    




चेहरे से खुशियाँ बेगानी है

मेरे चेहरे से खुशियाँ बेगानी है यारो ।
 ये रंजिशें तो मेरी दिवानी है यारो ।

 गुजरता हुँ वक़्त के हालात के ,
 मंजिल एक दिन आनी है यारो ।

 अपने ही आप से क्यों रूठता हूँ ,
 यह मुश्किलें तो पहचानी है यारो ।

 नही रंज किसी के वास्ते दिल में ,
 ये उम्र तो आनी जानी है यारो ।

 मुश्किल यह दौर है कैसा ,
 ग़ुरबत ही निशानी है यारो । (विवशता)

 उठाता रहा कदम जीत के वास्ते ,
 एक हार भी नही पुरानी है यारो ।

चला चल "निश्चल" राह अपनी ,
 तुझे राह खुद बनानी है यारो ।

  ..... विवेक दुबे"निश्चल"@...

बुधवार, 27 जून 2018

चिलमन


 चिलमन निगाह गहरे पड़े थे ।
  सुनसान रास्ते बिखरे पड़े थे ।

चाँदनी आगोश फ़लक के ,
इल्ज़ाम चाँद चेहरे पड़े थे ।

 रुख़सत हुआ वास्ते सुबह के ,
 सितारे असमां बिखरे पड़े थे ।

 न आई मौज दरिया की कोई ,
 जिस किनारे पे दोनों खड़े थे।

..... विवेक दुबे"निश्चल"@...

कलम चलती है शब्द जागते हैं।

सम्मान पत्र

  मान मिला सम्मान मिला।  अपनो में स्थान मिला ।  खिली कलम कमल सी,  शब्दों को स्वाभिमान मिला। मेरी यूँ आदतें आदत बनती गई ।  शब्द जागते...