दीया जलता है ,
रौशनी बांटता है ।
खुद नीचे अपना ,
अंधेरा काटता है ।।
....
यह सब समय तय करता है ।
कब किसको क्या करना है ।
न मैं करता कुछ न तू करता कुछ ,
सब कुछ बस वो ही करता है ।
...
कब कुछ कह जाते हैं ।
ज़ीवन की इस उलझन मे,
कब कहां खो जाते हैं ।
कुछ समझ नही पाते हैं ।
....
मन समझे मन की भाषा ।
नयन पढ़ें नयनं की भाषा ।
न अभिलाषा न कोई आशा।
ज़ीवन की इतनी सी परिभाषा।
......
काबिल वो नही,
जो क़ाबिल-ऐ-तारीफ है ।
क़ाबिल तो वो है,
जो तारीफ-ऐ-आम करते है ।
.....विवेक दुबे "निश्चल"©.....
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