शुक्रवार, 17 अगस्त 2018

मुश्किलों की रात

वो मुश्किलों , की रात थी।
मंजिले, आस पास थीं ।

चलता, रहा मैं भोर तक ,
मुझे, रास्तों की तलाश थी ।

खो गया भोर के प्रकाश में ,
करती अचंभित हर बात थी ।

जहां रास्ते थे सामने मेरे '
हर राह पे, कुटिल चाह थी ।

चलता रहा, मैं सोचता रहा ,
इससे तो बेहतर, वो रात थी ।

पसरा था तिमिर, हर और जहां ,
अपने साये की भी, ना कोई जात थी ।

..... विवेक दुबे "निश्चल"@
डायरी 5(86)
Blog post 17/8/18

चाल बदलते हैं

चल चालें बदले हैं ।
कुछ मोहरें चलते है ।

 राजा की चालों से ,
 प्यादों को छलते है ।

 चल चाल बदलते हैं ।

 रहता है जो पीछे पीछे,
  उस राजा को चलते है ।

 चल चाल बदलते हैं ।

 प्यादों की चालों पर ,
 राजा को हम धरते हैं ।

 चल चाल बदलते हैं ।

 अश्व कहीं ऊंट कही ,
 बजीर नही बदलते हैं ।

 चल चाल बदलते हैं ।

  प्यादों की सेना तक,
 राजा लेकर चलते है ।

 चल चाल बदलते हैं ।

.... *विवेक दुबे"निश्चल"* @.
Blog post 17/8/18

खो गए

खो गए निग़ाह से अहसास दे कर ।
रात के साथ दिन की आस दे कर ।

 खोजता रहा क़तरा क़तरा वो , 
 जो ग़ुम हुआ आँख से खो कर ।

  ना मिल सका समंदर से वो दरिया ,
  आया था बड़ी दूर से जो बह कर ।

  वो चलता था उजलों के साये में ,
  खा बैठा रोशनियों से वो ठो कर ।

 हंसता ही रहा हर हाल पर जो ,
 देखता है आज अब वो रो कर ।

"निश्चल" ना चल रहा पर और आंगे ,
 मंजिल मिले नही राह को खो कर ।

... विवेक दुबे"निश्चल"@.
Blog post 17/8/18

तलाश

121  212  121  211 12

तलाश की तलाश को जरूरत रही ।
तलाश की यही यक़ीन सूरत रही ।

तलाशता रहा यक़ीन आप खुद जो ,
निग़ाह की यही हताश कूबत रही ।
  
  ख़फ़ा नही यहां रहा इरादतन जो ,
  अज़ाब सी यहां मिज़ाज सूरत रही ।

   भरे कभी सुकून से बुतों पर जो ,
   अश्क़ सभी रंग निखार मूरत रही ।
    
   ढंकी सभी निग़ाह आज हिजाब जो ,
   हुस्न अदा फ़िज़ा बिखेर नियत रही ।

 नक़ाब में निग़ाह को छुपाकर चला ,
 निग़ाह को निग़ाह की यु चाहत रही ।

   मिटा रहा निशान आदमीयत जो ,
   नही उसे ईमान आज आदत रही ।

 मिला तभी यहीं मिला जुदा कब मैं ,
चला नही यही मिज़ाज "निश्चल" यही ।


..विवेक दुबे"निश्चल"@.

होंसलें

होंसले न लो कभी ,
ज़िगर के होंसलों से ।
     टूट जाते हैं सभी ,
     टूटते घोंसलों से ।
सिमट कर अपने ,
बनाए घोंसलों में ।
      घुटते रहे हर दम ,
      ज़िगर के होंसलों में ।
           .. विवेक दुबे"निश्चल"@..

चल देख लें जरा

 चल देख लें जरा ।
 चल सोच लें जरा ।

  शब्द के  सँग क्यों  ,
  अर्थ रह गया धरा ।

 जीतकर इरादों को ,
  एक शेर था गढ़ा ।

 हारकर इशारों से ,
 काफ़िया था पढ़ा ।

 रह गया अधूरा सा ,
 नशा ग़जल ना चढ़ा ।

 सोचता है रिंद क्युं ,
 साक़ीया ना मुड़ा ।

 रूठता रिंद जो ,
 झूमती ना मयकदा ।

... विवेक दुबे"निश्चल"@.

सत्य धूप

सत्य धूप पर असत्य की छाया है ।
सांझ ने दिनकर को भरमाया है ।

  रीत रही रातें चंचल तारों से ,
  सांझ ढले चाँद नही आया है ।

 राखी भी अब रीत रही ,
 सावन ने ना झूला गाया है ।

 ठहरा सा एकाकी मन ,
 साथ नही अब साया है ।

 चलता है एक आस लिए ,
 क्षितिज तले धुंधली छाया है ।

 साँसों की आहट ने ,
 साँसों को ठहराया है ।

 जमते रक्त शिरा ने ,
 शांत हृदय तड़फाया है ।

 स्याह अंधेरा दूर तलक,
 भोर नजर नही आया है ।

  अंधकार के पीछे ,
 अंधकार फिर आया है ।

... विवेक दुबे"निश्चल"@....
डायरी 5(99)
Blog post 17/8/18

कुछ फैसले

कुछ फैसले किताबों के,
ज़िंदगी के हिसाबों से ।
वो असमां सितारों के ,
चुभते रहे नजारों से ।

थामकर हर खुशी अपनी ,
दामन भर दिए सितारों के ।
टूटा नहीं एक भी ख़ातिर मेरी ,
हाथ उठे जब मेरे दुआओं के ।

वो नुक़्स निकालते रहे ।
हम खुद को ढालते रहे ।
उतार अक़्स शीशे में अपना,
संग से खुद को सम्हालते रहे ।

... विवेक दुबे''निश्चल''@....
डायरी 5(94)

गुरुवार, 16 अगस्त 2018

दोहे 24/28

24
मन चाहत जा वाबरी ,मन चाहे ना होय ।
दास करे बस चाकरी ,दाता चाहे होय ।
25
चलता जा तू आप से, आपन को तू खोय ।
मिलता है सब भाग से, भाग विधाता होय ।
26
जीवन है सब राम का,दियो राम में खोय ।
मिलता है सब आप से,मांगत कछु ना कोय ।
27
रीती नैनन गाघरी , आस पिया की जोह ।
आएंगे फिर साँझ को,थाम प्रीत की डोर ।
28
 दास बन राम चरण का,चित्त समा आभास ।
 वो ही पार उतारते ,तू "निश्चल"कर विश्वास ।

... *विवेक दुबे"निश्चल"*@..
डायरी 6

जीवन क्रम

काटते एक दिन उस शाखों को ।
थामें थीं जो एक दिन गुलाबों को ।
छोड़ गए जो फूल बहारों को ।
क्यों सहजें उन सुनी शाखों को 

फिर आएगी एक दिन कोंपल नई ,
पाएगी जो स्नेहिल फुहारों को।
छाएगी फिर डाली कलि कलि ,
चूमेगी भँवरों के रूखसरों को ।

फिर डोलें भँवरे गुजित मन से ,
छूने फूलों के अहसासों को ।
 फिर छू लेगी डाली डाली ,
प्रीत सजी वसंत बहारों को ।

चलता क्रम बार बार प्रति बार यही ,
जीवन के भी इन बागानों में ।
आते जाते झड़ जाते धूल धरा हो जाते,
फिर छा जाते आंगे आती बहारों में ।

सत्य नियति सत्य प्रकृति ,
जीवन बसता हर अंधियारों में ।
क्रम चलता निकल गहन गर्भ से,
फिर खिलता इन उजियारों में ।


विवेेेक दुबे "निश्चल"@
डायरी 5(85)

वतन जीवन( द्रुत विलबिंत छंद)

द्रुत विलबिंत छंद
111  211  211 212
लहर सागर पाद पखारती ।
पवन आँगन गाद बुहारती 
किरण श्रेयस भोर निखारता।
 खिल निशापति तेज दुलारता।

सु-तन यौवन बेष निखार ता ।
सु-घड़ ये तन देश सिंगार सा ।
सु-मधुता मन तेज विखार ता ।
वतन जीवन सेज सुहाग सा ।
... विवेक दुबे"निश्चल"@...

बुधवार, 15 अगस्त 2018

फल पाई जनता

जन गण मन जब गाए जनता ।
लहर लहर फहराए तिरंगा ।

नयन सुमन बरसाए जनता ।
फहर फहर फहराए तिरंगा ।

अजर अमर बलिदान जिनके ,
सजल नयन सु-सजाए जनता ।

 रचकर गढ़कर पौध लगाई ,
तब स्वतंत्र फल पाई जनता ।

... विवेक दुबे "निश्चल"@...

उन्नति भारत की लिखना

 घनश्याम छंद 
विधान -
(जगण  जगण भगण भगण भगण गुरु।)
(121   121  211  211     211  2)


लिखें जब गीत ,
    उन्नति भारत की लिखना ।
 सजा कर साज , 
    आकृति भारत की रखना  ।।

 मिला कर आज ,
      तू कल भारत का लिखना ।
खिलें जब फ़ूल ,
      तो फ़ल भारत को रखना ।।

मिले नित मान ,
  वो छवि भारत की रखना ।
भरे जित ज्ञान ,
   तू कवि भारत का दिखना ।।

सजा कर तान ,
  हैं सुर भारत के रचना ।
सुना कर गीत ,
   चाहत भारत की रखना ।।

हटा कर जात ,
   राह नई हमको गढ़ना ।
मिटा कर पात ,
   रीत नई हमको भरना ।।

गंगा सम नीर,
  साथ सदा सबको बहना ।
सदा सच रीत ,
   है यह "निश्चल" का कहना ।।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@..

आज़ादी

तम भी हारा है

422
अब तो तम भी हारा है,
 धुंधले से अंधियारों से ।

सावन भी भींग रहा है ,
 शुष्क पड़ी फुहारों से ।

 दिनकर ही हरता है ,
 हर दिन अब दिन को ।

 साँझे तडफे अब ,
 अपनी ही रात मिलन को ।

आभित नही नव आभा,
अब अपने उजियारों से ।

 डरता है मुंसिफ़ अब तो ,
 अपने पहरेदारों से ।

 मचान खड़ा हिलता है ,
 अपने ही आज सहारों से ।

 टूट रहा देश कदम कदम ,
  जात धर्म के नारों से ।

सत्ता की ख़ातिर खाते कसमें ,
  मंदिर मस्ज़िद गुरुद्वारों में ।

नित निज शीश सजाते,
 निज स्वार्थ के हारों में। 

प्राण गंवाते सैनिक घाटी में ,
 गद्दारों की घातों से ।

बहलाते हो कुछ पल को ,
अमर शहीद के नारों से ।

 मस्त हुए सत्ता के मद में ,
सजा रहे नित नए श्रृंगारों को।

पूछो कुछ उन माताओं से ,
खोया जिनने अपने लालों को ।

लाज नही तनिक अब भी,
 उलझे बस नारों में ।

कब जाएगा जन कश्मीर का,
 अपनी छोड़ी बहारों में ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@..


कलम चलती है शब्द जागते हैं।

सम्मान पत्र

  मान मिला सम्मान मिला।  अपनो में स्थान मिला ।  खिली कलम कमल सी,  शब्दों को स्वाभिमान मिला। मेरी यूँ आदतें आदत बनती गई ।  शब्द जागते...