बुधवार, 15 अगस्त 2018

क्या खाएँ कसमे

क्या खाएं कसमें अब आजादी की ।
हर दिन आतीं खबरें बर्वादी की ।

 लुट रहीं मासूम मूक बधिर है ,
 लहू लुहान हालात आज़ादी की ।

 आश्रय दाता बन जाते जो ,
 खाल नोचते वो ही छाती की ।

 आज नही सुरक्षित बचपन  ,
 धूमिल मर्यादा हर खादी की । 

 मूक नही हम बधिर नही हम ।
 पर चुप हालात देखे बर्वादी की ।

 स्वार्थ सजे हैं चेहरे चेहरे ,
 निग़ाह झुकी है खुद्दारी की ।

क्या खाएं कसमें अब आजादी की ।
हर दिन आती खबरें बर्वादी की ।

... विवेक दुबे"निश्चल"@....

  

मंगलवार, 14 अगस्त 2018

पूर्व संध्या आज़ादी की

रात बड़ी उल्लास में ,
 लिये सुबह की आस ।
 भोर यहाँ लहरायगा ,
 राष्ट्रध्वज आकाश  ।
... 
धरा अपनी झूमेगी,
 झूमेगा आकाश ।
 फैलाएगा भानू भी ,
 झूम धवल प्रकाश।
... *विवेक दुबे"निश्चल"*@..

सोमवार, 13 अगस्त 2018

मित्र

सोम सी सुहृद प्यास है ।
प्रीत सी सहज धार है ।

मान का अतुल प्रान है ।
 ज्ञान का मधुर भान है ।

 गीत का तरल राग है ।
 साज का सरल तार है ।

    हर हार में जीत सा ,
  *सुहृद* सुखद प्रसाद है ।

... विवेक दुबे"निश्चल"@..
मित्र
Blog post 13/8/18

शिव अनन्त

  ना जान सका ब्रम्हा ,
  मैं क्या जानूँ अज्ञानी ।
  शिव अनन्त अजन्मा ,
 महिमा न जाए बखानी ।


कण कण व्यापी अविनाशी वो ।
जो न जाते हैं  न जो आते हैं  ।
शिव महान हैं  काल परे वो ,
नित्य सदा शिव कहलाते हैं  ।

प्रभा जीव की , सकल कहलाते है ।
अजा काल की , अटल कहलाते है ।
 शिवा नाद है  ,अजर सदा रहे जो ।
 शिवा आज हैं , अमर कहलाते है ।    

जीव प्रभा से , सकल कहलाते हैं ।
काल कला से ,अटल कहलाते है । 
नाद अजा से , अजर रहते है जो ,
शिव सदा से , अमर कहलाते है ।
... ...विवेक दुबे"निश्चल"@..
अजा /- कांति

ॐ नमः शिवायः

   ।।ॐ नमः शिवायः।।

श्रवण मास शिव भजकर ।
लोभ मोह को तजकर ।

चल तू शरण शिव की  ,
भक्ति भाव से खुद तरकर ।

 दाता हैं शिव त्रिपुरारी ,
 हरदम देते झोली भरकर ।

कटते सारे शूल जगत के ,
जपता चल बस हर हर ।

 मुक्त रहे मन भय काल से ,
 दर्शन तू महाकाल के कर ।

 अनाथ नही है तू जग में ,
 नाथ खड़े विश्वनाथ बनकर ।

 पाता है मन वो सोम समान ,
बसे ध्यान जिसके सोमेश्वर ।

राम कहाँ है दूर कभी उससे ,
नित जाप करे जो रामेश्वर ।

 चलता चल शिव छाँव तले ,
"निश्चल" मन हर हर कर ।

 "निश्चल" मन हर हर कर ।

    ।।ॐ नमः शिवायः।।

... विवेक दुबे"निश्चल"@...

Blog post 13/8/18

घन श्याम छंद

घनश्याम छंद 
विधान -
(जगण  जगण भगण भगण भगण गुरु।)
(121   121  211  211     211  2)

लिखें जब गीत,
      आकृति भारत की लिखना ।
सजे जब साज,
     उन्नति भारत की लिखना ।
मिले जब आज,
        तो कल भारत का लिखना।
खिले जब ज्ञान,
        वो फ़ल भारत का लिखना।

 दिए जब मान,
       सो हट भारत की रखना ।
 दिए जब आन ,
       तो लट भारत की रखना ।
छेड़ें जब तान  ,
        सो नच भारत को रखना ।
 छेड़ें जब गान ,
        तो रच भारत को रखना ।

रीत सदा सच  ,
              भारत का है यह गहना 
 गंगा जल सा ही ,
               भारत में सब को बहना ।
जात धर्म नही कोई ,
                गीतों में बस ये कहना ।
साथ रहे सदा है  ,
           साथ साथ ही है रहना ।

तन छेदकर शूली पर 
                 बलिदानों ने पहना ।
"निश्चल" अमर रहे ,
          आजादी का यह गहना ।


... विवेक दुबे"निश्चल"@...

आज़ादी

रविवार, 12 अगस्त 2018

घनश्याम छंद

घनश्याम छंद
विधान- [जगण जगण भगण भगण भगण गुरु]
(121  121,   211   211   211 2)
16 वर्ण, यति 6,10 वर्णों पर, 4 चरण,
2-2 चरण समतुकांत।



                       
चला चल जीव, ये बस जीवन साधन हो ।
खिलें बस फूल, ये हर जीवन पावन हो ।
 मिलें पथ मीत, तो क्षण ये मन भावन सो ।
 बसे हर जीव, तो कण ये मन मोहन सो ।

बसी मन प्रीत, चाह नही अब ये कम हो ।
रचे मन गीत,  साथ चलें जब प्रीतम हों ।
पिया मन झूम, साज गढ़े सुर ये तन तो ।
हिया मन मीत, दूर नही अब ये मन तो ।

... विवेक दुबे"निश्चल"@.....
Blog post 12/8/18

शनिवार, 11 अगस्त 2018

शालनी छंद

शालनी छंद
मगण  तगण तगण गुरु गुरु
222   221  221   2 2

  पाते जैसे आ मिले मीत आ के  ।
  नाते वैसे ही चले प्रीत पा के  ।
  ऐसे गाते ही रहे गीत गा के ।
  भाते वैसे ही रहे रीत पा के ।

आ जाओ बातें सुनाने बुलाते ।
ना जाओ रातें बिताने रिझाते ।
ले जाओ यादें सुहानी सजाने ।
दे जाओ ताने रिझाने मनाने ।

नाता है कोई यही क्षीर सा ये ।
लाता है कोई वही नीर सा ये ।
पीता है कोई यही पीर सा ये ।
रीता है कोई वही तीर सा ये ।
.....
  जो नाते है  वो कहाँ दूर जाते ।
  वो आते ही है सदा नीर लाते ।
  जो जाते है वो नही पीर पाते ।
  वो पाते है जो यहाँ तीर आते ।

 .... विवेक दुबे"निश्चल"@...

वंशस्थ छंद

489
वंशस्थ छंद
 [ जगण   तगण   जगण   रगण ]
( 121     221    121    212 )

चला जहाँ हार गया वही कही ।
थमा यहाँ जीत गया तभी यही ।
बिसारते आप रहे सही नही ।
विखेरते गीत मिले सभी तभी ।

 निखारती प्रीत रही उकेरती ।
 सुधारती शब्द रही उभारती ।
पुकारते गीत रहे मुझे वहाँ ।
दुलारते छंद मिले मुझे जहाँ ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@...
डायरी 5

शोक हर छंद

490
शोकहर छंद / सुभंगी छंद

विधान ~ 8,8,8,6 मात्राओं पर यति, पहली दूसरी यति अंत तुकांत, चार चरण संतुकांत

ठहरे जल में , रूप कमल से ,
शांत सरोवर ,   खिलते है  ।

 पथ पर चल कर , चौराहों पर ,
 साथ सदा पग  ,  मिलते है  ।

निज पथ पर चल  , तू चलता चल ।
पथ पग चल कर ,   बनते है।

  आश्रय यही ,   विश्राम  नही ,
  हर द्वार सफल ,  खुलते है ।

... विवेक दुबे"निश्चल"@..
डायरी 5

बुधवार, 8 अगस्त 2018

अपराजिता छंद




*अपराजिता छंद*

(नगण नगण रगण सगण लघु गुरु )
111   111  212  112  1  2)

विधान-14 वर्ण4 चरण समतुकांतक

 सुबह सहर भोर भी धुंधली खिली ।
 ठहर क्षितिज साँझ भी सहमी मिली ।
 बिखर छितर चांदनी न कहीं ढली ।
 निकल उदय लालिमा न अभी चली।

 सतत चलत राह भी अब है मिली ।
 मिलकर अब आस में नजरें खिली ।
 रह कर अब साथ में जिनके अभी ।
 कलम अब रुके नही जिससे कभी ।

 निखर डगर शब्द जीवन के गहूँ ।
 सहज निखर आज मैं तन के कहूँ ।
 रचकर मन भाव मैं चलता चलूँ।
 हरक्षण लिख हाल मैं लिखता रहूँ ।

  ......विवेक दुबे"निश्चल"@...
डायरी 5(77)
Blog post 8/8/18

द्रुतविलबिंत छंद

द्रुतविलबिंत छंद

विधान
  (111  211   211   212)
(नगण  भगण  भगण  रगण)

   रचित गीत रचे बिन ही रहे ।
   सुनत गीत  सुने बिन ही रहे ।
   रच गए पर सोचत ही रहे ।
   सुन गए पर देखत ही रहे ।

 ठहर जा अब तू मन ये कहे ।
 उतर जा अब तू वन ये कहे ।
 निखर जा प्रण सा तन ये कहे ।
 बिखर जा कण सा छन ये कहे ।

  निखर ले अब साजन ये कहे ।
  महक ले अब सावन ये कहे।
  चहक ले अब ये मन ये कहे ।
  सहज ले अब जीवन ये कहे ।

 .. *विवेक दुबे"निश्चल"* @...
डायरी 5(76)
Blog post 8/8/18

जलधर माला छंद

*जलधरमाला छंद*

विधान~
[मगण भगण सगण मगण]
(222   211  112  222)
12 वर्ण,4 चरण,यति 4,8
दो-दो चरण समतुकांत]


आता जाता हर दिन ही राहों में ।
खोता जाता मन मन की बातों में ।
 रोकें राहें कुछ अहसासों से ये ।
मीठा नाता कुछ कुछ वादों से ये ।
...
हारा जाता हर दिन बातों से मैं ।
 जीता जाता हर दम नातों में मैं ।
आते जाते कुछ अहसासों में ये ।
मीठे नाते अब कुछ साथों के से  ।

... विवेक दुबे"निश्चल"@...

492
 आओ यारा घुन एक कोई गाओ ।
 यारा मेरे सुख मय बातें लाओ ।
 रातें बीतें खुश खुश साथी आओ ।
 यादों का है मधुवन आ भी जाओ ।


डायरी 3/5

द्रुता छंद

485
   *द्रुता छंद*
विधान~ [रगण जगण सगण लघु गुरु ]
(212  121  112   1   2)
11 वर्ण, 4 चरण, यति 5-6 वर्णों पर
[दो-दो चरण समतुकांत]


जीव की प्रभा , सकल जो सदा ।
काल की अजा , अटल जो सदा ।
 भाल है कला ,     अजर है सदा ।
 आज है शिवा ,   अमर है सदा ।     
... 
 याद है उसे ,   कब मिले तुझे ।
 भूलता नही, शंकर कभी तुझे ।
 मांगना नही , बिन दिए दिया ।
 सोचता नही , बिन लिए दिया ।

जीव की प्रभा , सकल जो सदा ।

मांगना नही , बिन कहे दिया ।
 सोचता नही , बिन गहे दिया ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@...

अजा/ कांति


 मांगना नही, तु अपना दिया ।
 भूल जा तु ,देकर कभी दिया ।
 फैलता प्रकाश, जलता दिया ।
 है दिया बहुत ,  उसने दिया ।

.... *विवेक दुबे"निश्चल"*@..
दायरी 3(76)

कलम चलती है शब्द जागते हैं।

सम्मान पत्र

  मान मिला सम्मान मिला।  अपनो में स्थान मिला ।  खिली कलम कमल सी,  शब्दों को स्वाभिमान मिला। मेरी यूँ आदतें आदत बनती गई ।  शब्द जागते...